September 19, 2020
धर्मस्थल

गढ़वाल में बद्री-केदार तो कुमाऊं में प्रसिद्ध है छिपला केदार

— दिनेश रावत

भारत भू-भाग का मध्य हिमालय क्षेत्र विभिन्न देवी-देवताओं की दैदीप्यमान शक्ति से दीप्तिमान है। इसी मध्य हिमालय के लिए ‘हिमवन्त’ का वर्णन किया गया है. धार्मिक साहित्य यथा ‘केदारखंड’ (अ.101) में ‘हिमवत्-देश’ कभी केवल केदारदेश को ही माना गया है. हिमवन्त  के अंतर्गत अनेक पर्वतों का वर्णन है। जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं— 1 गन्धमादनपर्वत— यह बदरिकाश्रम से संबद्ध गढ़वाल का महा-हिमवन्त है। ‘कैलासपर्वत श्रेष्ठे गन्धमादनपर्वत’ (केदारखण्ड, अ. 60). हरिवंश पुराण के अनुसार यह राजा पुरूरवा और गान्धर्वी उर्वशी का रमण-स्थल माना गया है. तीर्थयात्रा काल के दौरान पांडवों ने यहां प्रवेश किया था, जहां बदरीविशाल तथा नरनारायणाश्रम हैं. 2 शतश्रृंगपर्वत— इसे पांडु की तपस्या स्थली के रूप में जाना जाता है. संतान प्राप्ति की कामना के साथ पांडु ने इसी पर्वत पर कुन्ती व माद्री के साथ तपस्या की थी. जिसके उपरांत उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. इस प्रकार से मध्य हिमालय क्षेत्रान्तर्गत गढ़वाल मंडल में जहां बदरी-केदार धाम विश्व प्रसिद्ध हैं वहीं कुमाऊं मंडलान्तर्गत केदार को ही ‘छिपला केदार’ के रूप में पूजा जाता है. स्कनंद पुराण का केदारखंड जहां गढ़वाल क्षेत्रान्तर्गत आने वाले देवस्थलों का दिग्दर्शन करवाता है तो वहीं मानसखंड से कुमाऊं मंडल विवरण प्राप्त होता है.

जयकारों के उद्घोषों के साथ, घंटियों की टंकार, शंख ध्वनि, लोकवाद्यों के मधुर धुनों के बीच जब छिपला केदार दर्शन के लिए प्रस्थान करते हैं तो दृश्य देखते ही बनता है. दुर्गम पहाड़ियों को लांघ-फांदकर भोर में सूर्योदय के साथ ही घर, गांव से चले जत्थे, दिनभर का कठिन सफ़र तय करने पर देर रात तक बाबा के दरबार में ‘भनार’ पहुंचते हैं

सांसारिक चहल-पहल से दूर मध्य-हिमालय का यह क्षेत्र आज भी, लोक संस्कृति के विविध रंगों से रंगा नज़र आता है. यह इसकी विशिष्टता ही है कि यह अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक वैशिष्टय को वर्तमान में भी अक्षुण्ण बनाए हुए है. देव पूजन, वन्दन, साधना, आराधना की पद्वति आमूल-चूक परिवर्तनों के साथ विधिवत् जारी है. यहां होने वाले लोकोत्सवों में मेले, थौले, कौथिग, देवयात्राएं इत्यादि प्रमुखता से शामिल हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में होने वाले अधिकांश मेले धार्मिक आस्था से लबालब होते हैं. इनके आयोजन भी अधिकांशतः देवस्थलों या उसके इर्द-गिर्द ही होते हैं. जिसके पीछे लोकवासियों की गहरी आस्था व विश्वास परिलक्षित होता है. सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाले जन-मानस के लिए ये आयोजन आस्था के साथ-साथ मेल-मिलाप, आमोद-प्रमोद व मनोरंजन के भी महत्वपूर्ण साधन होते हैं. मध्य-हिमालय की इस पर्वत श्रृंखला में एक तरफ जहां बद्री-केदार जैसे पावन धाम अवस्थित हैं, तो वहीं दूसरी तरफ पंचाचूली की पहाड़ियों को छिपला केदार की भूमि मानी गई है. छिपला केदार के दर्शनार्थ प्रत्येक तीसरे वर्ष स्थानीय लोगों द्वारा देवयात्रा का आयोजन किया जाता है.  जिसमें सभी श्रद्धालु पूरे नित-नियम के साथ शामिल होकर खुद को पुण्य का भागी बनाते हैं.

हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य, खुले अम्बर तले, प्रकृति के गोद में, रोंगटे खड़े कर देने वाली शीतल समीर के साथ बाबा केदार का स्तुतिगान करते हुए कब रात्रि की काली घटाएं छंटकर दिशाएं दीप्तिमान होने लग जाती हैं, पता भी नहीं चल पाता. सूर्य का अभ्युदय हो, उससे पहले ही श्रृद्धालु आकार में छोटे मगर पावन सरोवर में स्नान करके खुद को पुण्य का भागी बनाते हैं.

बालक, वृद्ध, तरूण सभी हाथों में रंगीन ध्वजाएं धामें, ऊँची-नीची पगडंडियों पर चढ़ते-उतरते हुए वातावरण को आहलादित करने वाले जयकारों के उद्घोषों के साथ, घंटियों की टंकार, शंख ध्वनि, लोकवाद्यों के मधुर धुनों के बीच जब छिपला केदार दर्शन के लिए प्रस्थान करते हैं तो दृश्य देखते ही बनता है. दुर्गम पहाड़ियों को लांघ-फांदकर भोर में सूर्योदय के साथ ही घर, गांव से चले जत्थे, दिनभर का कठिन सफ़र तय करने पर देर रात तक बाबा के दरबार में ‘भनार’ नामक स्थान पर पहुंचते हैं. हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य, खुले अम्बर तले, प्रकृति के गोद में, रोंगटे खड़े कर देने वाली शीतल समीर के साथ बाबा केदार का स्तुतिगान करते हुए कब रात्रि की काली घटाएं छंटकर दिशाएं दीप्तिमान होने लग जाती हैं, पता भी नहीं चल पाता. सूर्य का अभ्युदय हो, उससे पहले ही श्रृद्धालु आकार में छोटे मगर पावन सरोवर में स्नान करके खुद को पुण्य का भागी बनाते हैं. छिपलाकेदार को अपना आराध्य देव मानने वाले क्षेत्र के तमाम् लोग तत्पश्चात यहीं पर अपने नौनिहालों का चूड़ाकर्म एवं जनेऊ संस्कार सम्पन्न करवाते हैं. जिसे लोकभाशा में ‘व्रत पूजना’ कहा जाता है. स्नान, पूजा, अर्चना के पश्चात किसी व्यक्ति के शरीर में देवात्मा प्रविष्ठ करती है और वह गुफा के अन्दर प्रवेश करके वहा से जल की गागर भरकर बाहर लाता है. जिसे वहां पहुंचे सभी भक्तों में प्रसाद स्वरूप बांटा जाता है. अमृतकलश रूपी इस जल को ही लोकवासी बाबा के प्रसाद व आशीर्वाद के रूप में घर लेकर आते हैं और शेष सभी परिजनों में वितरित करते हैं. यात्रा से लौटता श्रृद्धालुओं का जत्था जैसे ही गांव के समीप पहुंचता है, ग्रामवासी पुष्पमालाओं से यात्रियों का स्वागत करते हैं. इसके बाद घर में भी परम्परानुसार पूजन, वन्दन होता है. जिस बालक का चूड़ाकर्म व जनेऊ संस्कार होता है उसके परिजन अपने घर में सहभोज का आयोजन करते हैं. जिसके लिए सभी ग्रामवासियों, नाते-रिश्तेदारों को सादर आमन्त्रित किया जाता है. घर पहुंचे सभी बड़े-बूजुर्गों द्वारा सम्बंधित बालक को टीका, चंदन, गंध, अक्षत, दान-दक्षिणा तथा दुर्बांकुर देकर मंगलकामनाएं दी जाती हैं. इस प्रकार से छिपलाकेदार की यह यात्रा सम्पन्न होती है. इसके अतिरिक्त यहां कई लोग मनन्त मानने भी चाहते हैं और मनवांछित फल प्राप्त होने पर पुनः बाबा के दर्शनार्थ जाने का भी प्रयास करते हैं।

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