साहित्‍य-संस्कृति

किताब कौतिक अभियान: देवभूमि से उपजा एक रचनात्मक विचार

किताब कौतिक अभियान: देवभूमि से उपजा एक रचनात्मक विचार

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उत्तराखंड में “पढ़ने लिखने की संस्कृति” को बढ़ावा देने और राज्य के अनछुए पर्यटक स्थलों के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करने के विचार के साथ कुछ रचनात्मक युवाओं ने साल 2022 के अंतिम दिनों में एक अनूठा प्रयोग किया. "किताब कौतिक" के नाम से शुरू किया गया यह प्रयोग अब एक अभियान का रूप ले चुका है. 24 और 25 दिसंबर 2022 को चंपावत जिले के छोटे से कस्बे टनकपुर में "किताब कौतिक" का यह विचार धरातल पर उतरा और पूरे देश में चर्चित हो गया. एक साल के भीतर कुमाऊं के सभी जिलों में “किताब कौतिक” के सात सफल आयोजनों के बाद पुनः दिसंबर 2023 में टनकपुर में ही "आठवां किताब कौतिक" होने जा रहा है. "किताब कौतिक" अभियान के मुख्य संयोजक हेम पंत ने बताया कि "आओ, दोस्ती करें किताबों से" के आह्वान के साथ यह पुस्तक मेला टनकपुर, बैजनाथ, चम्पावत, पिथौरागढ़, द्वाराहाट, भीमताल और नानकमत्ता जैसी जगहों में आयोजित हो चुका है. पर्य...
केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की सलाहकार समिति के सदस्य नामित हुए डॉ. वेद मित्र

केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की सलाहकार समिति के सदस्य नामित हुए डॉ. वेद मित्र

साहित्‍य-संस्कृति
साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए कई संस्थाओं से वेद मित्र हुए हैं सम्मानित दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वेद मित्र शुक्ल को केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, दिल्ली क्षेत्र की सलाहकार समिति का सदस्य नामित किया गया है. विदित हो कला, साहित्य, संगीत, शिक्षा, फिल्म, विज्ञान, कानून आदि क्षेत्रों में विशिष्ट उपलब्धियों व महत्वपूर्ण योगदान देने वाली शख्सियतों को सरकार द्वारा इस पद पर नामित किए जाने की परंपरा रही है. भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा संचालित केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड देश भर में स्थापित अपने नौ क्षेत्रीय कार्यालयों के साथ फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन का नियंत्रण करता है.  डॉ. वेद मित्र को उनमें से एक दिल्ली क्षेत्र के फिल्म प्रमाणन बोर्ड का सदस्य नामित किया गया है. दिल्ली क्षेत्र में किसी भी भाषा में बनने वा...
सनातन है जीवन का आमंत्रण 

सनातन है जीवन का आमंत्रण 

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  यह भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि Hinduजैसे अत्यंत व्यापक महत्व के सदाशयी विचारों को लेकर अर्थ का अनर्थ करने जैसी चर्चाएँ चल रही हैं। इन अवधारणाओं का अवमूल्यन हो रहा है। पहले बिना जाने बूझे इन्हें ‘विज्ञानविरोधी’ घोषित किया  गया था और उसे आडम्बर और ढोंग की श्रेणी में रख व्यर्थ मान लिया गया। भौतिक और आध्यात्मिक की दो श्रेणियाँ बनाई गईं । इसके साथ यथार्थ और कल्पित का भेद किया गया। शरीर और आत्मा के रिश्ते को विच्छिन्न कर दिया गया। भौतिक विज्ञान के अनुकूल जो अस्तित्व में होता है उसका एक ही स्वरूप स्वीकार किया गया कि वह सिर्फ़ वस्तु हो सकता है। फलतः सब कुछको  (जो विद्यमान है) वस्तु की श्रेणी में रखा गया। अब राजनीति की सहूलियत देखते हुए उसमें अनेक दूसरे दोष देखे पहचाने जा रहे हैं। ‘सनातन धर्म’ को लेकर उसे उसके मूल भाव से काट कर उस पर तोहमत जड़ कर उसकी छवि धूमिल करने की ...
मित्रता दिवस : सार्थक कल्पनाओं से दुनिया बेहतरीन दिखती है

मित्रता दिवस : सार्थक कल्पनाओं से दुनिया बेहतरीन दिखती है

साहित्‍य-संस्कृति
नीलम पांडेय ‘नील’, देहरादून साथी... समाज जिस गतिशीलता के साथ आगे बढ़ रहा है, वहां मित्रता के मायने में कई छुपी हुई महत्वाकांक्षाएं जन्म ले चुकी होती हैं. सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, तकनीकी चुनौतियां हमारे व्यक्तिगत संबंधों पर भारी पड़ रही हैं, किंतु हमें मित्रता की मौलिक अवधारणा को बचाना होगा. आज तक हमने जितनी भी बातें की होंगी, वहां हम स्वयं के निजी स्वार्थो में बंधे रहे, हमारी मित्रता समय की धारा में बह रही होती है, किंतु समय को समृद्ध करना भी हमारी जिम्मेदारी होती है. समृद्ध समय हमारे हिस्से और हमारी अनगिनत पीढ़ियों के हिस्से में एक भयमुक्त वातावरण तैयार करेगा, जहां मित्रता को ईश्वर के समतुल्य रखा जाएगा. हमारी चाहना में एक समृद्ध मित्रता भविष्य को बदलने की क्षमता रखेगी. एक दिन धर्म का नाम मित्र होगा. एक दिन समाप्त हो जाएंगे सारे विश्व युद्ध, एक दिन सभी गृह युद्धों का स्वरूप बदल जाएगा....
विद्या के परिसर में सीखने-सिखाने की संस्कृति बहाल की जाए!

विद्या के परिसर में सीखने-सिखाने की संस्कृति बहाल की जाए!

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  कहा जाता है धरती पर ज्ञान जैसी कोई दूसरी पवित्र वस्तु नहीं है. भारत में प्राचीन काल से ही न केवल ज्ञान की महिमा गाई जाती रही है बल्कि उसकी साधना भी होती आ रही है. इस बात का असंदिग्ध प्रमाण देती है काल के क्रूर थपेड़ों के बावजूद अभी भी शेष बची विशाल ज्ञानराशि. अनेकानेक ग्रंथों तथा पांडुलिपियों में उपस्थित यह विपुल सामग्री भारत की वाचिक परम्परा की अनूठी उपलब्धि के रूप में वैश्विक स्तर पर अतुलनीय और आश्चर्यकारी है. यह हमारे लिए सचमुच गौरव का विषय है कि आज जैसी उन्नत संचार तकनीकी के अभाव में भी मानव स्मृति में भाषा के कोड में संरक्षित हो कर यह सब जीवित रह सका. इस परम्परा में मनुष्य के जीवन में होने वाले आरम्भ में विकास और उत्तर काल में ह्रास की अकाट्य सच्चाई को स्वीकार करते हुए मनुष्य को जीने के लिए तैयार करने की व्यवस्था की गई थी. ज्ञान केंद्रित भारतीय संस्कृति के अंतर...
कभी घर की रसोई में बादशाहत थी कांसे के बर्तनों की

कभी घर की रसोई में बादशाहत थी कांसे के बर्तनों की

साहित्‍य-संस्कृति
भुवन चंद्र पंत पांच-छः दशक पहले तक पीतल, तांबे और कांसे के बर्तनों की जो धाक घरों में हुआ करती, उससे उस घर की सम्पन्नता का परिचय मिलता. रईस परिवारों में चांदी के बर्तनों की जो अहमियत थी, सामान्य परिवारों में कांसे के बर्तन को वही सम्मान दिया जाता. पानी के लिए तांबे का फौव (गगरी) तो हर घर की शान हुआ करता. तब ’आर ओ’ व ’वाटर फिल्टर’ जैसे उपकरण नहीं थे और पानी की शुद्धता के लिए तांबे के बर्तनों का प्रयोग ही एकमात्र विकल्प था. सामान्य परिवारों में कलई की हुई पीतल की थालियां आम थी, जब कि कांसे की थालियां व अन्य बर्तन प्रत्येक घर में सीमित संख्या में होते और इन्हें सहेज कर जतन से रखा जाता. घर में कांसे के एक दो ही बर्तन होते तो घर के मुखिया को ही कांसे की थाली में भोजन परोसा जाता. पीतल की कलई युक्त थालियों का कुछ समय प्रयोग करने के बाद उनकी कलई उतर जाती और पीतल का असली रंग उभर आता. पीतल के कलई ...
जौनसार: अनोखी परम्परा है रहिणी जीमात   

जौनसार: अनोखी परम्परा है रहिणी जीमात   

साहित्‍य-संस्कृति
फकीरा सिंह चौहान स्नेही भारतीय संस्कृति में क्या खूब कहा गया है-  ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात जहां नारी की पूजा की जाती है, उसका सम्मान किया जाता है वहां देवताओं का वास होता है. मैं यह बात बड़े गर्व के साथ कह सकता हूं पहाड़ की संस्कृति के अंदर बहुत सारे ऐसे उदाहरण है जहां वास्तव में पुरुष प्रधान देश होने के बाद भी नारी को प्रथम स्थान तथा सम्मान दिया जाता है. जौनसार बावर के अंदर जो भी संस्कृति है वह अद्भुत और अनुकरणीय है. और सबसे बड़ी बात यह कि वह अपने आप मे अन्य संस्कृति से विशिष्ट है. इसी विशिष्टता के कारण इस क्षेत्र की कला संस्कृति और सभ्यता दुनिया को अपनी और आकर्षित करती है. जब भी हम जौनसार बावर की संस्कृति से परिचित होते हैं, हमें इंसानियत और मानवता की सर्वश्रेष्ठ  झलक यहां पर देखने को भली-भांति मिल जाती है. जौनसार  बाबर मे जब भी परिवार के जेष्ठ पुत्र का व...
पशु पक्षियां और परी कथा से लेकर विज्ञान की कहानियों का सफर 

पशु पक्षियां और परी कथा से लेकर विज्ञान की कहानियों का सफर 

साहित्‍य-संस्कृति
हिंदी बालसाहित्य का इतिहासउदय किरौला संपादक, बालप्रहरी   2500 वर्ष पूर्व राजा अमर कीर्ति ने पंडित विष्णुदत्त शर्मा नामक विद्वान को अपने बेटों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी. उसके चार पुत्र थे. उनका मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता था. पंडित विष्णुदत्त शर्मा ने जीव-जंतुओं को अपनी कहानी का पात्र बनाकर चारों राजकुमारों को नैतिक एवं सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का प्रयास किया. ये कहानियां उस दौर में मौखिक सुनाई गई. बाद में ‘हितोपदेश’ नाम से ये कहानियां संस्कृत साहित्य में प्रकाशित हुई. वर्तमान में पंचतंत्र की कहानी के नाम से ये कहानियां हिंदी साहित्य में प्रचलन में हैं. पंचतंत्र की कहानियां के अतिरिक्त ईसप की कहानियां भी बालसाहित्य की प्रसिद्ध कहानियां मानी जाती हैं. ईसप यूनान का रहने वाला एक गुलाम था. वह पशु-पक्षियों पर आधारित कहानियां सुनाता था. यूनान के विद्वान वेव्रियर्स  ने ईसप की कहानियां का...
बुद्ध पूर्णिमा: जीवन जीने का धर्म

बुद्ध पूर्णिमा: जीवन जीने का धर्म

साहित्‍य-संस्कृति
बुद्ध पूर्णिमा 5 मई  पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  पूजा और प्रशस्ति के बीच बुद्ध की प्रखर चिंतन प्रक्रिया ओझल या सरलीकृत हो जाती है. उनकी चिंतन प्रक्रिया कोरे वाग्विलास की जगह व्यावहारिक समाधान की ओर उन्मुख थी. जीवन की पीड़ादायी और असंतोषजनक स्थिति उनके विचार-यात्रा का मूल थी. जन्म मृत्यु के बंधन कारागृह जैसे ही थे. पुनर्जम का अनवरत चलने वाला वात्याचक्र दुःख का कारण था और इससे उबरना मुख्य समस्या थी . ईसा पूर्व पाँचवी सदी में जन्मे महात्मा बुद्ध अपने समय में प्रचलित धर्म-कर्म, विश्वास और जीवन पद्धति की विसंगतियों से क्षुब्ध थे. इतिहास में यह वह काल था जब कृषि की समृद्धि से नगर जन्म ले रहे थे और व्यापार के माध्यम से भारत से बाहर की संस्कृति की जानकारी भी मिल रही थी. बाह्य सम्पर्क से यह भी पता चल रहा था कि जातिविहीन समाज भी होते हैं और संस्कृत के अतिरिक्त और भी भाषाएँ बोली जाती हैं. बढ़त...
हिमांतर के नए अंक ‘हिमालयी लोक समाज व संस्कृति’ का विमोचन

हिमांतर के नए अंक ‘हिमालयी लोक समाज व संस्कृति’ का विमोचन

साहित्‍य-संस्कृति
हिमांतर ब्यूरो, हरिद्वार-देहरादूनहिमांतर का नया अंक आ गया है. हर बार की तरह यह अंक भी कुछ खास और अलग है. हिमांतर केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि हिमालयी सरोकारों, संस्कृति और लोक जीवन का दर्पण बनती जा रही है. अब तक के जितने भी अंक प्रकाशित हुए हैं. हर अंक ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. इस बार का अंक भी पहले के अंकों से अलग है. लेकिन, हर अंक की तरह ही इसकी आत्मा भी हिमालयी लोक समाज में बसती है. खास बात यह है कि इस बार के अंक नाम भी हिमालयी लोक समाज व संस्कृति रखा गया है. हरिद्वार में आयोजित रवांल्टा सम्मलेन में हिमांतर के नए अंक का विमोचन किया गया. हिमांतर की खास बात यह है कि इसमें हिमालयी सरोकारों और हिमालयी समाज को केवल छूया भर नहीं जाता, बल्कि गंभीरता से हर पहलू को सामने लाया जाता है. इस बार के अंक के अतिथि संपादक रचनात्मकता के लिए पहचाने जाने वाले राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता शिक्षक और साह...