November 1, 2020
धर्मस्थल

लोक के विविध रंगों से रंगा एक महोत्सव

– दिनेश रावत

उत्तराखंड का रवांई क्षेत्र अपने सांस्कृतिक वैशिष्टय के लिए सदैव विख्यात रहा है. लोकपर्व, त्योहार, उत्सव, मेले, थोले यहां की संस्कृति सम्पदा के अभिन्‍न अंग कहे जा सकते हैं. कठिन दैनिकचर्या की चक्की में पीसता मानव इन्हीं अवसरों पर अपने आमोद-प्रमोद, मनरंजन, मेल-मिलाप हेतु वक्त चुराकर न केवल शारीरिक, मानसिक थकान मिटाकर तन-मन में नयी स्फूर्ति का संचार करता था, बल्कि जीवन के लिए उपयोगी सामग्री का संग्रह भी. सुदूर हिमालयी क्षेत्र में होने वाले मेले, शहरी मेलों से पूरी तरह अलग लोक के विविध रंगों से रंगे नजर आते थे किन्तु वर्तमान में वैश्वीकरण की आबो-हवा के चलते लोक संस्कृति के संवाहक रूपी मेले से वर्तमान पीढ़ी का मोहभंग होता जा रहा है, जिसके चलते इनके अस्तित्व पर ही संकट के मेघ मंडराने लगे हैं. वर्षों पूर्व अपार हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न होने वाले कई मेले जहाँ अपने अस्तित्व के लिए जूझ दिख रहे हैं, तो कई विलुप्त प्राय: होकर जुबानी इतिहास बन मात्र स्मृतियों में शेष रह गये हैं. जो कि चिन्ता व चिन्तन का एक गम्भीर विशय है क्योंकि किसी भी मेले का समाप्त होना, मात्र मेले को समाप्त होना भर नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक वैभव का सिमटना भी है. विषय की इसी गम्भीरता को भाँपते हुए लोक के कुछेक पहरूएं इस अमूल्य थाती को बचाने की दिशा में प्रयासरत् बने हुए हैं. ऐसे ही प्रयासों की एक सुन्दर बानगी है ‘रवांई लोक महोत्सव’.

 

रवांई लोक महोत्सव यानी जिसकी भावभूमि ही लोक के यथार्थ स्वरूप पर तैयार की गयी है. इसका पहला आयोजन गत वर्ष 13 अगस्त 2017 को और दूसरा 23 से 25 नवंबर 2018 को रवाँई क्षेत्र के नौगांव में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ. अपने आरम्भ में दूसरे ही पायदान पर महोत्सव का एक से तीन दिवसीय हो जाना एक साहसिक प्रयास का सुखद प्रतिफल है. 

रवांई लोक महोत्सव यानी जिसकी भावभूमि ही लोक के यथार्थ स्वरूप पर तैयार की गयी है. इसका पहला आयोजन गत वर्ष 13 अगस्त 2017 को और दूसरा 23 से 25 नवंबर 2018 को रवाँई क्षेत्र के नौगांव में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ. अपने आरम्भ में दूसरे ही पायदान पर महोत्सव का एक से तीन दिवसीय हो जाना एक साहसिक प्रयास का सुखद प्रतिफल है. इस वर्ष तीन दिनों के महोत्सव में लोकवासियों एवं आगंतुकों को जहाँ लोक की पावन सलिला में गोते लगाकर लोक की यथार्थपरक तस्वीर से रू-ब-रू होने का स्वर्णिम अवसर सुलभ हुआ, वहीं वक्त के तद्न्तर नये कलेवर के साथ सम्पन्न हुआ महोत्सव लोककला, गीत, संगीत, नृत्य, साहित्य व सम्मान जैसेविभिन्‍न आयामों को स्पर्ष करते हुए कई कीर्तिमान स्थापित कर गया. महोत्सव मंच के माध्यम से लोकगीत, संगीत व लोकनृत्यों की गंगा तीन दिन तक सतत् प्रवाहमान बनी रही. जिसमें कई चीर-परिचित लोक कलाकारों यथा- महेन्द्र चौहान, अनिल बेसारी, राजुली बत्रा, निधि राणा, मनमोहन रावत, रजनीकांत सेमवाल, सुरेन्द्र राणा, विजय नेगी, धमेन्द्र परमार, सीमा चौहान, सुमन शाह, संदीप कुमार आदि को एक साथ सुनने के अवसर सुलभ हुए तो वहीं सुदूर ग्राम्य अंचलों में मंच के लिए तरस्ती प्रतिभाओं को भी ससम्मान मंच उपलब्ध करवाकर उनकी लौकिक स्वरलहरियों को प्रोत्साहित करने का पुनीत कार्य भी पूर्ण होता दिखा. रवाँल्टी गीत, संगीत व नृत्य के अतिरिक्त मंच लोगों ने जौनपुरी, जौनसारी, बावरी, गढ़वाली तथा  हिमाचली गीत, संगीत का भी भरपूर आनन्द लिया. लोक महोत्सव के मंच अपनी-अपनी प्रस्तुतियों के साथ उतरे स्कूली बाल कलाकार भी काफी प्रसन्न नजर आ रहे थे.

लौकिक मंच पर अलौकिक प्रस्तुति

महोत्सव के साथ मनोरंजन स्वत: जुड़ जाता है. गीत, संगीत व नृत्य से सराबोर मंच पर एक दौर ऐसा भी आया जब लोकवासी खुद को भुलाकर महाभारतकालीन प्रंसगों में विचरण करने लगे. अवसर था पांडव नृत्य का, जिसके लिए सुदूर सरनौल के पांडव पश्‍वाओं को विशेषरूप से आमन्त्रित किया गया था. हाथों में केदार पाती, धनुष-बाण, गदा धारी पांडव पश्‍वा अपने परम्परागत परिधानों में लोक वाद्यों की धुनों के साथ जैसे ही महोत्सव स्थल पर पहुंचे, उनकी प्रस्तुतियों को देखने के लिए पूरा पांडल उत्साहित हो उठा. कुछ ही देर बाद पांडव दल अपनी पहली प्रस्तुति के साथ मंच पर उपस्थित होते है. भस्म से रमा नग्न शरीर, अद्भुत भाव-भंगिमाएं, नाना-प्रकार के पत्र-पुष्पों को कंठाहार बनाये और अपनी मूल पहचान छुपाकर जोगी बन वन-वन भटकते. लोक वादक लोकवाद्यों पर ताल छोड़ते हैं तो साधु वेशधारी पांडव नृत्य करने को खुद को रोक नहीं पाते हैं. वे लोक वादकों से अपना मन पसंद ताल बजाने का आग्रह करते है और मनमाफिक ताल पाकर उन्मुक्त होकर नृत्य करने लग जाते है. उल्लेखनीय है कि इस दौरान संबंधित दल द्वारा जो नृत्य किया गया उसे ‘जोगटा नृत्य’ के रूप में जाना जाता है, जो महाभारतकाल से उस प्रसंग पर आधारित था जब पांडव लाक्षागृह से जान बचाकर सकुशल भाग निकलने में सफल होते हैं और अपनी मूल पहचान छिपाकर वन-वन भटकते रहते हैं. अपनी दूसरी प्रस्तुति में यहीं दल एक नये रूप में नये प्रसंग के साथ सामने आते हैं. यह प्रसंग होता है महाभारत विजीत करने के पश्चात् अश्वमेघ यज्ञ आयोजन की तैयारी का. इस दृश्य में पांडव दल द्वारा अर्जुन का घोड़ी नृत्य प्रस्तुत किया जाता है. इस नृत्य के दौरान माहौल इतना आह्लादित करने वाला हो जाता है कि मंच पर अवतरित पांडव पात्रों के अतिरिक्त दर्शकदीर्घा में बैठे कई नर-नारियों के शरीर में भी देवात्माएं प्रविष्ठ हो जाती है और वे खुद को नृत्य में शमिल करने के लिए मंच की ओर बढ़ने लगती है. लोक वाद्यों के तालों तथा परम्परागत शैली में गायी जा रही महाभारतकालीन गाथाएं सुनकर शायद ही कोई होगा जिसे लोक के इस अलौकिक नृत्य को देख खुद को गौरवान्वित व हर्षित महसूस न कर रहा हो.

हाथों में केदार पाती, धनुष-बाण, गदा धारी पांडव पश्‍वा अपने परम्परागत परिधानों में लोक वाद्यों की धुनों के साथ भस्म से रमा नग्न शरीर, अद्भुत भाव-भंगिमाएं, नाना-प्रकार के पत्र-पुष्पों को कंठाहार बनाये और अपनी मूल पहचान छुपाकर जोगी बन वन-वन भटकते. लोक वादक लोकवाद्यों पर ताल छोड़ते हैं तो साधु वेशधारी पांडव नृत्य करने को खुद को रोक नहीं पाते हैं. वे लोक वादकों से अपना मन पसंद ताल बजाने का आग्रह करते है और मनमाफिक ताल पाकर उन्मुक्त होकर नृत्य करने लग जाते है. उल्लेखनीय है कि इस दौरान संबंधित दल द्वारा जो नृत्य किया गया उसे ‘जोगटा नृत्य’ के रूप में जाना जाता है

लोक का समर्पित महायज्ञ 

किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए जितनी आवश्यकता एक सुनियोजित कार्ययोजना व सुसंगठित दल की होती है, उससे कई अधिक नेतृत्वकर्ता की और इस भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वाहन किया है भाई शशिमोहन रावत ‘रवांल्टा’ ने. जो व्यावसायिक विवशता के चलते शारीरिक रूप से भले ही अपने मुल्क व माटी से दूर हों, लेकिन लोक के प्रति मन में पनपा अनुराग उससे मेट्रो शहरों की चकाचौंध भी नहीं छीन पायी. लोक के प्रति आस्था व अनुराग का यही भाव विवश करता है उसे ऐसे महोत्सव की संकल्पना तैयार करने के लिए. लोक को समर्पित इस पुनीत कार्य में उनके सहभागी बनते है श्वेता बंधानी, अमिता नौटियाल, नरेश नौटियाल, रचना बहुगुणा, प्रकाश असवाल, प्रेम पंचोली, अशिता डोभाल, हरिमोहन चौहान, प्रदीप रावत ‘रवांल्टा’, दिनेश रावत. मेले की भव्यता को बढ़ाने के लिए गेल (इंडिया) लिमिटेड की महोत्सव प्रायोजक की मुख्य भूमिका रही. साथ ही टी़एच़डी़सी़, एल़आई़सी़, उत्तराखंड संस्कृति विभाग, उत्तराखंड उद्योग विभाग महोत्सव सहप्रायोजक की भूमिका में थे.

प्रतिभाओं का सम्मान 

रवांई लोक महोत्सव का एक महत्वपूर्ण आयाम है सम्मान समारोह. जिसमें स्मरण व श्रद्धांजली पुरखों को और सम्मान प्रतिभाओं का. जो प्रशस्त करता है प्रेरणा के पुण्य पथ. सम्मान की इस श्रृंखला में साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु श्री महाबीर रवांल्टा को ‘बर्फियालाल जुवांठा सम्मान’, कृषि के क्षेत्र में श्री महेन्द्र कुंवर को ‘दौलतराम रवांल्टा सम्मान’, बागवानी व स्वरोजगार के लिए श्री भरत सिंह राणा को ‘राजेन्द्र सिंह रावत सम्मान’, नशा मुक्ति के लिए जनान्दोल चलाने वाली श्रीमती लक्ष्मी देवी को ‘जोत सिंह रवांल्टा सम्मान’ तथा खेल स्पर्धाओं में राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्र का गौरव बढ़ाने वाले अस्तित्व डोभाल व कुमारी रेखा चौहान को ‘पतिदास सम्मान’ से इस वर्ष सम्मानित किया गया, जब कि महोत्सव में पहली बार जोड़े गये ‘रवाँई गौरव सम्मान’ से श्रीमती सुशीला बलूनी जी को नवाजा गया.

रवांल्टी कवि सम्मेलन

रवांई भू-भाग पर रवांल्टी को कविताओं रूपी साहित्य विद्या के माध्यम से स्वतंत्र रूप से मंच पर लाने का श्रय भी टीम रवाँई लोक महोत्सव को ही जाता है. जिसका शुभारम्भ गत वर्ष के सम्मेलन में छ: कवियों के साथ होता है. जिसमें महावीर रवांल्टा, दिनेश रावत व ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’ के रूप में मात्र तीन कवि रवांल्टी कविताओं के साथ मंच पर उपस्थित होते है, जबकि इस वर्ष यहीं संख्या बढ़कर बारह हो जाती है. जिनमें जौनसारी कविताओं के साथ श्री भजन दास,  राजपाल सिंह, बावरी कविताओं के नीरज उत्तराखंड तथा रवांल्टी कविताओं के साथ महावीर रवांल्टा, दिनेश रावत, ध्यान सिंह रावत के अतिरिक्त प्रदीप रावत ‘रवांल्टा’, अनुज रावत, रामराज सिंह, अनिल बेसारी तथा वयोवृद्घ कवि श्री खिलानन्द बिजल्वाण जी के रूप में नये नाम जुड़ते हैं. सम्मेलन का सफल संचालन व संयोजन लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार महावीर रवांल्टा द्वारा वयोवृद्ध लोककवि श्री खिलानन्द बिजल्वाण की अध्यक्षता में होता है.

एक नई संस्कृति का आगाज

स्वागतगान, मंगल तिलक, पुश्प गुच्छ, बैंच, अंग वस्त्र आदि के साथ आतिथ्य सतकार की परम्परा में इस बार एक नया अध्याय इस रूप में भी जुड़ा कि महोत्सव के दौरान इन सबके अतिरिक्त अतिथियों को रवांई की संस्कृति व साहित्य पर लिखी गयी पुस्तकों के सैट भेंट किये गये. लोक संस्कृति के मंच से पुस्तक संस्कृति का सृजन अपने आप में एक अनूठी व अनुकरणीय पहल है. शुभारम्भ यद्यपि कवियों के साथ किया गया है लेकिन भविष्य में इसे विस्तार देना बहुपयोगी साबित होगा, ऐसा विश्वास है.

महोत्सव के अतिथि…!

तीन दिन तक चले महोत्सव में अतिथियों का आगमन प्रति दिन बराबर बना रहा. महोत्सव समापन के अवसर पर श्री प्रेम चंद अग्रवाल, अध्यक्ष, उत्तराखंड विधान सभा ने मुख्य अतिथि तथा श्री केदार सिंह रावत, विधायक, यमुनोत्री ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शिरकत की. तीन दिन तक चले महोत्सव के समापन कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री राजकुमार, विधायक, पुरोला द्वारा की गयी. महोत्सव शशिमोहन राणा, अध्यक्ष, नगर पंचायत, नौगांव. रचना बहुगुणा, प्रमुख, क्षेत्र पंचायत नौगांव. हरिमोहन नेगी, अध्यक्ष, नगर पंचायत पुरोला. श्याम डोभाल, अध्यक्ष, भाजपा उत्तरकाशी. अमर सिंह कफोला, सुखदेव सिंह रावत, भोलादत्त नौटियाल, अतोल सिंह रावत, अध्यक्ष, भेषज संघ, प्रकाश असवाल, ज्येष्ठ प्रमुख नौगांव, विजेन्द्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार, मनोज इष्टवाल, दिनेश कण्डवाल, इन्द्र सिंह नेगी, भार्गव चन्दोला, सुभाष तारण आदि की गरिमामय उपस्थिति में सम्पन्न हुआ.

मंच संचालन, बेहतरीन तालमेल

तीन दिवसीय रवांई लोक महोत्सव का मंच संचालन पत्रकार प्रेम पंचोली व शिक्षक दिनेश सिंह रावत द्वारा सामुहिक रूप से किया गया. महोत्सव के पहले दिन मंच की कमान जहाँ प्रेम पंचोली के हाथों रही तो दूसरे दिन दिनेश रावत ने इस महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह्न किया, जो तीसरे दिन तक जारी रहा. तीसरे यानी समापन के अवसर पर प्रात: से सम्मान समारोह तक दिनेश रावत के ही हवाले रहा तो इसके तुरन्त बाद शुरू हुए कवि सम्मेलन में लोग महावीर रवांल्टा से परिचित हुए तो गीत, संगीत के बीच प्रेम पंचोली लोगों से मुखातिब होते रहे.

लुभाया रवांई के पकावानों ने

महोत्सव के दौरान रवांई के पारम्परिक व्यंजनों का भी लोगों ने खूब स्वाद चखा. जो की लोगों को काफी पसंद आया. मेला स्थल पर सांस्कृतिक एवं साहित्यक कार्यक्रमों के अतिरिक्त विभिन्‍न स्टाल भी लगे थे, जिन पर स्थानीय कृषि उत्पाद, ऊनी वस्त्र, हस्त शिल्प सम्बंधी सामग्री, एल़आई़सी़, आधार कार्ड पंजीकरण व सुधार आदि की सुविधाएं भी उपलब्ध थी.

(लोक भाषा, साहित्य एवं संस्कृति संरक्षण की दिशा में प्रयासरत् दिनेश रावत का एक समीक्षात्मक लेख)

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