संस्मरण

“बोल्ड परीक्षा’’

“बोल्ड परीक्षा’’

संस्मरण
डॉ. अमिता प्रकाश जी! आप चैंकिए मत! थी यह बोर्ड परीक्षा ही, लेकिन हम चैड़ूधार के सभी छात्र-छात्राओं उर्फ छोर-छ्वारों के लिए पांचवी की बोल्ड परीक्षा ही होती थी. वैसे तो परीक्षा हर because साल होती रही होगी, पर हमें उसका आभास कभी हुआ ही नहीं. बिल्कुल तनावमुक्त व भयमुक्त परीक्षा होती थी हमारी. रोज की तरह स्कूल गए ,गुर्जी ने जो कुछ लिखने को कहा लिखा,  कॉपी गुर्रजी को थमाई , थोड़ी देर खेला कूदा, और फिर अगले दिन के लिए गुर्र जी जो कुछ लिखने के लिए देने वाले होते उसका रिवीजन उर्फ रट्टाफिकेशन जोर-जोर से होता. कानों में उंगली देकर और जोर से हिल हिल कर. एक खास बात यह जरुर होती कि इस रट्टाफिकेशन के दिनों में विद्यालय के जो तीन अन्य कमरे हमेशा बंद रहते थे वह खुल जाते.पासिंग आउट परेड कक्षा 5 को अलग कमरा, कक्षा 4 को अलग तथा कक्षा 3 को अलग कमरा आवंटित हो जाता. गुरुजी हर कक्षा को याद करने के लिए सामग्र...
बामणों के घर में खुखरी थोड़ी होने वाली हुई

बामणों के घर में खुखरी थोड़ी होने वाली हुई

संस्मरण
पहाड़ की शैतानियां-1ललित फुलारापहाड़ की स्मृतियों के नाम पर मेरे पास शैतानियों की भरमार है. उट-पटांग किस्से हैं, जिनको स्मरण कर बस हंसी आती है. यकीन नहीं होता, बचपन इतना जिद्दी, उजड्ड, उद्दंड so और असभ्य रहा. जिद्दीपन अब भी है, पर शैतानियां साथ छोड़ गई हैं. उद्दंडता के बाद बचपन में पड़ने वाली ईजा की मार और गालियां अब भी आंचल-सी लिपटी महसूस होती हैं. उंगलियों से ईजा की धोती के पल्लू को लपेटकर सिसकियां भरने so वाले दृश्य जेहन में उभर आते हैं. ईजा जितनी बार गुस्सा होती, सिर फोड़ने और कमर तोड़ने की ही बात करती! पहाड़ की संस्कृति में इन दो गालियों का अपना ही रसास्वादन है. विरला ही होगा जिसकी ईजा ने उस पर इन गालियों का स्नेह न बरसाया हो.कमर कमर के मामले में, मैं सौभाग्यशाली रहा पर सिर बहुत बार फूटा. ऐसा फूटा हुआ है कि अगर कपाल के बाल दान कर दिए जाएं, तो घाव के निशान प्रामाणिकता के...
पिता की ‘छतरी’ के साथ चलने का सुख

पिता की ‘छतरी’ के साथ चलने का सुख

संस्मरण
बाबू की पुण्यतिथि (27 फरवरी, 2015) पर स्मरण चारु तिवारीपिता के सफर में जरूरी हिस्सा थी छतरी दुःख-सुख की साथी सावन की बूंदाबादी में जीवन की अंतिम यात्रा में मरघट तक so विदा करते पिता को एक तरफ कोने में बैठी सुबकती रही मेरे साथ रस्म-पगड़ी के बाद मेरे साथ but आई सड़क तक पिता का हाथ थामे चुपचाप रास्ते भर so सींचकर मस्तिष्क की भुरभुरी मिट्टी अंकुरित करती रही स्मृतियों के अनगिनत बीज भादो की तेज because बारिश में छोटे बच्चे-सा so दुबका लेती है गोदी में फिर भी पसीज जाता है मन छत पर अतरती सीलन-सा तपती धूप में बैठकर but मेरे कंधे पर चिढ़ाती है अंगूठा दिखाकर तमतमाते so सूरज का मुंह जब होता हूं आहत दुनियादारी के दुःखों से अनेक पैबन्द because लगीं पिता की छतरी रखती है मेरे सिर पर आशीर्वाद भरे हाथ करवट बदलते मौसम में उत्तराखंड मौसम पहचानता है जिस तरह पतझड़ के बाद...
भैया! क्या कोई नरक आश्रम भी है…

भैया! क्या कोई नरक आश्रम भी है…

संस्मरण
पसंद आ गया न, कुछ पैसे दे तो बाकी जब शिफ्ट करोगे तब दे देना, स्वर्ग आश्रम से अच्छा तुमको कहीं मिलेगा भी नहीं...प्रकाश उप्रेती  अतीत में... बात 2012 की है. कॉलेज की जिंदगी निपटने में बस एक बसंत ही बाकी था. उसी बसंत में उत्तरप्रदेश पीसीएस का फॉर्म भर दिया था क्योंकि तब अपने इर्दगिर्द यूपीएससी वालों का जमावड़ा था. because कोई तैयारी कर रहा था, किसी के भैया कर चुके थे, किसी का दोस्त इलाहाबाद से दिल्ली तैयारी के लिए आ रहा था, किसी के सीनियर का हो गया था, कोई बाबा बन चुका था और कोचिंग सेंटर चलाने लग गया था. because इस माहौल में भला हम कैसे किनारे पर खड़े रहते. हमने भी उस 'कोसी' में डुबकी लगा ही ली.अब मसला तैरने का था तो उसके लिए सबसे पहले कोसी के तट यानि मुखर्जीनगर के आसपास कमरे की तलाश शुरू कर दी थी.यूपीएससीनॉर्थ कैंपस में रहते हुए because दाढ़ी निकल आई थी लेकिन इस कॉलोनी के ...
मैं उस पहाड़ी मुस्लिम स्त्री की हवा से  मुखातिब हो रही हूं…

मैं उस पहाड़ी मुस्लिम स्त्री की हवा से  मुखातिब हो रही हूं…

संस्मरण
दुर्गाभवन स्मृतियों सेनीलम पांडेय ‘नील’जब हम किसी से दूर हों रहे होते हैं, तब हम उसकी कीमत समझने लगते हैं. कुछ ऐसा ही हो रहा है आज भी. कुछ ही पलों के बाद हम हमेशा के लिए यहां से दूर हो जाएंगे. so फिर शायद कभी नहीं मिल पाएंगे इस जगह से. कितना मुश्किल होता है ना, अपना बचपन का घर छोड़ना, तब और मुश्किल होती है, जब हम उसको हमेशा के लिए छोड़ रहे हों. कारण बहुत रहे, मैं कारण पर नहीं जाना चाहती हूं, उसका जिक्र फिर कभी करूंगी. किन्तु आज मन कह रहा है कि- बचपन मुठ्ठी भर अलविदा लेते because जाना गर लौट रहे हो, जीवन की शरहदों because में खामोशी बहुत है रोज आकर  लौटso रही थी, जो हवाएं  मेरे द्वार से मुझे but ही खटखटाकर, देखना किसी रोज गुम  हो because जाएंगी मुझे सुलाकर. मैं सबसे ऊपर वाले खेत के so मुहाने पर बैठकर सोच रही हूं, बचपनमेरे छल जो because मुझे बचपन में लगते रहे हैं और पू...
गोपाल की ईमानदारी व परिश्रम का हर कोई कायल है…

गोपाल की ईमानदारी व परिश्रम का हर कोई कायल है…

संस्मरण
गोपाल आ गया है…प्रकाश चन्द्र पुनेठामैं अपने एक मंजिले भवन को परिवार के सदस्यों की भविष्य में संख्या बढ़ने के बारे में सोचता हुआ दुमंजिला बनवा रहा था. इस कार्य के लिए मजदूरों की आवश्यकता थी. पिथौरागढ़ में स्थानीय मजदूर न के बराबर मिलते है. अतः यहां मजदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार व पड़ोसी देश नेपाल उपलब्ध हो पाते हैं. बिहार के अधिकतर कुशल मजदूर हैं. राजमिस्त्री, कारपेन्टर, पेन्टर व लोहा काटने वाले कुशल मजदूर अधिकतर बिहार राज्य के मिलते है. वर्तमान में जहां भी भवन निर्माण कार्य हो रहा हैं वहां बिहार के मजदूरों का अधिपत्य हैं. अकुशल मजदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश या नेपाल के मिलते है. शारीरिक श्रम में एक नेपाली मजदूर अन्य क्षेत्रों के मजदूरों की अपेक्षा अधिक सक्षम होते हैं. नेपालजब मेरा मेरा मकान पूर्ण रुप से निर्मित हो गया. सब मजदूर अपनी मजदूरी लेकर संतुष्ट होकर चले गए. किन्तु गोपा...
वो अद्भुत दाम्पत्य

वो अद्भुत दाम्पत्य

संस्मरण
वो लड़की गांव की भाग- 1एम जोशी हिमानीएक कहावत है ' सुखद दाम्पत्य जीवन का बहुत बड़ा वरदान है'. बहुत भाग्यशाली होते हैं वे लोग, जिनके जीवन में यह कहावत चरितार्थ होती है. मैं भी भाग्यशाली हूं कि मैं ने अपनी आंखों से अपने आमा-बडबौज्यू (दादा-दादी) का ऐसा दाम्पत्य देखा है. बहुत से लोगों को मेरी बातें कपोल-कल्पित और अतिशयोक्ति पूर्ण लग सकती हैं लेकिन उससे मेरा सच बदल नहीं जाएगा. दीन-दुनियां की हाय-हाय, चिंताओं, परेशानियों से बहुत दूर थी मेरे बड़ बौज्यू की दुनिया. घर परिवार में रहते हुए भी वे अपनी आंतरिक दुनिया में मगन रहते थे. आमा का नाम तारा था परंतु वे उनको हमेशा 'हरि' नाम से बुलाते थे. अपने बच्चों के नाम भी उन्होंने लक्ष्मी दत्त, हरगोविंद, हरिप्रिया और तुलसी रखा था ताकि हर वक्त किसी न किसी रूप में ईश्वर का नाम उनकी जिह्वा पर बना रहे. बर्फ़ पड़ रही हो या बारिश, चाहे कैसा भी मौ...
पगडंडी

पगडंडी

संस्मरण
वो बचपन की सारी यादें…दीपशिखा गुसाईं ‘दीप’आज फिर उसी पगडण्डी से होते हुए चलती हुई उन यादों में खो जाती हूँ, अपने गांव और गांव के नीचे बहती अलकनंदा की कलरव करती मधुर आवाज, सामने वही मेरा दृढ पहाड़, वही मेरे गांव के सरसों के खेत मानों मेरे आने पर पीली ओढ़नी ओढ़े बसंत संग मेरे आने के स्वागत में दोनों हाथों को फैलाये हो… इस बार फिर वही अहसास साथ "दी" का सारी यादें ताजा कर गई… वो बचपन की सारी यादें.बचपनउन दिनों सुबहें कितनी जल्दी हुआ करतीं थीं, शामें भी कुछ जल्दी घिर आया करती थीं तब... फूलों की महक भीनी हुआ करती थी और तितलियाँ रंगीन, और इन्द्रधनुष के रंग थोड़े चमकीले, थोड़े गीले हुआ करते थे, आँखों में तैरते ख़्वाब, सुबह होते ही चीं-चीं करती गौरैया छत पर आ जाया करतीं थीं दाना चुगने, उस प्यारी सी आवाज़ से जब नींदें टूटा करती थीं तो बरबस ही एक मुस्कुराहट तैर जाया करती थी होंठों पर.....
घने अंधेरे में जब गधेरे से बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी

घने अंधेरे में जब गधेरे से बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी

संस्मरण
ललित फुलारामैं कुंवर चंद जी के साथ रात के because तीसरे पहर में सुनसान घाटी से आ रहा था. यह पहर पूरी तरह से तामसिक होता है. कभी भूत लगा हो, तो याद कर लें रात्रि 12 से 3 बजे का वक्त तो नहीं! अचानक कुंवर चंद जी मुझसे बोले 'अगर ऐसा लगे कि पीछे से को¬ई आवाज दे रहा है, तो मुड़ना नहीं. रोए, तो देखना नहीं. छल पर भरोसा मत करना, सीधे बढ़ना.. मन डरे, कुछ अहसास हो, तो हनुमान चालिसा स्मरण करो. मैं साथ हूं.कुंवरअचानक बच्चा रोया because और छण-छण शुरू हो गई. मैंने पीछे देखना चाहा, तो उन्होंने गर्दन आगे करते हुए 'बस आगे देखो. चलते रहो. छल रहा है. भ्रमित मत होना. कुछ भी दिखे यकीन मत करना. जो दिख रहा है, वो है नहीं और जो है, वह अपनी माया रच रहा है.'भ्रमित आसपास बस घाटियां थीं. झाड़ झंखाड़. because गधेरे. ऊपर जंगल और नीचे नदी जिसकी आवाज भी थम चुकी थी. अंधेरा घना. मैं आगे था और कुंवर चंद जी ...
अमलावा नदी में दो तैरती मछलियां

अमलावा नदी में दो तैरती मछलियां

संस्मरण
स्मृतियों के उस पार...सुनीता भट्ट पैन्यूलीपहाड़, नदी because और खेत पहाड़ी लोग और उनके जीवन के बीच बना हुआ अनंत  सेतु है जिस पर आवाजाही किये बिना पहाड़ी लोग जीवन की जटिलता को भोगकर स्वयं के लिए सुगम रास्ता नहीं बना सकते. कहना ग़लत न होगा पहाड़, नदी, और खेत तप-स्थल हैं because पहाड़ियों के अभ्यास करने के जिनके इर्द-गिर्द उनके स्वप्न, उनकी उम्मीदें उनके जीवन के उद्देश्य धीरे-धीरे अंगड़ाई लेते हैं फिर पूरे वेग के साथ कुलांचे मारते हैं.नदी पहाड़ ने बहुत कुछ दिया है मैदान को, because पहाड़ ने स्वच्छ हवा दी है, स्वच्छ पानी दिया है, ताजा अनाज, फल और सब्जियां दी हैं  साथ ही समृद्धि  भी दी है. यही नहीं पहाड़ के प्रति हमें कृतार्थ होना चाहिए क्योंकि पहाड़ ने  देश व समाज को नई-नई प्रतिभायें  भी दी हैं.नदी आप यदि बस में बैठकर शहर से गांवों की because ओर जा रहे हैं तो आपको शहर और गा...