Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
छत्तीसगढ़ : पौराणिक काल का कौशल प्रदेश…

छत्तीसगढ़ : पौराणिक काल का कौशल प्रदेश…

ट्रैवलॉग
बिहाय के पकवान मंजू दिल से… भाग-11मंजू कालाभांवर परत हे, भांवर परत हे हो नोनी दुलर के, so हो नोनी दुलर के होवत हे दाई, मोर but रामे सीता के बिहाव होवत हे दाई, मोर because रामे सीता के बिहाव एक भांवर परगे, because एक भांवर परगे हो नोनी दुलर के, because हो नोनी दुलर के अगनी देवता दाई, because हाबय मोर साखी अगनी देवता दाई, because हाबय मोर साखी दुई भांवर परगे, because दुई भांवर परगे हो नोनी दुलर के, because हो नोनी दुलर के गौरी गनेस दाई, because हाबय मोर साखी गौरी गनेस दाई, because हाबय मोर साखी तीन भांवर परगे, तीन भांवर परगे हो नोनी दुलर के, because हो नोनी दुलर के देवे लोके दाई, because हाबय मोर साखी देवे लोके दाई, because हाबय मोर साखी चार भांवर परगे, चार भांवर परगे हो नोनी दुलर के, because दाई नोनी दुलर के दुलरू के नोनी, because तोर अंग झन डोलय दुलरू के नोनी...
आब कब आलै ईजा…

आब कब आलै ईजा…

किस्से-कहानियां
डॉ. रेखा उप्रेती ‘‘भलि है रै छै आमाऽ...’’ गोठ के किवाड़ की चौखट पर आकर खड़ी आमा के पैरों में झुकते हुए हेम ने कहा. ‘‘को छै तु?’’ आँखें मिचमिचाते हुए पहचानने की कोशिश की आमा ने... ‘‘आमा मी’’ हेम... ‘‘को मी’’... ‘‘अरे मैं हेम... तुम्हारा नाती..’’ आमा कुछ कहती तभी बाहर घिरे अँधेरे से फिर आवाज आयी- ‘‘नमस्ते अम्मा जी!’’ उत्तराखंड ‘‘आब तु कौ छै?’’ आमा की खीझती-सी आवाज पर हेम को जोर से हँसी आ गयी. ‘‘भीतर तो आने दे आमा , बताता हूँ. हेम ने आमा को अपने अंकवार में ले गोठ की ओर ठेला. उत्तराखंड गोठ में जलते चूल्हे के प्रकाश में हेम ने देखा, तवा चढ़ा हुआ है और एक भदेली में हरी साग.. ‘‘अरे, तेरा खाना बन गया आमा... बहुत भूख लगी है.’’ उत्तराखंड ‘‘पैली ये बता अधरात में काँ बट आ रहा तू और य लौंड को छू त्येर दगड़?’’ आमा ने गोठ के फर्श पर दरी बिछाते हुए कहा... फिर कुछ सोचते हुए बोली  ‘‘ भीतेर हिटो फ...
प्रयोग ही परिवर्तन के संवाहक बनेगें

प्रयोग ही परिवर्तन के संवाहक बनेगें

साहित्‍य-संस्कृति
इन्‍द्र सिंह नेगीये प्रयोग कितना सफल-असफल होता है ये भविष्य के गर्भ में है लेकिन चलना शुरू करेगें तभी कहीं ना कहीं पहुंच पायेगेंये लगभग चार वर्ष पहले की बात है जेठ का समय रहा और हमारे दो परिवारों के बच्चे सौरभ, कनिष्क, कुलदीप,  शुभम एवं रवि समर जेस मोटर मार्ग जो because लखस्यार से निकल कर फिलहाल कचटा गांव में समाप्त हो रहा है, से लगी हमारी पारिवारिक so जमीन जो बजंर हो चुकी थी ने गड्ढे खोदने शुरू किए. एक दिन मुझे भी इन्होने अपने इस कार्य को देखने के लिए आने को कहा तो मैं भी समय निकाल कर चल दिया, रस्ते में जब हम साथ-साथ खेतों की तरफ बढ़ने लगे तो मैंने पूछा कि तुम लोगों को ये गड्ढे खोदने की क्या सूझी तो so कहने लगे कि जरूरी नहीं पढ़ाई लिखाई करने के बाद नौकरी लग ही जायेगी इसलिए जरूरी है इस तरह के कामों को भी साथ-साथ आगे बढ़ाया जाए. मैंने कहा ये तो बहुत दूरदर्शिता पूर्ण बात कह दी तु...
अपने पहाड़ लौटने का सपना अपने साथ  ही ले गई प्यूलीं

अपने पहाड़ लौटने का सपना अपने साथ  ही ले गई प्यूलीं

किस्से-कहानियां
डॉ. कुसुम जोशी        फ्यूंली (प्यूंली) के खिलते ही पहाड़ जी उठे, गमक चमक उठे पहाड़ पीले रंग की प्यूंली से, कड़कड़ाती ठन्ड पहाड़ से विदा लेने लगी, सूखे या ठन्ड से जम आये नदी नालों में पानी की कलकल ध्वनि लौटने लगी, फ्यूंली के साथ खिलखिला उठी प्रकृति, रक्ताभ से बुंराश, राई के फूलो की पीली आभा, गुलाबी कचनार, आडू, खुबानी, प्लम, के सफेद, गुलाबी फूल, इन सब से खिल उठे हैं पहाड़, पशु, पक्षी सब. पहाड़ी सुन्दरी प्यूंली जब हंसती तो झरझर जी उठता था उसका घर आंगन, उसके पहाड़, गुनगुनाती हुई जंगल जाती घास काटती, लकड़ी बीनती, सारा जंगल, चिड़िया पशु पक्षी भी उसके साथ गुनगुनाते, रंग बिरंगी तितलियां पूरे जंगल को रंग से भर देती.... पूरा पहाड़ झूम उठा उनकी प्यूंली रानी बनेगी, पर जैसे जैसे रस्म आगे बढ़ रही थी, प्यूंली का दिल पहाड़ से दूर जाने के नाम से घबराने लगा था, पहाड़ भी महसूस करने लगे की उनकी खु...
सोनप्रयाग का ‘पहाड़ी किचन’ यानी आर्गेनिक उत्पादों से बने खाने का जायका

सोनप्रयाग का ‘पहाड़ी किचन’ यानी आर्गेनिक उत्पादों से बने खाने का जायका

रुद्रप्रयाग
अर्जुन सिंह रावतभारत के लोग घूमने और एक से दूसरे राज्य के खाने का जायका लेने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. चारधाम का अहम पड़ाव होने के कारण केदारनाथ हमेशा से ही because श्रद्धालुओं के ट्रैवल मैप में रहता है. पिछले कुछ वर्षों में केदारनाथ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है. ऐसे में यहां आने वाले लोगों को पहाड़ों के आथेंटिक जायके से रूबरू कराने और उन्हें सफर की 'जायकेदार' यादों देने के लिए केदारनाथ यात्रा के मुख्य पड़ाव सोनप्रयाग में पहाड़ी किचन की शुरुआत हुई है.उत्तराखंड केदारनाथ यात्रा में आने वाले कई लोग पहाड़ी खाने का स्वाद लेने की इच्छा रखते हैं. सोनप्रयाग में लोगों को आर्गेनिक पहाड़ी उत्पादों से तैयार खाने का विकल्प देने के लिए because ‘पहाड़ी किचन’ की शुरुआत की गई. 24 मई, 2019 को ‘पहाड़ी किचन’ एक प्रयोग के तौर पर शुरु हुआ, लेकिन अपने खास तरह के स्वाद के...
विद्यादत्त शर्मा: कलम और खुरपी के महामना!

विद्यादत्त शर्मा: कलम और खुरपी के महामना!

साहित्‍य-संस्कृति
नरेन्द्र कठैतपहाड़ में चीड़ की भीड़ ही भीड़ है. इसलिए चीड़ आत्ममुग्ध है कि वही पहाड़ की रीढ़ है. लेकिन थोड़ी सी भी, तेज हवा के झौंक में चीड़ की समूल उखड़ जाने because की प्रवृत्ति भी हमनें करीब से देखी है. हालांकि अंत, देर-सबेर सबका निश्चित है. वो इमारती हो अथवा करामाती, जलना सबको लकड़ी होकर ही है. किंतु चीड़ इतना बुद्धिहीन, बेखबर भी नहीं है - या - यूं कहें कि उसको यह भान नहीं है कि because उसके रग-रग में प्रज्वलन क्षमता भले ही है किंतु उसमें बांज के समान घनी छाया, मजबूत पकड़, प्रचण्ड ताप और शीतलता का वास नहीं है. इसीलिए चीड़ की आत्मा कदम-कदम पर बांज से खौफ खाती है. और-बांज से जितनी दूर हो सके पांव पसारती है.चीड़ पहाड़ की पगडंडियों, because धार-खाल-वनपथों पर ही नहीं अपितु साहित्य, कला, संस्कृति के क्षेत्र में भी ऐसी ही अति उत्साही चीड़ की सी भीड़ है. लेकिन.....इंही चीड़ और चीड़ के कुनबों की भीड़ से अल...
वरिष्ठ पत्रकार मनजीत नेगी ने पीएम मोदी को भेंट की अपनी पुस्तक ‘साधु से सेवक’ की पहली प्रति

वरिष्ठ पत्रकार मनजीत नेगी ने पीएम मोदी को भेंट की अपनी पुस्तक ‘साधु से सेवक’ की पहली प्रति

समसामयिक
पीएम मोदी की आध्यात्मिक यात्रा पर आधारित है पुस्तक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लिखी है पुस्तक की प्रस्तावना. पीएम मोदी ने अपने उत्तराखंड से जुड़ाव और शुरुआती सफर को याद करते हुए कई आध्यात्मिक स्थलों का जिक्र कियाहिमांतर ब्‍यूरो, नई दिल्‍लीवरिष्ठ पत्रकार मनजीत नेगी ने अपनी नई पुस्तक 'साधु से सेवक' की पहली प्रति सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भेंट की. यह पुस्तक नरेंद्र मोदी के शुरुआती जीवन की आध्यात्मिक यात्रा पर आधारित है. इसमें विशेष रूप से उत्तराखंड में विभिन्न स्थलों में बिताए गए दिनों और घटनाओं को प्रस्तुत किया गया है.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुलाकात के दौरान अपने उत्तराखंड से जुड़ाव और शुरुआती सफर को याद करते हुए कई आध्यात्मिक स्थलों का जिक्र किया. साथ ही पिथौरागढ़ जिले के नारायण आश्रम, रामकृष्ण कुटीर अल्मोड़ा, केदारनाथ स्थित गरूड़चट्टी और दयानंद आश...
आनंद का समय 

आनंद का समय 

साहित्‍य-संस्कृति
नीलम पांडेय‘नील’ब्रह्म ने पृथ्वी के कान में एक बीज मंत्र दे दिया है उसी क्रिया की प्रतिक्रिया में  जब बादल बरसते हैं,  तो स्नेह की वर्षा होने लगती है  और पृथ्वी निश्चल भीग उठती है. आज भी बादलों के गरजने और  धरती पर फ्यूंली के फूलने से, यूं लग रहा है  कि पृथ्वी मंत्र बुदबुदा रही है.  उत्तराखंड चीड़ के वृक्षों की झूमती कतारों से निकलने वाली सांय-सांय की आवाज दूर तक जैसे किसी की याद दिलाने लगती है. वृक्षों से निकल कर  पीला फाग उड़-उड़ कर because फैलने लगता है और पूरे वातावरण को अपनी आगोश में ले लेता है. एक लम्बी सुसुप्ति और नीरवता के बाद पेड़ पौधों पर नवांकुरो और नवपल्लवों को आते हुए देखना बहुत सुंदर लगता है ...आज सृजन के ऋतु यानी ऋतुराज वसंत के आगमन की शुरुआत है. नव पल्लव की सुगंध में रचे बसे से लोग, लोक जीवन के भाव लिए हुए नए कोंपलों के स्वागत की तैयारी में गीत गाने लगते हैं, so ...
प्रकृति का लोकपर्व फूलदेई

प्रकृति का लोकपर्व फूलदेई

लोक पर्व-त्योहार
चन्द्रशेखर तिवारीमनुष्य का जीवन प्रकृति के साथ अत्यंत निकटता से जुड़ा है। पहाड़ के उच्च शिखर, पेड़-पौंधे, फूल-पत्तियां, नदी-नाले और जंगल में रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं के साथ because मनुष्य के सम्बन्धों की रीति उसके पैदा होने से ही चलती आयी है। समय-समय पर मानव ने प्रकृति के साथ अपने इस अप्रतिम साहचर्य को अपने गीत-संगीत और रागों में भी उजागर करने का प्रयास किया है।उत्तराखंड पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनेक लोक so गीतों के रुप में ये गीत समाज के सामने पहुंचते रहे। उत्तराखण्ड के पर्वतीय लोकगीतों में वर्णित आख्यानों को देखने से स्पष्ट होता है कि स्थानीय लोक ने प्रकृति में विद्यमान तमाम उपादानों यथा ऋतु चक्र,पेड़-पौधों, पशु-पक्षी,लता,पुष्प तथा नदी व पर्वत शिखरों को मानवीय संवेदना से जोड़कर उसे महत्वपूर्ण स्थान दिया है।उत्तराखंडलोकगीतों वर्णित बिम्ब एक अलौकिक but और विशिष्ट सुख का आभास कराते हैं। मा...
वक्त के साथ ‘फूलदेई’ भी बदल गई

वक्त के साथ ‘फूलदेई’ भी बदल गई

लोक पर्व-त्योहार
ललित फुलाराटोकरी और भकार- दोनों ही छूट गया. बुरांश और फ्योली भी आंखों से ओझल हो गई. बस स्मृतियां हैं जिन्हें ईजा, आंखों के आगे उकेर देती है. देहरी पर सुबह ही फूल रख दिए गए हैं. ईजा के साथ-साथ हम because भी बचपन में लौट चले हैं. तीनों भाई-बहन के हाथों में टोकरी है.टोकरी में बुरांश, फ्योली, आड़ू so और सरसों के फूल.गुड़ की ढेली और मुट्ठी भर चावल. गोद में परिवार में जन्मा नया बच्चा जिसकी पहली फूलदेई है. तलबाखई से लेकर मलबाखई तक हर घर में हम बच्चों की कितनी आवोभगत हो रही है. तन-मन में स्फूर्ती but भरती वसंत की ठंडी हवा में उल्लासित हमारा मन, अठन्नी और चवन्नी की गिनती के साथ ही गुड़ के ढेले में रमा हुआ है. पैसों की खनखनाहट के साथ ही हमारे सपने भी खनक रहे हैं. बहन के बालों में फ्योली का फूल लहलहा रहा है. भाई का मन गुड़ और मिठाई में रमा हुआ है.हर धैली पर फ्योली का फूल चढ़ाकर त...