Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
परिपक्वता

परिपक्वता

किस्से-कहानियां
डॉ अमिता प्रकाश“मैडम, आज रोहिणी आ रही है." सुनीता ने मुझसे कहा तो रोहिणी की अनेकों स्मृतियाँ कौंध उठीं. शादी के एक साल बाद रोहिणी अपने घर आ रही थी. अपना घर...? वह घर जहाँ उसने जन्म लिया था. वह घर जिसके आँगन में खेलकूद कर वह बड़ी हुयी थी. वह घर जिसकी कई चीजों को उसने अपने हाथों से एक रूप दिया था. आँगन के नीचे वाले खेत में लगे कई माल्टे के पेड़ जो आज बड़े होकर उसके स्वेद के मोतियों को ही मानो फलों के रूप में धारण कर रहे थे, उसने अपने हाथों से उन्हें लगाया था. जिस उम्र में बच्चे अपने गुड्डे-गुड़ियाओं में मस्त होते हैं उस उम्र के उसके ये साथी आज उसी की तरह फलित होने लगे हैं... वह भी तो पेट से है, सोचकर चिन्ता की कई रेखाएँ मेरे चेहरे पर तैर आती हैं. उसका वही अपना घर. लेकिन अब कहाँ अपना रह गया था? शादी के दूसरे दिन ‘दोहरबाट’के लिए आयी थी. मात्र रस्म निबाहने के लिये. उसी समय उसने सोचा था कि अब म...
पुरखे निहार रहे मौन, गौं जाने के लिए तैयार है कौन?

पुरखे निहार रहे मौन, गौं जाने के लिए तैयार है कौन?

संस्मरण
ललित फुलारासुबह-सुबह एक तस्वीर ने मुझे स्मृतियों में धकेल दिया. मन भर आया, तो सोशल मीडिया पर त्वरित भावनाओं को उढ़ेल दिया. ‘हिमॉंतर’ की नज़र पढ़ी, तो विस्तार में लिखने का आग्रह हुआ. पूरा संस्मरण ही एक तस्वीर से शुरू हुआ और विमर्श के केंद्र में भी तस्वीर ही रही. तस्वीर के बहाने ही गौं (गांव), होम स्टे और सड़क समेत कई मुद्दों पर टिप्पणियां हुई. कुसम जोशी जी और रतन सिंह असवाल जी ने सक्रियता दिखाते हुए, कई नई चीजों की तरफ ध्यान खींचा. ज्ञान पंत जी की कुमाऊंनी क्षणिका दर्ज शब्दों पर एकदम सटीक बैठी. बाकी, अन्य साथियों ने सराहा और गौं, पहाड़ और कुड़ी की बातचीत में अपने चंद सेकेंड खपाए. सभी का आभार. तस्वीर भेजने के लिए मोहन फुलारा जी का दिल से शुक्रिया.....!!!! प्रकाशित करने के लिए ‘हिमॉंतर’ को ढेरों प्यार. जिस तस्वीर को देखकर मन भर आया वो मेरी कुड़ी (मकान) है. तस्वीर आपको दिख ही रही होगी. ...
मेरी ओर देखो

मेरी ओर देखो

अध्यात्म
भूपेंद्र शुक्लेश योगीधरती के भीतर का पानी शरीर के “रीढ़ की हड्डी के पानी” जैसा होता है, रीढ़ की हड्डी का पानी जिसे CSF (Cerebrospinal Fluid) कहते हैं जो मस्तिष्क व रीढ़ आधारित अंगों के क्रियान्वयन के लिए अमृत समान है ....! सामान्यतः मस्तिष्क में ट्यूबरक्लोसिस के संबंध जानकारी प्राप्त करने के लिए CSF जाँच की जाती है वह भी तब जब अन्य सभी मार्ग बंद हो गए हों और विषय बहुत गंभीर हों ... सोचिए !भूमिगत जल भी पृथ्वी के आंतरिक संचालन के लिए अति आवश्यक है, बाह्य प्रयोगों हेतु तो प्रकृति ने नदी, सरोवर, झील, झरने, जल स्त्रोत, वर्षा जल आदि दिये थे जो पर्याप्त था.यदि इस FLUID को जब चाहे, जैसे चाहे वैसे निकाला जाये तो इसका परिणाम कितना भयानक होगा... इसके दुष्परिणाम स्वरूप शरीर के लकवाग्रस्त होने, स्मृति भ्रम होने के साथ-साथ अन्य रोग उत्पन्न होने की संभावना रहती है. अब इस उपरोक्त स्थिति को भू...
आत्मनिर्भर पहाड़ की दुनिया

आत्मनिर्भर पहाड़ की दुनिया

संस्मरण
प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ पहाड़ी पन व मन बरकरार है. यायावर प्रवृति के प्रकाश उप्रेती वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में because पढ़ाते हैं। कोरोना महामारी के कारण हुए ‘लॉक डाउन’ ने सभी को ‘वर्क फ्राम होम’ के लिए विवश किया। इस दौरान कई पाँव अपने गांवों की तरफ चल दिए तो कुछ काम की वजह से महानगरों में ही रह गए. ऐसे ही प्रकाश उप्रेती जब गांव नहीं जा पाए तो स्मृतियों के सहारे पहाड़ के तजुर्बों को शब्द चित्र का रूप दे रहे हैं। इनकी स्मृतियों का पहाड़ #मेरे #हिस्से #और #किस्से #का #पहाड़ नाम से पूरी एक सीरीज में दर्ज़ है। श्रृंखला, पहाड़ और वहाँ क...
“ऊम” महक गॉंव की

“ऊम” महक गॉंव की

संस्मरण
सुमन जोशीउत्तराखंड में खेती व अनाज से जुड़े न जाने कितने ही त्यौहार, कितने की रीति—रिवाज़ और न जाने कितनी ही मान्यताएं हैं. पर हर एक मान्यता में यहां की संस्कृति व अपनेपन की झलक देखने को मिलती है. कृषि प्रधान प्रदेश होने के कारण यहाँ हर एक फसल के बोने से लेकर के काटने व रखने तक अलग-अलग अनुष्ठान किये जाते हैं. किसी नई फसल की पैदावार में उसे ईष्ट देव को नैनांग के रूप में चढ़ाया जाता है और फिर समस्त गाँववासियों द्वारा प्रयोग किया जाता है.पहाड़ों में खेतों में कुछ खेत जहाँ पर बहुत छाया रहती है या फिर सिमार (पानी भरे हुए खेत) में फसल ठीक प्रकार से पक नहीं पाती यानी हरी ही रह जाती है, ऐसे खेतों के किनारों से ही ऊम के लिए गेहूं के मुठे बाँध लिए जाते और ईजा, काकी या ज्येठजा में से कोई भी मुठे बनाकर बच्चों को थमा देते व इन्हें जलाने अथवा सेकनें का काम उन्हें दे देते. निःसंदेह बच्चों में उत्सा...
वड़ और एक नारी की पीड़ा

वड़ और एक नारी की पीड़ा

संस्मरण
डॉ. गिरिजा किशोर पाठकगांव की कहावत है 'वड़ (Division stone), झगड़ जड़'. जब दो भाइयों के बीच में जमीन का बंटवारा होता है तो खेतों के बीच बंटवारे के बाद विभक्त जमीन में एक लम्बा पत्थर खड़ा करके गाड़ दिया जाता है जिसे वड़ (division line) कहते हैं. भाइयों में जमीन के बंटवारे पर एक बार वड़ डल जाने पर ये हमेशा के लिए दो भाइयों की जमीन की सीमा रेखा बन जाती है. इस वड़ (सीमा रेखा) के कारण खेती किसानी में परिवारों में बहुत झगड़े, लड़ाइयां, मुकदमे देखने को मिलते हैं क्योंकि अस्थाई तौर पर गाड़े गए पत्थर की जो मर्यादा रखते हैं वो सीमा का उल्लंघन नहीं करते और खुराफाती इसको मनमाने ढंग से खिसका कर विवाद पैदा करते हैं.हमारे गांव में 2 ऐसे महत्वपूर्ण/खुराफाती पुरुष थे जिनका काम अल्मोड़ा, सोर और बागेश्वर जाकर अपनी नई जमीन के लिए दरख्वास्त (fresh application) लगाना होता था. वड़ के झगड़े पर राजस्व कोर्...
पहाड़ की संवेदनाओं के कवि कन्हैयालाल डंडरियाल

पहाड़ की संवेदनाओं के कवि कन्हैयालाल डंडरियाल

संस्मरण
पुण्यतिथि (2 जून) पर विशेषचारु तिवारी हमारे कुछ साथी उन दिनों एक अखबार निकाल रहे थे. दिनेश जोशी के संपादन में लक्ष्मीनगर से ‘शैल-स्वर’ नाम से पाक्षिक अखबार निकल रहा था. मैं भी उसमें सहयोग करता था. बल्कि, संपादक के रूप में मेरा ही नाम जाता था. यह 2004 की बात है. हमारे मित्र शिवचरण मुंडेपी कर्इ लोगों से परिचय कराते थे. उन्होंने मेरा परिचय एक ऐसे व्यक्ति से कराया जो गढ़वाली भाषा का चलता-फिरता ज्ञानकोश थे. उनका नाम था- नत्थी प्रसाद सुयाल. सुयाल जी का गढ़वाली भाषा के प्रति समर्पण और श्रद्धा देखने लायक थी. उन्होंने गढ़वाली भाषा के प्रचार-प्रसार के लिये बहुत काम किया. उन दिनों उन्होंने डंडरियाल जी के कविता संग्रह ‘अंज्वाल’ को बड़े मनोयोग से नये कलेवर में प्रकाशित किया था. यह संग्रह भी उन्होंने मुझे दिया. उनकी असमय निधन हो गया था. उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि देते हुये कृतज्ञता प्रकट करता ह...
पहाड़ों में जल परम्परा : आस्था और विज्ञान के आयाम

पहाड़ों में जल परम्परा : आस्था और विज्ञान के आयाम

जल-विज्ञान
डॉ. मोहन चंद तिवारी दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं। वैदिक ज्ञान-विज्ञान के गहन अध्येता, प्रो.तिवारी कई वर्षों से जल संकट को लेकर लिखते रहे हैं। जल-विज्ञान को वह वैदिक ज्ञान-विज्ञान के जरिए समझने और समझाने की कोशिश करते हैं। उनकी चिंता का केंद्र पहाड़ों में सूखते खाव, धार, नोह और गध्यर रहे हैं। हमारे पाठकों के लिए यह हर्ष का विषय है कि प्रो. तिवारी जल-विज्ञान के संदर्भ में ‘हिमांतर’ पर कॉलम लिखने जा रहे हैं। प्रस्तुत है उनके कॉलम 'भारत की जल संस्कृति' की पहली कड़ी...भारत की जल संस्कृति-1डॉ. मोहन चन्द तिवारी‘हिमाँतर’ में जल परंपरा पर चर्चा प्रारम्भ करने से पहले मैं जल की अविरल और निर्मल धारा के सर्जनहार और दिव्य जलों के भंडार देवतात्मा हिमालय को महाकवि कालिदास के निम्न श्लोक से नमन करना चाहता हूं- “अस्त्युत्तरस्यां दिशि दे...
इंतज़ार… पहाड़ी इस्टाइल

इंतज़ार… पहाड़ी इस्टाइल

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—8रेखा उप्रेतीहुआ यूँ कि मेरी दीदी की शादी दिल्ली के दूल्हे से हो गयी. सखियों ने “…आया री बड़ी दूरों से बन्ना बुलाया” गाकर बारात का स्वागत किया और नैनों की गागर छलकाती दीदी दिल्ली को विदा कर दी गयी. आसपास के गाँवों या शहरों में ब्याही गयी लडकियाँ तो तीसरे-चौथे रोज़ या हद से हद महीने दो महीने में फेरा लगाने आ जाती थी पर हमारी दीदी एक साल तक नहीं आ सकी. हर महीने एक अंतर्देशीय से उसके सकुशल होने की ख़बर आ जाती. एक बार अंतर्देशीय में कुशल-बाद के साथ-साथ यह सूचना भी मिली कि फलां तारीख को हमारी दीदी और भिन्ज्यु आ रहे हैं. घर-भर में ही नहीं आस-पड़ोस में भी उत्साह की लहर दौड़ गयी. जोर-शोर से तैयारियाँ शुरू हुईं. माँ, आमा, काखी, बुआ ने मिलकर घर की लिपाई-पुताई कर डाली. देहरी, चाख, मंदिर ऐपण से जगमगा उठे, आँगन में भी ऐपण की बड़ी-सी चौकी बनाई गयी. शगुन-आँखर देने के लिए ग...
ईजा के जीवन में ओखली

ईजा के जीवन में ओखली

उत्तराखंड हलचल, संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—14प्रकाश उप्रेतीये है-उखो और मुसो. स्कूल की किताब में इसे ओखली और मूसल पढ़ा. मासाब ने जिस दिन यह पाठ पढ़ाया उसी दिन घर जाकर ईजा को बताने लगा कि ईजा उखो को ओखली और मुसो को मूसल कहते हैं. ईजा ने बिना किसी भाव के बोला जो तुम्हें बोलना है बोलो- हमुळे रोजे उखो और मुसो सुणी रहो... फिर हम कहते थे ईजा- ओखली में कूटो धान, औरत भारत की है शान... ईजा, जै हनल यो...अक्सर जब धान कूटना होता था तो ईजा गांव की कुछ और महिलाओं को आने के लिए बोल देती थीं. उखो में मुसो चलाना भी एक कला थी. लड़कियों को बाकायदा मुसो चलाना सिखाया जाता था.उखो एक बड़े पत्थर को छैनी से आकार देकर बनाया जाता था वहीं मुसो मोटी लकड़ी का होता था लेकिन उसके आगे 'लुअक' (लोहे का) 'साम' (लोहे के छोटा सा गोलाकार) लगा होता था. उखो वाले पत्थर को 'खो' (आंगन का एक अलग हिस्सा) में लगाया जाता था. मुस...