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चोखी ढाणी : राजस्थान की समृद्ध विरासत और रंगीली संस्कृति की झलक

सुनीता भट्ट पैन्यूली

कुछ यात्रायें किसी मनोरंजन व मन के परिवर्तन के लिए नहीं वरन अपनी  संतति के प्रति ज़िम्मेदारियों के वहन हेतु भी होती हैं.इस प्रकार की परिसीमित, निर्धारित व व्यवस्थित  यात्राओं में घुमक्कड़ी की कोई रूपरेखा या because बुनावट नहीं होती है किंतु फिर भी आनन-फानन में समय की तंगी और बोझिलता के बीच भी यदि समय हम पर कृपालु होकर स्वयं हमें सुखद क्षण दे देता है कुछ मनोरंजन के लिए तो और भी सोने पर सुहागा.

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यदि समय का अभाव है और किसी एक राज्य से because दूसरे राज्य में विशेष काम से गये हैं तिस पर  वहां की संस्कृति को एक ही दिन में जानने की जिज्ञासा हो तो कतई संभव नहीं है उसका पूर्ण होना.

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ख़ैर हमने ऐसी कोई परिकल्पना भी नहीं की थी because क्योंकि हमारी यात्रा औचक थी.क्या किया जाये?अनायास ही उठे हुए कदमों को जाना तो होता है मंज़िल की ओर किंतु कभी-कभी वे ठिठक भी जाते हैं सम्मोहित होकर बीच-बीच के पड़ाव में कहीं.

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शायद यह कदमों का कुसूर नहीं, किसी विशिष्ट because वातावरण का आकर्षण है जो अपनी परिधि के भीतर यात्रीयों को आकृष्ट करता है.

आनन-फानन में की गयी यात्रायें जब की जाती हैं तो बेबुनियाद होती हैं किंतु न जाने कब उन्हें तय करते-करते आधार मिल जाता है या  क्या कुछ हासिल हो जाता है यह पीछे मुड़कर स्मृतियों में डूबकर ही जान-पड़ता है.

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ऐसी ही हमारी यात्रा देहरादून से शुरू होकर जयपुर because और फिर  जयपुर से वनस्थली पर जाकर रूकी.

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बेटी के कालेज जाना था. सुबह जयपुर से वनस्थली लगभग बारह बजे पहुंचे. जयपुर से वनस्थली लगभग बहत्तर किलोमीटर है. सारा दिन कालेज में बिताकर शाम पांच बजे फ्री हुए.पहले भी जयपुर से वनस्थली जाते हुए बीच रास्ते में “चोखी-धाणी” देखा है लेकिन पता नहीं था कि क्या है यह चोखी-ढाणी? इस बार जानकारी ली है “चोखी ढाणी” के बारे में  तो पता चला है कि यह वनस्थली से लगभग पचास किलोमीटर है.यदि राजस्थान की संपूर्ण संस्कृति और विरासत को एक ही समय और एक ही जगह पर देखना हो तो “चोखी ढाणी” जाया जा सकता है.

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शाम से रात तक का समय है  हमारे पास और वनस्थली से जयपुर अजमेर रोड पर ही क्योंकि “चोखी ढाणी” है तो इसे देखा जा सकता है यही सोचकर हम “चोखी ढाणी” की ओर प्रवृत्त हों गये हैं.

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कहते हैं जहां सभ्यतायें,भाषा,संस्कृति because और विरासत एक मजमा बना लेती हैं वह गांव बन जाता है. कुछ इस तरह की ही बानगी है “चोखी-ढाणी”

राजस्थानी में चोखी मतलब अच्छा और ढाणी का अर्थ गांव होता है यानि कि सुंदर गांव.

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चोखी ढाणी जयपुर से शहर के बाहर ही बाहर  because लगभग तीस से चालीस किलोमीटर दूर है जबकि वनस्थली से लगभग 72 km है.

चोखी-ढाणी व्यस्त रोड के किनारे ख़ूबसूरत हस्तशिल्प से निर्मित मिट्टी और गोबर से बना हुआ गांव है.पूरा चोखी ढाणी  राजस्थान के सिवान के गांवों की रोचक झलक है जिनकी दीवारों पर राजस्थान के आदिवासी गांवों की कुछ हस्त-शिल्प व चित्रकला  के नमूने देखें  जा सकते हैं. स्वागत गेट बहुत आकर्षित करता है जिस पर बड़े-बड़े ख़ूबसूरत शब्दों में लिखा है चोखी ढाणी रिर्साट,थोड़ा आगे बांयी तरफ़ मिट्टी की दीवारों के ताखों में ऊपर-नीचे दांये-बांये के क्रम में जगमगाती दीप-मालाओं का बहुत ख़ूबसूरत धूमिल प्रकाश. दूसरी तरफ़ एक छोटा सा मंदिर है.जहां मंदिर के आंगन के आगे सजी हुई दीवार के सहारे दो राजस्थानी लोक कलाकार सफ़ेद धोती-कुर्ता और पचरंगी  पगड़ी पहने हुए, शहनाई और नगाड़ा बजाते हुए राजस्थानी लोकगीत केसरिया बालम पधारो म्हारो देश… गा रहे है.

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वहीं पर दो ख़ूबसूरत सांवली सी नैन-नक्श because वाली षोडषी हाथों में तिलक लिए हर आगंतुक का मुस्कराकर  स्वागत कर रही हैं.अपनी इच्छानुसार कोई उन्हें पैसे दे रहा है कोई नहीं अब जैसी जिसकी सोच..,,तिलक लगवाकर मुझे अपने देश की संस्कृति पर भीतर ही भीतर गर्व  महसूस हो रहा है. आगे भीतर प्रवेश करते ही बड़ा सा हाल आता है जहां पर्यटकों की भीड़ टिकट लेने के लिए कतार में खड़ी है. यहां चोकी-ढाणी में दो प्रकार की श्रेणी के टिकट हैं आठ सौ और बारह सौ रुपये.बच्चों की हाईट के हिसाब से ढाई से साढ़े तीन फीट की हाईट तक के बच्चों के लिए पांच सौ रूपये टिकट हैं.आठ सौ और बारह सौ रुपये के टिकट में क्या ख़ासियत हो सकती है?यह तो अंदर जाकर ही मालूम पड़ सकता है.

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हां यह ज़रूर पता चला है जानकारी बोर्ड देखकर कि भीतर बहुत से जानवरों जैसे हाथी की सवारी,ऊंट की सवारी,बैल की सवारी,घोड़ों की सवारी,नौका-विहार,बाइस्कोप, मालिश , कठपुतली कला, तीर-अंदाजी़,बोलिंग,मैजिक शो झूले,भेलपूरी,आइसक्रीम खरीदने के लिए अलग से चार्ज हैं. आठ सौ और बारह सौ में सिर्फ़ रात का खाना है. आज शनिवार है तो भीड़ भी अच्छी खासी है और बारह सौ वाली टिकट में बहुत लंबी लाइन है इसलिए हमने प्रत्येक व्यक्ति आठ सौ रूपये  वाली टिकट ही ख़रीदी है.

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टिकट लेकर हम भीतर की ओर जा रहे हैं दो because लंबे-चौड़े व्यक्तित्व वाले पुरुष  राजस्थानी परिधान में खड़े होकर टिकट देखने के बाद भीतर प्रवेश दे रहे हैं.

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और थोड़ा आगे बांयी तरफ राजस्थानी परिधान because में बैठी हुई स्त्री ने मेरा पर्स चेक किया है और उसके बाद हम सभी फ्री हो गये हैं चोखी-ढाणी के भीतर  कहीं भी घूमने के लिए.

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भीतर प्रवेश करते ही  राम-राम सा की आवाज because आयी देखा कोने में लोग डिस्पोजेबल कप में कुछ पी रहे हैं. मैंने पूछा कि यह क्या है? उन्होंने कहा राबड़ी ऊंनी,,पूछने पर पता चला कि यह बाजरे का आटा और छांच से बनता है,गर्म-गर्म पीया तो बहुत स्वादिष्ट लगा और भीतर की तरफ़ गये तो आहा..मानो रंगीलो राजस्थान के गांव  में हमने कदम रख दिये हों. हर तरफ़ रंग ही रंग बिखरे हुए हैं राजस्थान के लोक-गीतों के,लोक-नृत्यों के,स्वाद के,वाद्य-यंत्रों के. कहीं पर रंगीले वस्त्रों की ज़ीन या काठी ओढ़े हुए हाथी और ख़ूबसूरत रंग-बिरंगे कजावा,गोरबंद पहने ऊंट,बैल बहुत ही मनमोहक लग रहे थे.

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पढ़ें — भद्रज मंदिर मानो बांज की सरणी से चमकती मणि

गांव के लगभग हर बीच वाली जगह में राजस्थानी शैली में बने हुए स्टेज और उनके भीतर कहीं काले और लाल लहंगा-चोली के लिबास में  राजस्थानी आभूषणों में लदी हुई राजस्थान के सपेरा जाति का “कालबेलिया” नृत्य करती ख़ूबसूरत स्त्रियां और पुरुष भी हैं जो राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में कालबेलिया जाति का महत्त्व भी दर्शाती है. कहीं पर लाल-हरे,नीले लहंगों में कलाई से पूरी बांहों तक सफेद चूड़ी because (बांगड़ी) पहने हुए बैठकर “तेरह ताली नृत्य” (कामड़ जाति की स्त्रियों द्वारा शरीर पर तेरह मंजीरे बांधकर किया जाने वाला नृत्य) और “चरी नृत्य ” (अजमेर, किशनगढ़ क्षेत्र में गुज्जर समुदाय की महिलाओं द्वारा चरी यानि की भारी बर्तन और उस पर तेल में भिगोयी हुई रूई की बत्ती डूबोकर, बिना स्पर्श किये हाथ, कमर और पांव का संतुलन बनाकर किया जाने वाला नृत्य)और घूमर(भील जातियों की महिलाओं द्वारा सरस्वतीकी अराधना के लिए किया जाने वाला नृत्य जिसमें स्त्रियां घूंघट काढ़कर एक घुमेरदार लहंगा पहनकर समूह में नृत्य करती हैं) महिला पर्यटकों को अपने साथ नृत्य करने के लिए आमंत्रित कर रही हैं.मुझे क्या चाहिए ? जहां नृत्य हो वहां मैं नहीं रहूं ऐसा हो ही नहीं सकता है. ख़ूब दिल से लोक  कलाकारों के साथ नृत्य किया मैंने.एक खास बात वहां  मुझे जो  बहुत अच्छी लगी वह स्टेज के चारों तरफ़ चारपाईयां लगी हुई हैं जिस पर बैठकर आप आराम से नृत्य-प्रदर्शन का आनंद ले सकते हैं.

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चोखी-धाणी की आबो हवाओं में जानवरों के पैरों में because घुंघरुओं की खन-खन की सरसराहट,कहीं खरताल,चिमटे,ढोलक,सारंगी हारमोनियम  की मिश्रित सुगंधित आवाज़ राजस्थान के सीमांत गांवों के बहुत पास ले जा रही है.

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1989 में चोखी ढाणी की स्थापना हुई थी और 1994 से because यह पर्यटकों के लिए निरंतर खुला हुआ है.

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चोखी ढाणी गांव गाय के गोबर से लीपा हुआ और दीवारों because पर सुंदर चित्रकारी से सजा हुआ एक श्रंखलाबद्ध गांव है जो विदेशी और देशी पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है.

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संभवतः यही कारण है कि इस गांव के भीतर मैंने छानी because में बहुत सी गायों को भी देखा है.

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बीच-बीच में हम में जाकर अपने खाने का भी इंतज़ार because कर रहे हैं लेकिन बहुत भीड़ है अभी नंबर आना मुश्किल है.

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चोखी ढाणी घूमते-घूमते हमें एक कलात्मक द्वार दिखाई दे रहा है जिस पर लिखा है कलाग्राम.हम कलाग्राम में घुस गये हैं यहां पर अलग-अलग स्टेट का क्राफ्ट है जहां पर हमें विभिन्न राज्यों की संस्कृति और विरासत देखने को मिल जाती है इसमें कोलकाता के शांतिनिकेतन के बैग,पंजाब की फूलकारी,मोजरी(जूतियां) उत्तर प्रदेश का पीतल का सामान,राट आयरन,राजस्थान की बांधनी,लहरियां,टाई एन्ड डाइ के दुपट्टे, because कठपुतलियां,संगमरमर का क्राफ्ट, कर्नाटक का डिग्री क्राफ्ट,मोती वर्क जयपुर,गुजरात का हेंडीक्राफ्ट, जयपुर का स्टोन आर्ट और वुड फर्नीचर और भी बहुत सी कला और हस्तशिल्प के नमूने और बहुत सी दुकानों में हाथ का जीवंत हुनर यानि कि शिल्पकारों को काम करते हुए देखा जा सकता है.

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चोखी-ढाणी का विशेष आकर्षण यहां की  चौपाल है because राजस्थान के गांवों में एक रिवाज है जहां गांव के सभी लोग एक जगह एकत्रित होकर आपस में गप-शप मारते हैं और साथ खाना खाते हैं.राजस्थान के उसी संभ्रांत परंपरा को यहां चोखी ढाणी में दर्शाने की सफलतम  कोशिश की गयी है.

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यहां आपको नीचे बिठाकर पूरे परंपरागत because तरीके से पूर्णतः राजस्थानी व्यंजन बड़े आदर सत्कार के साथ परोसें जाते हैं.

राजस्थानी मेहमान नवाज़ी की इस प्रकार की because अनूठी परंपरा का कोई सानी नहीं है.

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चोखी ढाणी का समय पांच बजे से रात के because ग्यारह बजे तक है.रात्रि के दस बज गये हैं और कलाग्राम घूमकर हम वापस अपने रात्रि भोजन के लिए जो कि बूफे में होगा हम उस सामुहिक पंडाल में भीतर घुस गये हैं.

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सारे राजस्थानी व्यंजन करीने से मेज पर लगे हैं सलाद,कैरी सांगरी का अचार,लसण की चटनी,धनिया की चटनी,बेसन के गट्टे की सब्जी,सरसों का साग,बाजरे की और मिस्सी रोटी,दाल के पकोड़े,चाट चांवला, आलू-प्याज की सब्जी,मालपुआ ऊंना,सादा बाटी,चूरमा बांटी,मोठ,चावल ऊंना, बेसन कभी,दाल पंचमेल,बाजरे का खिचड़ा और इन सभी व्यंजन पर लबालब घी उड़ेला हुआ.

इस लालच में कि कोई भी व्यंजन बिना चखे ना रह जाये हमने लालच में आवश्यकता से अधिक भोजन लें लिया है जो कि बाद में हमने छोड़ दिया जिसका मलाल मुझे आज भी है. आप यदि घुमने जायें तो प्रत्येक व्यंजन चखें ज़रूर लेकिन उतना ही लें जितनी की आवश्यकता है कृपया कुछ छोड़े नहीं.

अभिभूत हैं हम राजस्थानी मेहमान नवाज़ी का लुत्फ़ उठाकर रात के ग्यारह बज गये हैं चोखी ढाणी भी बंद होने को है और हमें वापस जयपुर निकलना भी है कल देहरादून वापसी में आमेर महल भी देखना है.

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देखते हैं कितना समेट पाती हूं आंखों के कगारों पर.

चोखी ढाणी देखना राजस्थान की समृद्ध विरासत और रंगीली संस्कृति को देखना अविस्मरणीय पल थे हमारे लिए.

बहुत सुंदर है रंगीलो राजस्थान.

 

(लेखिका साहित्यकार हैं एवं विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में अनेक रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं.)

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