Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
ईजा को ‘पाख’ चाहिए ‘छत’ नहीं

ईजा को ‘पाख’ चाहिए ‘छत’ नहीं

Uncategorized
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—39प्रकाश उप्रेतीपहाड़ के घरों की संरचना में 'पाख' की बड़ी अहम भूमिका होती थी. "पाख" मतलब छत. इसकी पूरी संरचना में धूप, बरसात और एस्थेटिक का बड़ा ध्यान रखा जाता था. because पाख सुंदर भी लगे और टिकाऊ भी हो इसके लिए रामनगर से स्पेशल पत्थर मँगा कर लगाए जाते थे. रामनगर से पत्थर मंगाना तब कोई छोटी बात नहीं होती थी. अगर गाँव भर में कोई मँगा ले तो कहते थे-"सेठ आदिम छु, पख़्म हैं रामनगर बे पथर ल्या रहो" (सेठ आदमी है, छत के लिए रामनगर से पत्थर लाया है). ज्योतिष पाख की संरचना में एक 'धुरेणी' because (छत के बीचों- बीच बनी मेंड सी) दूसरी, "दन्यार" (छत के आगे के हिस्से में लगे पत्थर, जिनसे बारिश का पानी सीधे नीचे जाता था) और तीसरी चीज होती थी "धुँवार" (रोशन दान). इनसे ही पाख का एस्थेटिक बनता था. ज्योतिषपाख में जो "धुरेणी" होती थी वह सबसे महत्वपूर्ण थी. वही...
दुना नदी के तट से

दुना नदी के तट से

संस्मरण
बुदापैश्त डायरी-8डॉ. विजया सतीजब हम बुदापैश्त में थे, ऐसे अवसर भी आए जब देश और विदेश एक हो गए! ... वह तीस जनवरी की सुबह थी,  दुना नदी के किनारे की ठंडक ने देह में सिहरन पैदा की. तट से ज़रा ही दूर, वाहनों की आवाजाही के बीच सड़क का एक कोना धीरे-धीरे सजीव हो उठा.ज्योतिष गुमसुम सी उस इमारत के सामने एक-एक because कर कई जन आ जुटे जिसकी दीवार पर लगे संग-ए-मरमर पर सुनहरे अक्षरों में अंकित था – इस मकान में 30 जनवरी 1913 को जन्म लिया– भारतीय पिता उमराव सिंह शेरगिल और हंगेरियन मां अंतोनिया की बेटी के रूप में चित्रकार अमृता शेरगिल ने!ज्योतिष चित्रकार की स्मृति को अनौपचारिकता के साथ because समर्पित इस कार्यक्रम में बूढ़े, युवा, सामान्य, विशिष्ट - सभी जन सहज भाव से बारिश की बूंदों के बीच केवल अमृता शेरगिल की स्मृति से स्पंदित खड़े थे.ज्योतिषअमृता शेरगिल बीसवीं सदी की because म...
संकट में है आज विश्वमैत्री का प्रतीक हिमालय पुष्प ‘ब्रह्मकमल’

संकट में है आज विश्वमैत्री का प्रतीक हिमालय पुष्प ‘ब्रह्मकमल’

समसामयिक
2 अगस्त विश्वमैत्री दिवस पर विशेषडॉ. मोहन चन्द तिवारीआज 2अगस्त प्रथम रविवार के दिन को अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर मैं विश्वमैत्री का संदेश देने वाले संजीवनी तुल्य हिमालय के दुर्लभ पुष्प ‘ब्रह्मकमल’ के सम्बंध में सभी पर्यावरण प्रेमी मित्रों को बताना चाहता हूं कि खलजनों की मित्रता के समान भारतराष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक यह उत्तराखंड का राज्यपुष्प 'ब्रह्मकमल’ आज संकट के दौर में है. ‘ब्रह्मकमल’ ऊँचाई वाले क्षेत्रों का एक दुर्लभ पुष्प है जो कि सिर्फ हिमालय,उत्तरी बर्मा और दक्षिण-पश्चिम चीन में पाया जाता है.वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से ‘ब्रह्मकमल’ एस्टेरेसी कुल का पौधा है. इसका वैज्ञानिक वानस्पतिक नाम ‘सोसेरिया ओबोवेलाटा’ Saussurea obvallata है.सामान्य तौर पर ‘ब्रह्मकमल’ हिमालय की पहाड़ी ढलानों या 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है. वर्त...
सुन रहे हो प्रेमचंद! मैं विशेषज्ञ बोल रहा हूँ

सुन रहे हो प्रेमचंद! मैं विशेषज्ञ बोल रहा हूँ

साहित्यिक-हलचल
प्रकाश उप्रेतीपिछले कई दिनों से आभासी दुनिया की दीवारें प्रेमचंद के विशेषज्ञों से पटी पड़ी हैं. इधर तीन दिनों से तो तिल भर रखने की जगह भी नहीं बची है. एक से बढ़कर एक विशेषज्ञ हैं. नवजात से लेकर वयोवृद्ध विशेषज्ञों की खेप आ गई है. गौर से देखने पर मालूम हुआ कि इनमें तीन तरह के विशेषज्ञ हैं. वैसे तीनों कोटि के विशेषज्ञ नाभिनालबद्ध हैं. because अंतर बस आभा में है. तीनों की अंतरात्मा जोर देकर यही कहती है- प्रेमचंद पर भी पढ़ना पड़ेगा क्या? उन पर तो बोला जा सकता है. इस भाव के साथ ये प्रेमचंद की आत्म को बैकुण्ठ देने मैदान में उतर आते हैं. इन तीन कोटि के विशेषज्ञों के बारे में थोड़ा जान लें- ज्योतिष इनमें पहली कोटि के विशेषज्ञ वो हैं जिन्होंने सालों- साल से प्रेमचंद की कोई कहानी तक नहीं पढ़ी है. ये प्रथम कोटि के विशेषज्ञ हैं. ये पूर्वज्ञान के बल पर ही प्रेमचंद को निपटा देते हैं. because यह कोई पहला...
विश्व-साहित्य के युगनायक- प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन 

विश्व-साहित्य के युगनायक- प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन 

साहित्यिक-हलचल
मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर विशेषडॉ. अरुण कुकसालप्रेमचंद, गोर्की और लू शुन तीन महान साहित्यकार, कलाकार और चिंतक. जीवनभर अभावों में रहते हुए अध्ययन, मनन, चिन्तन और लेखन के जरिए बीसवीं सदी के विश्व-साहित्य के युगनायक बने. एक जैसे जीवन संघर्षों के कारण तीनों वैचारिक साम्यता, स्वभाव और व्यवहार के भी करीब थे. पढ़ने-लिखने का चस्का तीनों पर बचपन से था. प्रेमचन्द के पहले अध्यापक एक मौलवी थे जो उन्हें उर्दू-फारसी सिखाते थे. गोर्की ने अपनी नानी से सुनी कहानियों की हकीकत जानने की जिज्ञासा से पढ़ना शुरू किया. लू शुन मेघावी छा़त्र थे इस कारण पढ़ने का जनून उनमें बचपन से ही था. तीनों के पिता का निधन बचपन में ही हो गया था. निर्धनता के कारण पढ़ने के लिए कई कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा था. पर अपनी स्वाध्याय के प्रति जबरदस्त जिद्द के कारण उन्होनें हर मुसीबत का डटकर मुकाबला किया था.जनवादी लेखक हंसर...
अपनी थाती-माटी से आज भी जुड़े हैं रवांल्‍टे

अपनी थाती-माटी से आज भी जुड़े हैं रवांल्‍टे

लोक पर्व-त्योहार
अपने पारंपरिक व्‍यंजनों और संस्‍कृति को आज भी संजोए हुए हैं रवांई-जौनपुर एवं जौनसार-बावर के बांशिदेआशिता डोभालजब आप कहीं भी जाते हैं तो आपको वहां के परिवेश में एक नयापन व अनोखापन देखने को मिलता है और आप में एक अलग तरह की अनुभूति महसूस होती है. जब आप वहां की प्राकृतिक सुंदरता, संपन्नता, सांस्कृतिक विरासत, खान-पान, रहन—सहन, आभूषण और कपड़े—लत्ते इन चीजों से रू—ब—रू होते हैं तो वह आपको बार—बार अपनी ओर आकर्षित करते हैं और हमारा मन फिर उस स्थान पर जाने को लालायित हो उठता है. ऐसी ही एक सुंदर और सांस्कृतिक परिवेश से संपन्न घाटी है— 'रवांई घाटी' जो आज भी अपनी विरासतों को जिंदा रखे हुए हैं.आज हम आपको रवांई के एक प्रसिद्ध व्यंजन से रू—ब—रू करवा रहे हैं. इसको रंवाई के व्यंजनों का राजा भी कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. बल्कि नाम लिखने से पहले मैं आपको बताना चाहूंगी कि रवांई घाटी में ...
विधवा नारी के उत्पीड़न की करुण कथा है उपन्यास ‘ओ इजा’

विधवा नारी के उत्पीड़न की करुण कथा है उपन्यास ‘ओ इजा’

साहित्यिक-हलचल
 (शम्भूदत्त सती का व्यक्तित्व व कृतित्व-1)डॉ. मोहन चन्द तिवारीकुमाउनी आंचलिक साहित्य के प्रतिष्ठाप्राप्त  रचनाकार शम्भूदत्त सती जी की रचनाधर्मिता से  पहाड़ के स्थानीय लोग प्रायः कम ही परिचित हैं, किन्तु पिछले तीन दशकों से हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक कुमाउनी आंचलिक साहित्यकार के रूप में उभरे सती जी ने अपनी खास पहचान बनाई है. असल में शम्भूदत्त सती जी पहाड़ की माटी से जुड़े एक कुशल लेखक ही नहीं बल्कि उत्कृष्ट कोटि के अनुवादक, धारावाहिक फ़िल्मों के लेखक और पहाड़ की लुप्त होती सांस्कृतिक और परम्परागत धरोहर के संरक्षक गीतकार भी रहे हैं. मेरी सती जी से व्यक्तिगत स्तर पर मुलाकात आज तक नहीं हुई किन्तु फेसबुक में कुमाउनी साहित्य के सन्दर्भ में लिखे मेरे लेखों पर उनके द्वारा की गई सारगर्भित टिप्पणियों से मैं उनकी साहित्यिक प्रतिभा से से सदा अभिभूत रहा. उनके 'ओ इजा' उपन्यास के द्वारा कुमाउनी ...
सिस्टम द्वारा की गई हत्या!

सिस्टम द्वारा की गई हत्या!

किस्से-कहानियां
पहाड़ों में स्वास्थ्य सुविधाओं, अस्पतालों व डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण बहुत—सी गर्भवती महिलाएं असमय मृत्यु का शिकार हो जाती हैं. ऐसी ही पीड़ा को  उजागर करती है यह कहानीकमलेश चंद्र जोशीरुकमा आज बहुत खुश थी कि उसकी जिंदगी में एक नए मेहमान का आगमन होने वाला था और अब वह दो से तीन होने वाले थे. गांव  से लगभग 100 किलोमीटर दूर शहर में स्थित अस्पताल से रिपोर्ट लेने के बाद रुकमा अपनी सास के साथ वापस घर की ओर चल दी. रुकमा मैदानी क्षेत्र में पली बड़ी थी इसलिए पहाड़ों की घुमावदार सड़कों की उसे आदत नहीं थी जिस वजह से वह जब भी पहाड़ों में बस या कार से सफर करती तो उल्टियां करते परेशान हो जाती. लेकिन आज उसका ध्यान बस के सफर पर नहीं बल्कि अपनी जिंदगी में आने वाले नए मेहमान पर केंद्रित था. वह उसको लेकर न जाने कितने ही सपने बुन रही थी. इस दौरान उसे पता ही नहीं चला कि कब शहर से गांव तक की इतनी ल...