
पारंपरिक बर्तन बना कमाई का जरिया
- नीरज उत्तराखंडी
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक व्यंजन ‘असका’ बनाने में उपयोग होने वाला मिट्टी का खास बर्तन ‘असकाई’ आज हस्तकला और स्वरोजगार का मजबूत माध्यम बनकर उभर रहा है।
आधुनिकता की दौड़ में जहां पारंपरिक बर्तन धीरे-धीरे गायब हो रहे थे, वहीं ‘असकाई’ ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का काम किया है।
असकाई: परंपरा और तकनीक का संगम
‘असकाई’ मिट्टी से बना पारंपरिक बर्तन है, जिसका उपयोग खासतौर पर ‘असका’ बनाने में होता है। इसकी बनावट ऐसी होती है कि भोजन धीमी आंच पर समान रूप से पकता है, जिससे स्वाद और पौष्टिकता दोनों बरकरार रहते हैं।
स्थानीय कारीगर पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं।
हस्तकला का अनूठा नमूना
‘असकाई’ केवल एक बर्तन नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
इसे पूरी तरह हाथों से बनाया जाता है—मिट्टी को गूंथना, आकार देना, धूप में सुखाना और पारंपरिक भट्ठी में पकाना।
हर ‘असकाई’ में कारीगर की मेहनत और हुनर साफ दिखाई देता है।
स्वरोजगार का बनता मजबूत जरिया
ऑर्गेनिक और पारंपरिक कुकिंग के बढ़ते ट्रेंड के चलते ‘असकाई’ की मांग लगातार बढ़ रही है।
इससे ग्रामीण कुम्हारों और शिल्पकारों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं।
कई स्वयं सहायता समूह और युवा इस काम से जुड़कर अच्छी आमदनी अर्जित कर रहे हैं।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
ग्रामीण महिलाएं भी अब ‘असकाई’ निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
इससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है और वे आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रही हैं।
सरकार और संस्थाओं से अपेक्षा
कारीगरों का मानना है कि यदि सरकार और संबंधित संस्थाएं प्रशिक्षण, डिजाइन इनोवेशन और बेहतर मार्केटिंग की व्यवस्था करें, तो ‘असकाई’ राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान बना सकता है।
संदेश
‘असकाई’ सिर्फ एक बर्तन नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, स्वाद और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
उचित संरक्षण और प्रोत्साहन मिलने पर यह न केवल पारंपरिक विरासत को जीवित रखेगा, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा।
