पशु पक्षियां और परी कथा से लेकर विज्ञान की कहानियों का सफर 

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हिंदी बालसाहित्य का इतिहास

उदय किरौला
संपादक, बालप्रहरी  

2500 वर्ष पूर्व राजा अमर कीर्ति ने पंडित विष्णुदत्त शर्मा नामक विद्वान को अपने बेटों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी. उसके चार पुत्र थे. उनका मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता था. पंडित विष्णुदत्त शर्मा ने जीव-जंतुओं को अपनी कहानी का पात्र बनाकर चारों राजकुमारों को नैतिक एवं सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का प्रयास किया. ये कहानियां उस दौर में मौखिक सुनाई गई. बाद में ‘हितोपदेश’ नाम से ये कहानियां संस्कृत साहित्य में प्रकाशित हुई. वर्तमान में पंचतंत्र की कहानी के नाम से ये कहानियां हिंदी साहित्य में प्रचलन में हैं. पंचतंत्र की कहानियां के अतिरिक्त ईसप की कहानियां भी बालसाहित्य की प्रसिद्ध कहानियां मानी जाती हैं. ईसप यूनान का रहने वाला एक गुलाम था. वह पशु-पक्षियों पर आधारित कहानियां सुनाता था. यूनान के विद्वान वेव्रियर्स  ने ईसप की कहानियां का संकलन किया. रोम के राजा फायड्रस ने ईसप की कहानियां का लैटिन भाषा में अनुवाद करवाया. विदेशों भाषाओं में प्रचलित ला फोंतेन, डेनियल डेफो, सिंदबाद, अलिफ लैला, ग्रिल की परी कथाएं, सिंहासन बत्तीसी एवं बेताल पच्चीसी भी हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर बन गई हैं. माना जाता है कि बच्चों की पहली पत्रिका 1873 में अंगरेजी भाषा में प्रकाशित हुई.  अंगरेजी में प्रकाशित इस पत्रिका का नाम ‘सेंट निकोलस’ था. जिसका संपादन एवं प्रकाशन मैरी मैप्स डॉज ने किया. कुछ विद्वानों का मानना है कि बच्चों की पहली पत्रिका हिंदी में प्रकाशित हुई. जिसका नाम  ‘बाल दर्पण’ था. जिसका प्रकाशन 1862 में हुआ.

हिंदी साहित्य के इतिहास के साथ ही हिंदी बालसाहित्य का भी अपना इतिहास रहा है. कई  विद्वानों ने हिंदी बालसाहित्य के इतिहास को अलग-अलग कालखंडों में विभाजित किया है. रामचंद्र शुक्ल सहित कई इतिहासकारों ने भारतेंदु हरिश्चंद्र (18850-1900) के काल को हिंदी साहित्य का प्रारंभिक काल माना है. इससे पूर्व के काल को भारतेंदु पूर्व युग कहा गया है. भारतेंदु ने हिंदी साहित्य के साथ ही हिंदी बालसाहित्य को भी एक नई दिशा दी. ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ तथा ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ उनकी प्रमुख बाल रचनाएं हैं. उन्होंने तत्कालीन लेखकों को भी बालसाहित्य लेखन के लिए प्रोत्साहित किया. बालसाहित्य को लेखन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने 1 जून,1874 से ‘बाल बोधिनी’ बाल पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया. बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, श्रीनिवास दास आदि ने इस दौर में बालसाहित्य की रचना की. इन साहित्यकारों की रचनाएं ‘बाल बोधि’ में प्रकाशित हुई. आर्थिक संसाधनों के अभाव में यह पत्रिका दीर्घकाल तक नही चल पाई.

 

सन् 1901 से 1947 तक के काल को इतिहासकारों ने हिंदी साहित्य का पूर्व स्वतंत्रता काल कहा है. इस दौर में प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में  कई बाल  कहानियां प्रकाशित हुई.  इसी काल में लखनऊ से पहली मासिक बाल पत्रिका ‘बाल हितकर’ का प्रकाशन हुआ. सन् 1906 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) से बाल पत्रिका ‘छात्र हितैषी’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ. इसी दौर में बनारस से ‘बाल प्रभा’ तथा इलाहाबाद से ‘शिशु’ पत्रिका प्रकाशित हुई. इस दौर में भारत में स्वतंत्रता आंदोलन चरम सीमा पर था. सन् 1915 में महॉत्मा गांधी के अफ्रीका लौटने के बाद समूचे देश में स्वतंत्रता आंदोलन ने नई गति पकड़ी.  इस आंदोलन को गति देने के लिए बच्चों के अंदर देश प्रेम की भावना जाग्रत करने के लिए बालसाहित्य को बढ़ावा देने पर चर्चा हुई. इसी कड़ी में सन् 1917 में पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के संरक्षण एवं बद्रीनाथ भट्ट के संपादन में ‘बालसखा’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ. ‘बाल सखा’ में कई रचनाकारों को मंच मिला. बच्चों में देशप्रेम की भावना जाग्रत करने व आजादी की लड़ाई को गति देने के लिए ‘बाल सखा’ का महत्वपूर्ण योगदान रहा. मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सोहनलाल द्विवेदी, श्रीधर पाठक आदि इस दौर के प्रमुख बालसाहित्यकार रहे. इस दौर में ‘विद्यार्थी’, ‘बालक’, ‘खिलौना’, ‘राजकुमार’, ‘चमचम’, तथा ‘बानर’ आदि नामों से कई बाल पत्रिकाएं प्रकाशित हुई. परंतु ये अधिक समय तक नहीं चल पाई. इसी दौर में इंद्रा प्रिंटिंग प्रेस अल्मोड़ा (उत्तराखंड) से सन् 1936 में हरिराम बी.ए. के संपादन में बच्चों की पत्रिका ‘नटखट’ का प्रकाशन हुआ. उस दौर के प्रमुख साहित्यकार सुमित्रानंदन पंत, महावीर प्रसाद द्विवेदी, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद एवं कई राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों की रचनाएं ‘नटखट’ में प्रकाशित हुई. आजादी की लड़ाई में ‘नटखट’ का महत्वपूर्ण स्थान रहा. आर्थिक संसाधनों के अभाव में सन् 1938 में ‘नटखट’ का प्रकाशन भी बंद हो गया.

बीसवीं शताब्दी के अंत में लड़कों के साथ ही लड़कियों की शिक्षा पर भी ध्यान दिया गया. बालसाहित्य में भी समान शिक्षा एवं समानता के विषय सम्मिलित हुए. इस दौर में ‘बाल हंस’, ‘हंसती दुनिया’, बालसाहित्य समीक्षा’, ‘बाल वाणी’, ‘नन्हे सम्राट’, ‘पराग’, ‘नंदन’, ‘समय झरोखा’, ‘ मधु मुस्कान’,  ‘बाल मेला’, ‘नौनिहाल’ जैसी कई बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ.

भारत की आजादी के बाद के काल को इतिहासकारों ने हिंदी साहित्य में उत्तर स्वतंत्रता काल कहा है. आजादी के बाद देश में हुए सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तन का प्रभाव इस दौर के बालसाहित्य पर भी पड़ा. देश की नई शिक्षा नीति, बच्चों के स्वास्थ्य, सामाजिक समानता जैसे विषय बालसाहित्य में समाविष्ट हुए. आजादी की लंबी लड़ाई के बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री, जो कि बच्चों के प्रिय नेता भी थे, ने नेशनल बुक ट्रस्ट के माध्यम से बच्चों को बालोपयोगी साहित्य देने की योजना तैयार करवाई. इसी दौर में सन् 1948 में भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने बच्चों की मासिक पत्रिका ‘बाल भारती’ का प्रकाशन प्रारंभ किया.  इस पत्रिका के बहाने भारत सरकार ने यह भी संदेश दिया कि सरकार बच्चों को मनोरंजक, प्रेरणादायक एवं वैज्ञानिक सोच आधारित साहित्य देने के लिए प्रयासरत है. इसी दौर में बालसाहित्य में भूत-प्रेत और जादू टोने तथा परी कथाओं के बजाय यथार्थवादी साहित्य सृजन प्रारंभ हुआ.

बीसवीं शताब्दी के अंत में लड़कों के साथ ही लड़कियों की शिक्षा पर भी ध्यान दिया गया. बालसाहित्य में भी समान शिक्षा एवं समानता के विषय सम्मिलित हुए. इस दौर में ‘बाल हंस’, ‘हंसती दुनिया’, बालसाहित्य समीक्षा’, ‘बाल वाणी’, ‘नन्हे सम्राट’, ‘पराग’, ‘नंदन’, ‘समय झरोखा’, ‘ मधु मुस्कान’,  ‘बाल मेला’, ‘नौनिहाल’ जैसी कई बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ. जिसमें से ‘पराग’ जैसी कई महत्वपूर्ण पत्रिकाएं बंद हो गई. इस काल में ‘धर्मयुग’ तथा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ आदि कई पत्र-पत्रिकाओं में बालसाहित्य के स्तंभ रहे. एक दौर में तो दैनिक समाचार पत्रों के रविवारीय पृष्ठ बच्चों के लिए ही होते थे. हरिवंशराय बच्चन, रामधारीसिंह दिनकर, विष्णु प्रभाकर, श्री प्रसाद, डॉ. राष्ट्रबंधु,, चंद्रपालसिंह मयंक, निरंकार देव सेवक आदि इस काल के प्रमुख बालसाहित्यकार रहे हैं.

सन् 1990 के बाद के काल को इतिहासकारों ने हिंदी साहित्य का प्रयोगवादी काल कहा है. इस दौर में हिंदी साहित्य में नए-नए प्रयोग हुए हैं. बालसाहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा है. प्रारंभिक काल में जहां बालसाहित्य को दोयम दर्जे का साहित्य समझा जाता था, वहीं वर्तमान दौर में लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यकार बच्चों के लिए लिख रहे हैं. इस दौर में बालसाहित्य में साहित्य की विभिन्न विधाओं के साथ ही सूचनात्मक बालसाहित्य लेखन को भी साहित्यकारों ने बढ़ावा दिया है. भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर के माध्यम से बालसाहित्य के पुरोधा डॉ. राष्ट्रबंधु ने देश के विभिन्न स्थानों पर बालसाहित्य की छोटी-छोटी संगोष्ठियां आयोजित करके बालसाहित्य को एक नई पहिचान दिलाने का कार्य किया. ये प्रशन्नता का विषय है कि वर्तमान में भारत सरकार से संबद्ध साहित्य अकादमी दिल्ली, नेशनल बुक ट्रस्ट, चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट, उ.प्र. हिंदी संस्थान, राजस्थान साहित्य अकादमी, जवाहरलाल नेहरू बालसाहित्य अकादमी राजस्थान, हिंदी अकादमी दिल्ली, बालसाहित्य सृजन पीठ इंदौर, भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर, बाल कल्याण एवं बालसाहित्य शोध संस्थान भोपाल, बालसाहित्य संस्थान अल्मोड़ा, बालसाहित्य संस्थान खटीमा, अखिल भारत शिशु साहित्य मंडल कोलकाता, महादेवी वर्मा सृजन पीठ रामगढ़,नैनीताल, राजकुमार फाउंडेशन चित्तौडगढ़  तथा ’सलिला’ संस्था सलूंबर, उदयपुर, राजस्थान सहित कई सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थान बालसाहित्य के संरक्षण एवं उन्नयन के लिए कार्य कर रहे हैं.

भीलवाड़ा से डॉ. भैंरूंलाल के संपादन में प्रकाशित पत्रिका ‘बालवाटिका’ बालसाहित्य के समीक्षात्मक अंकों के प्रकाशन के साथ ही पुरानी पीढ़ी के बालसाहित्यकारों पर विशेषांक निकालकर जहां बालसाहित्य का संरक्षण कर रही हैं वहीं यह पत्रिका नवोदित बालसाहित्य रचनाकारों को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण प्रयास कर रही है. भारत सरकार द्वारा प्रकाशित मासिक ‘आजकल’ तथा भारत ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा प्रकाशित ‘ज्ञान विज्ञान बुलेटिन’ के अतिरिक्त कई पत्र-पत्रिकाएं समय-समय पर बालसाहित्य विशेषांक प्रकाशित कर बालसाहित्य को समृद्ध एवं सरंक्षित करने का प्रयास  कर रही हैं. राष्ट्रीय स्तर पर एन.सी.ई.आर.टी तथा राज्यों में स्थित एस.सी.ई.आर.टी. जैसी स्कूली पाठ्यक्रम से जुड़ी संस्थाएं राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के अनुरूप स्कूली पाठ्यक्रम की पुस्तकों में बच्चों को वैज्ञानिक सोच आधारित मनोरंजक एवं प्रेरणादायक बालसाहित्य देने के लिए प्रयासरत हैं. बालसाहित्य में कई महत्वपूर्ण शोध कार्य भी हो रहे हैं. लगभग 100 शोध प्रबंध हिंदी बालसाहित्य में आ चुके हैं. विभिन्न विश्वविद्यालय बालसाहित्य पर शोध एवं लघु शोध को बढ़ावा दे रहे हैं. यह बालसाहित्य के लिए शुभ संकेत है.

वर्तमान में जहां ‘बाल भारती’, ‘बाल वाणी’ व ‘पाठक बाल मंच बुलेटिन’ सरकारी स्तर पर प्रकाशित बाल पत्रिकाएं हैं, वहीं ‘बाल हंस’, ‘नंदन’, ‘चंदामामा’, ‘चंपक’,‘लोटपोट’ बच्चों की व्यावसायिक पत्रिकाएं हैं. ‘देवपुत्र’, ‘चकमक’, ‘बालप्रहरी’, ‘कोंपल’,‘बच्चों का देश’, ‘स्नेह’, ‘अभिनव बालमन’,  ‘दुलारा नन्हा आकाश’, ‘ बाल किलकारी’, ‘चिरैया’, ‘अपना बचपन’, ‘बाल पक्ष’, जैसी पत्र-पत्रिकाएं जहां बच्चों के बीच अपनी पहचान बनाए हुए हैं वहीं ये पत्रिकाएं बालसाहित्य को समृद्ध करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं. कई दैनिक समाचार पत्र बच्चों के लिए परिश्ष्टि निकाल रही हैं.

साहित्य अकादमी दिल्ली, तथा उ.प्र. हिंदी संस्थान लखनऊ  जैसे सरकारी प्रतिष्ठान जहां बालसाहित्य में उल्लेखनीय कार्य करने वाले साहित्यकारों को सम्मानित कर रहे हैं वहीं कई गैर सरकारी संगठन भी बालसाहित्यकारों को सम्मानित कर रहे हैं. यह भी महत्वपूर्ण है कि बालसाहित्यकार हरिकृष्ण देवसरे व डॉ. राष्ट्रबंधु आदि बालसाहित्यकारों के नाम से कई संस्थाओं ने बालसाहित्य सम्मान स्थापित किए है. बालसाहित्यकारों के साहित्य पर शोध एवं लघु शोध पत्र तैयार किए जा रहे हैं.  बालसाहित्य पर राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर की संगोष्ठियों का आयोजन हो रहा है.  बच्चों की प्रसिद्ध पत्रिका ‘देवपुत्र’ तथा बालसाहित्य सृजन पीठ इंदौर, ‘अभिनव बाल मन’ अलीगढ़ तथा बालप्रहरी एवं बालसाहित्य संस्थान अल्मोड़ा तथा अणुव्रत विव भारती राजसमंद तथा बच्चों का देश पत्रिका बच्चों की लेखन कार्यशालाओं का आयोजन कर जहां बच्चों के लेखन कौशल को बढ़ाने के लिए प्रयास रत हैं, वहीं बच्चों को पठन-पाठन के लिए भी तैयार कर रहे हैं. बालप्रहरी, अभिनव बाल मन, देवपुत्र, आदि पत्रिकाएं बच्चों की लेखन प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के लिए बच्चों की रचनाओं को प्राथमिकता से प्रकाशित कर रही हैं. आज बालसाहित्य बहुत लिखा जा रहा है. उसे बच्चों तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण कार्य है.

(लेखक बालप्रहरी के संपादक एवं बालसाहित्य संस्थान, दरबारीनगर,अल्मोड़ा, उत्तराखंड के सचिव हैं)

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