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रवांई में विलुप्त होती ‘कुनाई तेल पिराई’ परंपरा, रिफाइंड तेल ने छीना पारंपरिक स्वाद

रवांई में विलुप्त होती ‘कुनाई तेल पिराई’ परंपरा, रिफाइंड तेल ने छीना पारंपरिक स्वाद

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, पुरोला (उत्तरकाशी)रवांई घाटी की सुबहें कभी सिर्फ सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि सरसों और खुबानी (चुलु) के ताजे तेल की खुशबू से भी जगती थीं। आंगन में रखी लकड़ी की कुनाई, आसपास जुटी महिलाएं, और हंसी-ठिठोली के बीच चलती तेल पिराई- यह दृश्य यहां के जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। आज वही खुशबू धुंधली पड़ चुकी है। बाजार के रिफाइंड तेल ने न सिर्फ रसोई का स्वाद बदला है, बल्कि एक पूरी परंपरा को धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर ला खड़ा किया है।जब परंपरा थी सामूहिक उत्सव मोरी क्षेत्र के पंचगाई, अठोर, बढ़ासु, फतेपर्वत और आराकोट जैसे गांवों में सर्दियों की शुरुआत तेल पिराई के मौसम का संकेत होती थी। यह केवल एक काम नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव जैसा अनुभव था। गांव की महिलाएं सप्ताहभर तक एक-दूसरे के घरों में जुटतीं, गीत गातीं और काम के साथ रिश्तों को भी मजबूत करतीं। कुनाई ...