ट्रैवलॉग

भद्रज मंदिर मानो बांज की सरणी से चमकती मणि

भद्रज मंदिर: यात्रा वृत्तांत

सुनीता भट्ट पैन्यूली

जिज्ञासा से था आकुल मन
वह मिट्टी, हुई कब तन्मय मैं,
विश्वास मांगती थी प्रतिक्षण
आधार पा गयी निश्चय मैं!
बाधा-विरोध अनुकूल बने
अंतर्चेतन अरूणोदय में,
पर भूल विहंस मृदु फूल बने
मैं विजयी प्रिय,तेरी जय में.
सुमित्रा नंदन पंत

जिस चरम पर पहुंचकर आकांक्षाओं की पूर्ति तो हो जाती है, किंतु जिज्ञासायें नये स्वरूप में जन्म लेकर मन को और विस्मित कर देती हैं,ऐसी भावनाओं को शब्दों में कैसे अभिव्यक्त किया जाये ? जब अंतर्मन में  प्रश्न उठते हैं. हम यहां क्यों आये हैं?कौन सी अदृश्य शक्ति हमें यहां खींच लायी है? हम नहीं आते तो क्या उस सर्वशक्तिमान की अनूस्यूत सत्ता को महसूस करने से हम वंचित न रह जाते? क्यों विराजती है यह सर्वोच्चमान शक्ति मानवीय पहुंच से इतनी दूर? शायद धार्मिक यात्राओं के दौरान मानव की इस चित्तवृत्ति  हेतु कि हम कहां जा रहे हैं? और क्यों जा रहे हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?

इस अश्रुत सौंदर्य को महसूस करने की मेरी लालसा प्रायोजित नहीं थी.यक़ायक  मैंने भद्रज मंदिर के बारे में  सुना ,सुनकर  मन व्यग्र हुआ. परिस्थितियां भी अनुकूल बनीं और सबसे बड़ी बात  भाग्य ने साथ दिया और  भद्रज मंदिर को देखने का मेरा स्वप्न सच में परिणत हो गया. दरअसल पहाड़ पर चढ़ने के लिए पहले  मन का पहाड़ पर चढ़ना नितांत ज़रूरी है. ये मन का मौसम ही है जो पैरों को दुर्लभ से दुर्लभतम यात्रा तय करने के लिए उत्तेजित करता है.

यह भी सत्य है कि हर किसी का अपना आत्मबोध होता है और अपनी ही लय समय  के पथ पर चलने की,इसी मानवीय प्रवृत्ति के वशीभूत  प्रकृति को समझने का मेरा भी अपना ही सलीका है और जब मैं बात कर रही होती हूं पहाड़ों से, आसमान से, नदी से, वनस्पतियों से उस दौरान मुझे हमारे दरमियान किसी का भी ख़लल डालना पसंद नहीं यहां तक कि मेरी सांसों का भी नहीं.

इसी धारणा को केंद्र में रखकर मैंने भी पूर्व में ही मन के सफ़र की उड़ान भरने की तैयारी कर ली है. एक दिन पहले चार दिसंबर है मतलब कि नौ सेना डे है. आज मौसम कुछ गड़बड़ है, मैं अपनी सारी ऊर्जा और इच्छाशक्ति को बचा कर रख रही हूं. कम बोल रही हूं,काम ज़्यादा नहीं कर रही हूं  ताकि कल पहाड़ पर चढ़ने के लिए अपने मन और देह के मध्य संतुलन बनाकर कल की नियोजित यात्रा को एक ख़ूबसूरत  आयाम दे सकूं.

कल भद्रज मंदिर जाने की तैयारी है.

मैं किसी सफ़र की बात कर रही हूं लेकिन कहां जा रही हूं? ये अभी तक नहीं बताया है मैंने.

भद्रज मंदिर से पहले बताना चाहूंगी कि कौन हैं भद्रज या भदराज?

बलराम कृष्ण के बड़े भाई हैं.जैसा कि कृष्ण को विष्णु तो बलराम को शेषनाग का अवतार माना जाता है.भदराज या भद्रज,बलदाऊ, संकर्षण भी उन्हीं का नाम है.

उत्तराखंड में बलराम की यह एकमात्र सिद्धपीठ है,और बहुत दूर-दूर तक इसकी ख्याति है. कहते हैं महाभारत के युद्ध  में जब कौरव और पांडव के किसी भी पक्ष में  उनकी सहभागिता की सहमति नहीं थी तो वह तपस्या करने हिमालय की ओर चले गये. यहां यमुना और पछुआदून के किनारे कैसे उनकी स्थापना हुई? विस्तृत घटना है यह अतः यह मेरे विस्तृत आलेख में जल्दी ही ..! मंदिर के साथ ही यह स्थान साहसिक पर्यटन की दृष्टि से और ट्रैकिंग के लिये भी  सुरम्य स्थल है.अधिकांश सैलानी यहां दूर-दूर से प्रकृति की दिव्य और मनोहर छटा का आनंद लेने आते हैं.

भद्रज मंदिर देहरादून से बाहर और यमुना नदी के किनारे मसूरी के दुधली गांव की पहाड़ियों पर समुद्रतल से लगभग 7500 फीट की ऊंचाई पर बसा हुआ है. मंदिर की फैली हुई ख्याति और अदम्य सुंदरता ही है जिसने मुझे इसके दर्शनार्थ लंबा सफ़र तय करने के लिए आकृष्ट किया है.

मुझे ना ही पैदल, चलने में कोई समस्या है ना ही पहाड़ों की दुश्वारियों से कोई आपत्ति. परेशानी है तो कार के सफ़र से होने वाली ट्रेवल सिकनेस से.

वरना पहाड़न होने के नाते पहाड़ की नीरवता,,जंगल की सघनता,नदी की किलोलता, सभी तो मेरे अपने हैं इनसे भला क्या भय मुझे? मैंने तो आंख ही जंगलों की गोद में खोली है. पिताजी वन विभाग में ही तो थे. सारा दिन जंगलों में भटकना, नदी में तैरना, जंगली वनस्पतियों को हटाकर मेंढक पकड़कर ढूंढना और उन्हें तंग करना हमारा शगल ही नहीं हमारी दिनचर्या का भी अहम हिस्सा था.

बहुत माहिर हूं मैं पहाड़ों की फितरत जानने में और मसूरी? मसूरी तो जैसे हमारे घर का आंगन.. कभी  परायापन तो महसूस हुआ ही नहीं मसूरी से. हवाओं का मूड यदि बिगड़ भी जाये? बादल सूरज की घेराबंदी करके जकड़ भी लें चक्रव्यूह बनाकर,नदी थोड़ी बिगड़ैल बनकर बहने भी लगे अपना रास्ता छोड़कर बहुत ज़्यादा हमारी सेहत पर फ़र्क नहीं पड़ता है.

फ़िलहाल आज बादलों ने तस्दीक़ की है कि कल मौसम का मिजाज़ बिगड़ा हुआ ही रहेगा.

मैंने  पति की बहुत हार-मनोहार करके उन्हें भद्रज मंदिर चलने के लिए तैयार किया है क्योंकि ले जायेंगे तो वही ना इतनी दूर.

पतिदेव एक कुशल चालक हैं, बहुत दूर-दूर तक दुर्गम सफ़र तय किया है मैंने उनके साथ कार में. यह तय है कि उन्ही के साथ मैं निडर होकर पहाड़ों का सफ़र तय कर सकती हूं अन्य किसी पर मुझे भरोसा नहीं.

भद्रज मंदिर के बारे में हमने और भी बहुत से लोगों से जानकारी ली है सभी कह रहे हैं कि पैदल चलने के लिए बहुत है.

पतिदेव बार-बार पूछ रहे हैं अभी भी देख लो! चल पाओगी तुम पैदल इतनी दूर?  लेकिन उन्हें क्या पता  कि जबसे मैंने भद्रज के बारे में सुना है,मैं तो भद्रज मंदिर के काल्पनिक दृश्य को मन में संजोये  उसके दर्शनार्थ हेतु रोज़ ही कई-कई मील मन के सफ़र तय कर रही हूं. मुझे तो बस अब जाना ही है चाहे कितनी ही दूर क्यों ना हो?

मेरी कृतसंकल्पता पर पति का अब कोई प्रश्न नहीं…

झूले पर बैठकर अनमनी सी मैं प्रार्थना कर रही हूं ईश्वर से कि हे सर्वशक्तिमान अगर तू कहीं है? यदि तू  हमारे कर्मों का लेखा-जोखा अपने पास रखता है, तो मेरी सच्चे हृदय से की गयी प्रार्थना तुझ तक ज़रूर पहुंचेगी. काश कि कल बारिश ना हो.

और मौसम चिट्ट गुलाबी या गंदुम सा खिला-खिला हो और मेरा भद्रज देखने का मनोरथ पूर्ण हो जाये.

बच्चे अनिच्छुक हैं इस यात्रा पर साथ चलने के लिए वैसे मैं चाहती हूं कि हमारी संस्कृति,हमारी परंपराओं और पुराणों में उनकी रूचि हो और सुप्रसिद्ध बलराम के इस मंदिर को वह रूचिपूर्वक देखें,किंतु इस यात्रा के प्रति उनकी नीरसता शायद पैदल चलने और  परीक्षाओं के भय के कारण हो?मैंने भी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया चलने के लिए.

भद्रज मंदिर पहुंचकर या उसके आस-पास भोजन मिलने की कोई व्यवस्था नहीं है यही दिमाग में रखकर सुबह जल्दी उठकर मैंने राजमा बना ली है और चावल भिगो दिये हैं, हम अपनी हर यात्रा में गैस का चूल्हा साथ लेकर चलते हैं सो वहां जाकर चावल बनाने में कोई परेशानी नहीं होगी, रोटी  और सब्जी सहेली बनाकर ला रही है.

मैंने जो भी पहाड़ पर चढ़ने से पहले तैयारी करनी चाहिए वह भरसक कर ली है. मैंने एक rucksack में सभी ज़रूरी दवाईयां रख ली हैं,ग्लूकान डी,जूस,पानी की बोतल,एक जोड़ी कपड़े और एक जोड़ी जूते अतिरिक्त रख लिये हैं.खाने का बहुत सारा सामान भी साथ ले लिया है जो कि मैं अपने झोले में ही रखने वाली हूं. टार्च, सुई-धागा, सेफ्टी पिन, कंघी, टिशू पेपर और मुख्य रूप से डायरी और एक पेन भी रख लिया है ताकि सफ़र के किसी भी मोड़ पर सुस्ताकर ईश्वर द्वारा लगायी गयी प्रकृति की इस अद्भुत प्रदर्शनी को निहारकर अपने भावों में उकेर पाऊं. क्योंकि यह अभी भ्रम ही बना हुआ है हमें कि भद्रज कितनी दूर है? और हमें कितना पैदल चलना है? इसी भयवश मैंने अपने ट्रैक पैंट की जेब में किशमिश और ड्राइफ्रूट्स रख लिये हैं ताकि चढ़ाई चढ़ने के उद्योग में शरीर को ख़ुराक मिलती रहे.

सफ़रनामा शुरू हो गया है करीब साढ़े ग्यारह बजे पतिदेव, मैं और हम दोनों के साथ उनके मित्र और उनकी पत्नी जो कि मेरी ख़ास सहेली भी हैं, हम चारों साथ जा रहे हैं.

ऐसे ही चलते हुए जिंदगी से जुड़े कुछ जज़्बात मन में उमड़ रहे हैं. हम सभी को कई मर्तबा अपनी ज़िंदगी में पूर्णता में भी रिक्तता की अनुभूति होती है. है ना? इसी अनूभूतिवश प्रव्रज्या ही समाधान का आकांक्षी मेरा भ्रमित मन तो डग उठाकर हमेशा पहाड़ों की ओर भागने को तैयार रहता है. लेकिन हमेशा निरपेक्ष रहना क्या संभव है हम सभी के लिए? या सिर्फ़ भटकाव है मन का?  लेकिन जो भी है. पूर्णता में रिक़्तता की पूर्ति के लिए मेरी समझ से यह भी समाधान है कि कभी-कभार हमें सूक्ष्म पलायन कर प्रकृति के सानिध्य में ही चले जाना चाहिए.

किंतु फिर भी मोहपाश में तो हम रहते ही हैं चाहे घर हो या बाहर? क्या राह में आकृष्ट करते हुए  पुष्प, विस्तीर्ण मैदान, आकाश में अठखेलियां करते मेघ खंड, शैलमालायें, दूर कहीं सुनहरी सी चमकती यमुना नदी यानी प्रकृति से संबंध स्थापित होना भी क्या मोहपाश नहीं?

अन्तोत्गत्वा जाना तो वापस घर ही है ना?

किंतु अभी घर, परिवार,दायित्व सब कुछ बिसराकर, मौन रहकर मैं अपने हिस्से का चिंतन-मनन पहाड़ों के लिए ही रखना चाहती हूं.

देहरादून से भद्रज मंदिर कुल 45 km है. देहरादून से वाया कार हमने हाथी पांव तक 35km का सफ़र तय कर लिया है. हाथी पांव से एक रोड क्लाउड एंड को जा रही है एक सीधी खड़ी रोड देवदार के सघन वृक्षों के बीचों-बीच होकर जा रही है.

हमने सीधी खड़ी रोड पर देवदार के वृक्षों की सत्ता में प्रवेश कर लिया है नहीं जानते हैं कि कहां जा रहे हैं?

रास्ते में ही एक बड़ा रिसोर्ट है वहां बाहर खड़े हुए एक आदमी से ज्ञात हुआ कि हम अपने सही गंतव्य की ओर प्रवृत्त हैं.

कुछ आगे जाने पर रास्ते में एक बोर्ड मिल गया है जिस पर लिखा है कि पांच किलोमीटर दूधली गांव फिर दुधली गांव से ही पांच किलोमीटर भद्रज मंदिर है. यानी कि हाथी पांव से भद्रज मंदिर दस किलोमीटर है.

अभी भी सड़क की खड़ी चढ़ाई है इसके दोनों ओर ढलान पर देवदार के उत्ताल वृक्षों का असीमित, एकक्षत्र कारवां अभी निरंतर जारी है. ऐसा महसूस हो रहा मानो भगवान भास्कर वृक्षों की इस अंधकारमयी विथिका में प्रविष्ट होने का निरंतर व निरर्थक प्रयास कर थक-हारकर किसी अन्य स्थान को आलोकित करने चले गये हैं.

अजीब सा अदृश्य मौन है!!

कानों में सूं..सूं की आवाज़ आ रही है सहसा कानों में मेरे जैसे ढक्कन लग गये हैं.

जिसका मुझे डर था हल्की मितली और चक्कर से महसूस होने लगे हैं वैसे मैं निश्चिंत भी हूं कि कुछ नहीं होगा मुझे. stugil की दवा खाकर मैं घर से निकली हूं.मेरी आज पूरी कोशिश रहेगी कि इस दैवीय अनुभूति की यात्रा में मेरे साहचर्य के जो भी साक्षी बने हैं सब को जी भर निहारकर अपने दृष्टिकोण से एक नयी काया दे सकूं.

देवदार के वृक्षों की घोर अंधकारमय सीमा समाप्त हो गयी है और सहसा बांझ के पेड़ों का सिलसिला शुरु हो गया है कहीं पर ये सघन गोलाकृति में, कहीं छितरे हुए से अपनी उपस्थिती दर्ज़ कराकर हमें आकर्षित कर रहे हैं.

हमारी कार अब घुमावदार सड़क पर दौड़ रही है, हम नीचे से ऊपर की ओर ऊंची  सड़क पर आ जाते हैं और हमारी कार सपाट से चटियल मैदानों के बीचों-बीच चल रही है, इन मैदानों को बुग्याल कहना ग़लत होगा क्योंकि मैंने पढ़ा है कि बुग्याल हमेशा दस हज़ार फीट की ऊंचाई से शुरू होते है, लेकिन पास से आकर देखती हूं तो ये चटियल मैदान नहीं हैं‌ अपितु पाला पड़ने से हरी दूर्वा भूरे रंग में परिवर्तित हो गयी है, सहसा ही हम नीचे की ओर पुनः ढलान पर चल रहे हैं रास्ते भर में धूप की अनुपस्थिति और पाले की अधिकता वश कच्ची सड़क नम और कहीं-कहीं भयंकर दलदल में परिवर्तित हो गयी है.

पतिदेव रास्ते की विकटता को महसूस करके भी कार आगे बढा रहे हैं. मैं और मेरी सहेली पीछे सीट पर बैठे हैं.

जहां पर ख़तरनाक मोड़ या गीली, लिजलिजी पगडंडीनुमा सड़क आती है और कार चलने में आना-कानी करने लगती है, मैं डरके मारे आंखें बंद कर लेती हूं, ऊपर से मुझे ट्रेवल सिकनेस अलग लेकिन उनकी डांट खाने के भय से चुप हूं. एक जगह अब ऐसी आ गयी हैं जहां महसूस हो रहा है मानो कार ने थककर हाथ खड़े कर दिए हैं.

बहुत प्रयास किया पतिदेव ने किंतु कार तो मानो जीभ निकालकर उसी दलदल में बैठ गयी है. हम तीनों ने कार को धक्का भी लगाया पीछे के टायरों पर पत्थर लगाकर किंतु वह फिर वापस आ रही है,,मैं मन ही मन अपने को कोस रही हूं कि “मेरी वजह से सभी मुसीबत में पड़ गये” ख़ैर अब क्या  हो सकता है .सभी ने निर्णय लिया है कि आगे का सफ़र अब पैदल ही तय किया जाये.

क्योंकि सड़क की हालत बहुत ख़राब है इसलिए हमने डेढ़ किलोमीटर पहले ही कार खड़ी कर दी है और हम पैदल सफ़र पर चल पड़े हैं.वैसे  यदि सड़क ठीक-ठाक हो तो भद्रज मंदिर से पांच सौ मीटर पहले तक गाड़ी जा सकती है जिस जगह का नाम खच्चर खाना है.

किंतु यह व्यक्तिगत सलाह है मेरी कि जहां तक कार चलायी जा सके वहीं तक कार से जायें बाकि का सफ़र पैदल तय  करना ही ठीक है. क्यों दुरूह रास्तों का खतरा  मोल लिया जाये?

हमने अपनी ज़रूरतों का सामान अपने-अपने बैग में भरा और हम सभी ने अपनी-अपनी डगर  पकड़ ली है.

फिर से वही पगडंडीनुमा संकरी सड़क,, अब ढलान कहीं नहीं मिल रहा है. चढ़ाई ही चढ़ाई है कहीं पर हम घास की चट्टानों का सहारा लेते हैं. कहीं पर बिना सहारे के चलते हैं. मैं प्रकृति के अद्भुत नज़ारों का आनंद ले रही हूं साथ में मोबाइल से फोटो भी ले रही हूं. पतिदेव नाराज़ हो रहे हैं.उनका कहना है कि “तस्वीरें बाद में भी ले सकते हैं पहले गंतव्य तक पहुंचो.”

नीरभ्र आकाश है उसी के वितान में कहीं-कहीं खंडित बादलों का डेरा है. हवायें ज़िद्दी लगती हैं यहां की,, बेवजह इस जौनपुर की घाटी में बेहिसाब हुड़दंग मचा रही हैं मानो मूक खड़े बांझ के पेड़ों की नीरवता में ख़लल डालकर उन्हें चिढ़ा रही हों.

हम सभी आगे बढ़ते जा रहे हैं ख़ूबसूरत झांकी है क़ायनात की.रास्तेभर भटकैय्या के पौधे फलों से लकदक हैं सुना है मैंने इसके फल जहरीले होते हैं किंतु किसी औषधि में तो इनका प्रयोग होता ही होगा. किंगोड़े की झाड़ियां हैं, कोई गुलाबी छोटे-छोटे पत्तों जैसी फूलों से लदी वनस्पति है यह, बचपन से देखती आ रही हूं इसे दरअसल खट्टा सा स्वाद होता है इनका, रास्ते में,स्कूल जाते हुए कहीं भी दिख जातीं थी यह और हम इनका स्वाद लेना कभी भी नहीं भूलते थे किंतु आज तक मैं इनका नाम नहीं जान पायी हूं.

चट्टानों पर कुछ पपड़ीयों की आकृति बनी हुई हैं शायद “दगड़ पुष्प” (लाइकेन) हैं. जिसे छरीला (ब्लैक स्टोन) भी कहते हैं. निश्चित नहीं हूं.

अब मेरी सांसों पर तो मेरी देह का नियंत्रण ही नहीं है जैसे. बार-बार कमर पर हाथ रखकर लंबी-लंबी सांसें छोड़कर खड़ी हो जा रही हूं पतिदेव मेरे लिए रुक जाते हैं. सामान्य होने पर मैं फिर से चलना शुरू कर देती हूं.

खड़ी चढ़ाई पर चलते हुए बहुत जगह हमें चाय की टपरियां बंद पड़ी हुई मिली हैं. सुना है अगस्त की सोलह और सत्रह तारीख को यहां भद्रज का विशाल मेला लगता है. अभी यहां मुश्किल से एक  मैगी प्वांइट खुला हुआ है जहां बोरसी जल रही है उसके चारों तरफ आग तापने के लिए लड़के-लड़कियों की बेशूमार भीड़ लगी है.मैगी भी बनायी जा रही है. किंतु हमें क्या? हम तो अपना खाना घर से ही लाये हैं.

बीच-बीच में जब गला सूख रहा है तो हम कभी जूस पी रहे हैं कभी टाफियां मुंह में डालकर गले को तर कर रहे हैं. कभी रुककर सूरज से चेहरे को छिपाकर विस्तीर्ण ढालदार छोटी-छोटी पहाड़ियों की लीक को देखते हैं जो  एक कतार में खड़े हुए तंबुओं की भांति प्रतीत हो रही है. कहीं  ढलान पर  पर मुझे  गेंदे के पीले फूलों की विस्तीर्ण चादर ओढ़े धरा किसी षोडसी की तरह पैर पसारे हुए धूप का आनंद लेते हुए बैठी हुई नज़र आ रही है.

दिन के दो बजे हैं और हम आख़िरकार मंदिर के परिसर में  हांफते हुए पहुंच ही गये हैं. पहुंचते ही भद्रज के मंदिर पर दृगों का फिसलना मानो “अंधियारी गलियों से निकलकर अचानक से शुभ्र -धवल सी चमकती मणि का दर्शन होना”. “एक अलौकिक अनुभूति” है यह.

हवायें बहुत कर्मठ हैं यहां की..मुझे तो यह हवायें साकार स्वरुप में साध्वी सी महसूस हो रही हैं जो नि:स्वार्थ,निरंतर ईश्वर की साधना में रत मंदिर का  कोना-कोना बुहार रही हैं. मैं थोड़ी देर के लिए अहसासों की भव्य दृश्यावली में गुम हो गयी. लोहे की जालियों के साफसुथरे परिसर के बीचों- बीच एक अद्भुत शैली में सफेद संगमरमर का बना हुआ गुंबदनुमा मंदिर और बाहर ढलान पर बांझ के पेड़ो की तिरछी कतार. सफेद और गहरे हरे रंग का समिश्रण एक सार्वभौम सत्ता और उसकी कृति का अनुपम उदाहरण है यह भद्रज मंदिर और उस पर बांझ के अनुपम सौंदर्य की अवर्णित प्राचीर.

किंतु यह बात नाग़वार गुजर रही है मुझे कि मंदिर के ख़ूबसूरत परिसर के नीचे कोल्ड ड्रिंक की बोतलों का ढेर,चिप्स के खाली पैकेट और भी ना जाने क्या-क्या अपशिष्ट फैला हुआ है. यह पर्यटकों की प्रकृति के संरक्षण के प्रति उदासीनता नहीं तो और क्या है?

हमने जितना उठाया जा सकता था कूड़ा उठाकर  मंदिर के प्रांगण में रखे कूड़ादान में डाल दिया है.

कितनी शर्म की बात है  ना? और यह हमारा

दुर्भाग्य है कि प्रकृति और दैवीय दर्शन की इस विस्तृत सौंदर्यमय छटा को हम पाश्चात्य जीवन जीने के सलीके और आधुनिक  मानसिकता से आक्रान्त केवल भोग्य वस्तु समझ रहे हैं. और भ्रम की इसी  विकास की आधुनिक धारणा के कारण हम प्रकृति का अनर्गल दोहन करते हैं. हमें क्या अंदाज़ा भी है कि हम प्रकृति का नहीं, स्वयं अपने विनाश और बर्बाद होने का अवश्यंभावी रास्ता तैयार कर रहे हैं. मंथन करने का विषय है यह कि क्या हम कभी इस जटिल जीवन की दुश्वारियों से प्रकृति के उस प्राचीन स्वरुप में वापस लौट पायेंगे? यह तभी संभव है ना जब हम सभी प्रकृति को संवारने के प्रति ज़िम्मेदाराना व्यवहार करेंगे?

पहाड़ों की ओर रूख़ करना यूं तो एक सजग मन के लिए सृजनशीलता को पोषित करने का प्रकृति प्रदत्त सुअवसर भी है. बशर्ते यात्राओं के दौरान सामान के साथ-साथ विचार भी स्कंधों पर ढोये जायें.

मुझ जैसों के पहाड़ों की ओर यदि कदम चल पड़े तो  बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है जैसे कि  पहाड़ों के फ्रेम में  स्वयं की ख़ूबसूरत तस्वीर,नदी के आइने में स्वयं का ख़ूबसूरत प्रतिबिंब.

हम मंदिर के प्रांगण में चारों तरफ घूम रहे हैं एक अजीब सा सुक़ून है मुझे. शायद यह मेरी योजना के साकार होने का प्रतिफल है या खड़ी चढ़ाई चढ़ने के उपरान्त विजय-पताका फहराने का जश्न है. हम हरी घास पर बैठ कर मंदिर को हर द्रष्टिकोण से देख रहे हैं.

मैंने उठकर मंदिर और उसके आसपास फैली हुई प्रकृति  की छटा की तस्वीरें लेनी शुरू कर दी हैं.

मंदिर के ऊपर निर्मल नीला आकाश है और उस पर मोगरे के फूल से बिखरे हुए बादल बहुत ख़ूबसूरत दिख रहे हैं. यह क्या? मंदिर के ठीक नीचे लंबवत  खड़ी होती हूं मैं तो ऊपर देखने पर मुझे मंदिर बादलों के साथ चलता हुआ दिखाई दे रहा है.थोड़ा सा चक्कर भी महसूस हो रहा है. ये मंदिर के अनुपम सौन्दर्य को देखकर मतिभ्रम है या कोई वैज्ञानिक दृष्टिकोण? पता नहीं? इतना कुछ नहीं जानती हूं मैं.

भद्रज भगवान  के दर्शन के लिए हम मंदिर में प्रवेश कर रहे हैं. पंडित जी से पता चला है कि यहां दूध,मक्खन,मिश्री,रोट,हलुआ प्रसाद के रुप में भगवान बलराज  को चढाया जाता है.

हम यह सब कुछ नहीं लाये हैं मंदिर के लिए हमने सिर्फ़ पैसे चढ़ा दिये हैं. पंडित जी से काफ़ी देर मैंने बात की और मंदिर से संबंधित बहुत सी जानकारी हासिल की है. एक बड़े से अहाते में भद्रज मंदिर फैला हुआ है. मंदिर पूरा हवादार है और पूरा सफेद संगमरमर से बना हुआ है. चारों तरफ़ बांझ के पेड़ों का कारवां है. मंदिर के नीचे मीलों दूर दृष्टिगत पतली सुनहरी लकीर सी बहती यमुना नदी दिखाई दे रही है. मंदिर के परिसर में पर्यटकों से ज़्यादा स्कूली छात्र-छात्राओं का जमावड़ा लगा हुआ है.सभी सेल्फी और फोटो लेने में व्यस्त हैं. इन छात्र-छात्राओं के व्यवहार से पंडित जी शायद आहत हैं जो उनसे बातचीत के दौरान उनकी बातों में झलका.

चिट्ट गोरी धूप खिली हुई है हम सभी ने  अपने जैकेट उतार दिये हैं. नीले स्वच्छ आसमान में सफेद बादल तो हैं लेकिन धूप की राह में कोई बाधा नहीं बन रहे हैं. सहसा  सफेद बादल काले हो गये हैं और आदतन  काले मेघों ने सूरज को दबोच लिया है और देखते ही देखते बारिश की हल्की बूंदों ने सिर्फ़ हमारे चेहरे को भिगो दिया है.ऐसे ही तो होता है यहां पहाड़ का मौसम,,,अभी धूप  और अभी बारिश..खासकर दोपहर  दो बजे के बाद का मौसम तो अनिश्चत ही है यहां पर,इसलिए अगर पहाड़ों पर घुमने के लिए आ रहे हैं तो छाता हमेशा साथ में रखना चाहिए.हमारे पास छाता है किंतु नीचे कार में ही छूट गया है.

हमारे वापस लौटने का समय हो गया है. जाने का मन तो नहीं हो रहा है इस अद्भुत दैवीय सत्ता और दैवीय कृति  से बिछड़ुने का लेकिन क्या कहूं? लौटना भी तो एक स्वाभाविक क्रिया है भावनाओं के चरमोत्कर्ष से उतरने की ओर..!

अथार्त किसी ऊंचाई  से ढलान की ओर वापस लौटना समापन नहीं है अपितु तीव्र आरंभ है उपलब्धियों को नया आकार देने का.लौटना एक शाश्वत  क्रिया भी है किसी गतिशीलता से लौटकर आत्ममंथन का जहां सारी दुविधायें सिकुड़ कर मष्तिष्क के किसी कोने में दुबक जाती हैं.

चढ़ने की ही तरह उतरना भी परिष्करण है जीवन का जहां संपूर्ण मानवीय विकार मानव की एड़ी में एकत्रित हो जाते हैं.

जो भी है मेरे लिए वापस लौटना आत्मसुकून के उपरांत मेरे पैरों की धमनीयों में रूधिर का तीव्रगति से दौड़ना भी है.

और हम बिल्कुल भी थका हुआ महसूस नहीं कर रहे हैं हम सड़क की ढाल पर तेजी से चल रहे हैं बहुत तेज़ भूख लग आयी है. सोच रहे हैं किसी अच्छी सी जगह पर रुककर गैस पर गरम-गरम चावल बना लेंगे.

हमारे आगे-आगे तीन चार लोग जो कि हरियाणा से हैं यह जानकारी मुझे इसलिए है क्योंकि इन्होंने भी अपनी कार हमारी कार के ही  पीछे खड़ी कर दी है जिस पर हरियाणा का नंबर लिखा हुआ है.ये भी थके-मांदे से ढलान पर उतर रहे हैं. इनमें से एक आदमी के हाथ में रेडियो है जिस पर यह गाना बज रहा है.

मौसम..मौसम लवली.. मौसम

मेरा तो जैसे मूड ही फ्रेश हो गया है.मैंने तो इस ख़ूबसूरत गाने को बिसरा ही दिया था अपने ज़ेहन से.

घर जाकर बार-बार सुनूंगी इस गाने को.

शाम के चार बज गये हैं और हम जहां कार खड़ी है वहां पहुंच गए है.जल्दी से कार में बैठ कर किसी अच्छे  स्थान पर कार रोकने की  सोच रहे हैं ताकि गरम-गरम चावल बना सकें.

फिर वही सर्पीली  घुमावदार रोड पर हम चल रहे हैं. सर्दी बहुत है शाम ने सूरज को अपना आंचल ओढा दिया है. वही घास,फूल और वनस्पति से गुलज़ार मैदान अब वीराने में तब्दील हो गये हैं इन्हीं विरानी के सपाट समतल पर किसी सैलानी ने रात यहीं बसर करने के लिए तंबू गाढ़ा है. यही कहूंगी,”जीने के लिए सबका अपना-अपना जुनून है.” इस जूनून का मेरी तरफ़ से भी स्वागत है. क्योंकि मेरा भी स्वपन्न है कि किसी ऐसे बुग्याल पर  तंबू में रात गुजारुं जहां पास ही  कोई ताल हो जहां अथाह ब्रह्मकमल खिले  हुए हों.

ख़ैर सपने तो सपने हैं देखने में हमारा कुछ नहीं बिगड़ता.

हम चले जा रहे हैं सूरज डूबता हुआ हमारे पीछे-पीछे दौड़ रहा है. अभी हम एक चाय की दुकान से गुज़र रहे हैं जिसके बाहर स्थानीय लोगों का मज़मा है शायद ताश- पत्ती खेल रहे हैं ये सभी. इनकी बला से.. घर की महिलाएं मवेशियों के लिए चारा-पत्ती का जुगाड कर रही होंगी या रात की रसोई की तैयारी कर रही होंगी ये बेफ़िक्र लोग डूबे हैं अपने भ्रमजाल में.

वाह री पहाड़ों की रवायत.!

हम फिर ढलान में पतली सड़क पर  चल रहे हैं फिर चढ़ाई आ गयी हैं कार ने फिर आगे बढ़ने से मना कर दिया है. हम दोनों सहेलियों को लग रहा है कि हमें नीचे उतर जाना चाहिए शायद कार को थोड़ी राहत महसूस हो जाये. लेकिन सब निरर्थक..!

पतिदेव के बहुत प्रयास करने पर और हम तीनों के धक्का लगाने पर भी कार चढ़ाई पर नहीं चढ़ पा रही है.

वह तो शुक्र है ईश्वर का कि सड़क पर मज़दूर काम कर रहे हैं.मज़दूर महिलायें काम छोड़कर हमें देख रही हैं तभी एक यूटिलिटी सड़क के लिए बजरी रेत लेकर आयी है. पतिदेव और उनके मित्र ने उसके चालक को मदद करने के लिए विनती की है.उसका कहना है कि कार को काफी पीछे ले जाकर मोशन बनाकर कार से चढ़ाई चढ़नी चाहिए.

कार चालक ने एक ही प्रयास में कार को चढ़ाई पार करवा दी है लेकिन टायरों से अजीब सी जलने की बदबू आ रही है.

हम चारों हांफते हुए कार के पीछे-पीछे जा रहे हैं.

फिर हमारा सफ़र वापसी की ओर..

कोई अनूकूल स्थान जहां कि हम सड़क के किनारे बैठकर आराम से खाना गर्म करके चावल  बनाकर थोड़ा सुस्ता सकें ऐसी जगह हमें अभी मिली नहीं है.

यह तलाश आख़िरकार हाथी पांव पर ही खत्म हुई है.

शाम के छः बज गये हैं अंधेरा हो गया है कुछ दिखाई नहीं दे रहा है वह तो अच्छा है कि मैंने अपने सामान के साथ टार्च भी रखी हुई  है. हमने कार से उतरकर सड़क के किनारे दरी बिछा ली है ,साथ ही गैस भी उतार दिया है. अब कौन चावल बनाये? मन भी नहीं है चावल खाने का. देर भी तो बहुत हो गयी है.हमारे पास राजमा है सब्जी,रोटी है उसी को गर्म करके खा रहे हैं. हम दोनों सहेलियां टार्च लेकर झाड़ियों में निवृत्त होकर आ गयी हैं.

ठंड इतनी है कि बाहर बैठा नहीं जा रहा है हम दोनों सहेलियां सबकुछ बाहर छोड़कर सीधे कार के अंदर आकर बैठ गये हैं.

बाकि का सब काम  पतियों के हवाले, फिर दोनों दोस्तों ने  चाय बनाकर स्टील के गिलास में हम दोनों को चाय थमा दी है.

जहां सर्द कुहासे से चाय की भाप का संसर्ग  हो रहा है वहीं हम दोनों सखियों की बतकही शुरु हो गयी है.

अंततः मुसाफिरों की मंजिल जहां से आये हैं वहीं की ओर वापस. यानी देहरादून की ओर.

किसी के मुंह में कोई  आवाज़ नहीं यात्रा की ख़ुमारी  जो है सभी को और मैं कार के भीतर पहले मौन और सड़क की खलबली में भद्रज मंदिर की झलकियों को  अपने मन में संजोये आत्मसंतुष्टि की मीठी झपकी लेती हुई वापसी की ओर.

इस यात्रा से यही सबक सीखा है मैंने की सच्चे हृदय से की गयी प्रार्थना और सदाचार के साथ किये गये प्रयासों को फलीभूत होना ही होता है. या फिर दैवीय आमंत्रण था यह हमारे लिए उसकी एकछत्र सत्ता में विचरने का? ईश्वर तेरा लाख-लाख धन्यवाद इस आमंत्रण के लिए.

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Himantar Uttarakhand

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास

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