Tag: श्रीमद्भगवद्गीता

संघर्ष, समाधान और वैज्ञानिक दृष्टि : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

संघर्ष, समाधान और वैज्ञानिक दृष्टि : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

स्मृति-शेष
 डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र सहायक प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय किसी राष्ट्र का विकास केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, प्राकृतिक संसाधनों या सैन्य शक्ति से निर्धारित नहीं होता, बल्कि यह भी महत्त्वपूर्ण है कि वह अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करता है, संघर्षों का समाधान कैसे खोजता है और ज्ञान-विज्ञान को सामाजिक कल्याण से किस सीमा तक जोड़ पाता है। आधुनिक विश्व में संसाधनों की असमान उपलब्धता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, आर्थिक विषमता, सामाजिक विभाजन और राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियाँ विकास की दिशा को प्रभावित करती हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत के पूर्व राष्ट्रपति, प्रख्यात वैज्ञानिक और शिक्षाविद् डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन संघर्ष, संसाधन-प्रबंधन, वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता, नैतिक नेतृत्व और सामाजिक समरसता का  उदाहरण है। डॉ. कलाम का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि सीमित आर्थिक संसाध...
‘धर्म’ की सामाजिक विकृतियों से संवाद करते आए हैं कृष्ण

‘धर्म’ की सामाजिक विकृतियों से संवाद करते आए हैं कृष्ण

लोक पर्व-त्योहार
गीता का कालजयी चिंतन-1 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के अवसर पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व समूचे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. द्वापर युग में कंस के अत्याचार और आतंक से मुक्ति दिलाने तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए इसी दिन विष्णु के आठवें अवतार के रूप में भगवान् कृष्ण ने जन्म लिया था. गीता में भगवान् कृष्ण का कथन है कि "जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तो मैं धर्म की स्थापना के लिए हर युग में अवतार लेता हूं- “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत. अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्.. परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् . धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे.."            -श्रीमद्भगवद्गीता‚ 4.7-8  गीता के परिप्रेक्ष्य में अवतार की अवधारणा यहां सज्जन के संरक्षण और दुर्जन के ...