Tag: पहाड़ की अर्थव्यवस्था

आब कब आलै ईजा…

आब कब आलै ईजा…

किस्से-कहानियां
डॉ. रेखा उप्रेती  ‘‘भलि है रै छै आमाऽ...’’ गोठ के किवाड़ की चौखट पर आकर खड़ी आमा के पैरों में झुकते हुए हेम ने कहा. ‘‘को छै तु?’’ आँखें मिचमिचाते हुए पहचानने की कोशिश की आमा ने... ‘‘आमा मी’’ हेम... ‘‘को मी’’... ‘‘अरे मैं हेम... तुम्हारा नाती..’’ आमा कुछ कहती तभी बाहर घिरे अँधेरे से फिर आवाज आयी- ‘‘नमस्ते अम्मा जी!’’ उत्तराखंड ‘‘आब तु कौ छै?’’ आमा की खीझती-सी आवाज पर हेम को जोर से हँसी आ गयी. ‘‘भीतर तो आने दे आमा , बताता हूँ. हेम ने आमा को अपने अंकवार में ले गोठ की ओर ठेला. उत्तराखंड गोठ में जलते चूल्हे के प्रकाश में हेम ने देखा, तवा चढ़ा हुआ है और एक भदेली में हरी साग.. ‘‘अरे, तेरा खाना बन गया आमा... बहुत भूख लगी है.’’ उत्तराखंड ‘‘पैली ये बता अधरात में काँ बट आ रहा तू और य लौंड को छू त्येर दगड़?’’ आमा ने गोठ के फर्श पर दरी बिछाते हुए कहा... फिर कुछ सोचते हुए बोली  ‘‘ भीतेर ...
रिंगाल: उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हरा सोना

रिंगाल: उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हरा सोना

उत्तराखंड हलचल
जे. पी. मैठाणी पहाड़ की अर्थव्यवस्था के साथ रिंगाल का अटूट रिश्ता रहा है. रिंगाल बांस की तरह की ही एक झाड़ी है. इसमें छड़ी की तरह लम्बे तने पर लम्बी एवं पतली पत्तियां गुच्छी के रूप में निकलती है. यह झाड़ी पहाड़ की संस्कृति से जुड़ी एक महत्वपूर्ण वनस्पति समझी जाती है. पहाड़ के जनजीवन का पर्याय रिंगाल, पहाड़ की अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ अंग रहा है. प्राचीन काल से ही यहाँ के बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का श्री गणेश रिंगाल की बनी कलम से होता था. घास लाने की कण्डी से लेकर सूप, टोकरियां, चटाईयां, कण्डे, बच्चों की कलम, गौशाला, झोपडी तथा मकान तक में रिंगाल अनिवार्य रूप में लगाया जाता है. वानस्पतिक परिचय- वन विभाग के अनुसार रिंगाल एक वृक्ष है, परन्तु वन विभाग की 1926-1928 से सन् 1936-37 की कार्य योजना में रिगाल की परिभाषा- “रिंगाल एक बहुवर्षीय पेड़ों के नीचे उगने वाली झाड़ी/ घास है जो नोड्स एवं इन्टर नोड...