Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में फले और फैलेगी वंशबेल

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में फले और फैलेगी वंशबेल

देहरादून
प्रकाश उप्रेतीउत्तराखंड राज्य ने ही 21 पूरे नहीं किए हैं बल्कि उत्तराखंड की राजनीति को भी 22वां लग गया है. इन बीते वर्षों को अगर खलिया टॉप और द्रोणागिरी से देखेंगे तो लगेगा because कि 21 वर्षों में हम उल्टे पाँव चले हैं. वहीं अगर ऋषिकेश, देहरादून, अल्मोड़ा और कोटद्वार में बचे किसी खेत के किनारे बैठकर 21 वर्षों की यात्रा को देखा जाए तो महसूस होगा कि हम सिर्फ 'बहे' हैं. पार लगे भी तो वहाँ जाकर जहाँ अब एम्स बन रहा है. इन परिस्थितियों की जिम्मेदार वह ठेकेदारी वाली राजनीति है जिसने पहाड़ को फोड़कर 'मैदान' कर दिया. हर चुनाव में पहाड़ पहले से और ज्यादा  मैदान हुए तो वहीं राजनीति सुगम.ज्योतिष प्रदेश में इस बार because का चुनाव 22वे पर ही है. मतलब हर नेता जोर लगा रहा कि इस बार टिकट बेटा- बेटी या घर के किसी सदस्य को मिल जाए. यह कवायद दोनों (भक) पार्टियों में चल रही है. उत्तराखंड का यह चुनाव वंश...
जैनेटिक विज्ञान का नया दावा : क्या जल से पहले पौधों की उत्पत्ति हुई?

जैनेटिक विज्ञान का नया दावा : क्या जल से पहले पौधों की उत्पत्ति हुई?

जल-विज्ञान
डॉ. मोहन चंद तिवारीक्या है भारतीय सृष्टि विज्ञान की अवधारणा? दो साल पहले उपर्युक्त शीर्षक से लिखे अपने  फेसबुक लेख को अपडेट करते हुए इस लेख के माध्यम से यह जानकारी देना चाहता हूं कि भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु (1858-1937) because ने उन्नीसवीं शताब्दी में जैनेटिकविज्ञान के क्षेत्र में यह खोज पहले ही कर दी थी कि पौधों में भी जीवन होता है. आधुनिक बायोफिजिक्स के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान यह था की उन्होंने अपने अनुसंधानों द्वारा यह दिखाया की पौधो में उत्तेजना का संचार वैद्युतिक (इलेक्ट्रिकल ) माध्यम से होता हैं न की केमिकल के माध्यम से. बाद में इन दावों को वैज्ञानिक प्रोयोगों के माध्यम से सच साबित किया गया था.ज्योतिष आचार्य बसु ने सबसे पहले माइक्रोवेव के वनस्पति के टिश्यू पर होने वाले असर का अध्ययन किया था. उन्होंने पौधों पर बदलते हुए मौसम से होने वाले असर का अध्ययन किया...
सफर खूबसूरत हो…

सफर खूबसूरत हो…

किस्से-कहानियां
कुसुम भट्ट भय की सर्द लहर के बीच में झुरझुरी उठी. अनजानी जगह, अंधेरी रात, चांद का कहीं पता नहीं. अमावस है शायद. सुनसान शहर और वह एकदम अकेली! उसने सिहरते हुए देखा, because देह का जो चोला उन सब ने पहना था उसकी तरह किसी का भी नहीं था. गोया किसी तीसरी दुनिया के वाशिंदे थे जो कभी-कभार मूवी या सीरियल में दिखाई पड़ते थे जिनसे अपना कोई संबंध नहीं होता. बस शंका और भय की because नागफनी उगा करती है. वह कुछ कहना चाहती है पर जीभ तालू से चिपक रही है. इस कदर डरावना अहसास जिंदगी में पहली मर्तबा हो रहा था. भूख लगी थी सो चली आई. तवे-सी रंगत और चुहिया-सी काया वाली निर्मला दीवान के आदेश पर बच्चे की मानिन्द चली आई थी. ज्योतिष पेट की भूख से बड़ी कोई भूख नहीं, यही समझ में आया था. निर्मला दीवान के रूखे वाक्यों के पत्थर सब पर पड़े थे. ‘यहां किसी के लिए खाना नहीं आएगा. वहीं होटल चलना पड़ेगा.’ थोड़ी दूर खड़ी अंधेरे में...
राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस: पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा देने की मांग

राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस: पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा देने की मांग

देहरादून
राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर संगोष्ठी आयोजन,  फर्जी मुकदमों और बढ़ते हमलों पर जताई चिन्ताहिमांतर ब्यूरो, देहरादूनराष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस के अवसर पर आज राजधानी देहरादून में पत्रकारों ने एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस आयोजन पर पत्रकारों ने मौजूूदा समय में पत्रकारिता की चुनौतियों because और समस्याओं पर चर्चा की. पत्रकारों ने इस बात की चिंता जताई कि मौजूदा समय में पत्रकारों पर हमले बढ़ गये हैं और उनकी सुरक्षा को लेकर खतरा है. आयोजन में उपस्थित सभी पत्रकारों ने अपनी सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर सरकार से वार्ता करने की बात कही. साथ ही कहा गया कि पत्रकार और उनके आश्रितों के लिए कल्याणकारी योजनाओं पर जोर दिया जाएगा. ज्योतिष संगोष्ठी में पत्रकारों ने सरकार से मांग की कि कोरोना काल में प्रभावित पत्रकारों के परिजनों को आर्थिक सहयोग के साथ ही उनको सरकारी नौकरी भी दी जाए. साथ ही because म...
पौड़ी के ऐरोली गांव में 40 साल बाद मनाई गई ईगास बग्वाल

पौड़ी के ऐरोली गांव में 40 साल बाद मनाई गई ईगास बग्वाल

पौड़ी गढ़वाल
हिमांतर ब्यूरो, पौड़ीराज्य सरकार तथा इसके सांसदों व विधायकों की अपील का लोगो पर असर दिखाई देने लगा है. सरकार की अपील कि ‘इगास-बग्वाल गांव में मनाये’ की तर्ज पर जनपद पौड़ी के चौबट्टाखाल because विधानसभा क्षेत्र के ऐरोली (तल्ली) में ग्रामवासियों द्वारा लगभग 40 बर्षो बाद गांव में इगास- बग्वाल मनाई गई. इस कार्यक्रम में दिल्ली, देहरादून, मुंबई, लखनऊ, कोटद्वार, हरिद्वार से 12 परिवार गांव पहुंचे तथा त्यौहार मनाया. ज्योतिष ऐरोली (तल्ली) विकासखंड पोखरा के because अंतर्गत एक पिछड़ा गांव है जहा पर आजादी के इतने साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. गांव में मोटरमार्ग भी नहीं है. इन्ही सब कारणों से गांव से विगत में काफी पलायन हुआ है आज गॉव में सिर्फ 4 परिवार वास करते है.ज्योतिष इस अवसर पर ग्रामीणों द्वारा एक सभा भी आयोजित की गई जिसमे  भविष्य में गांव के विकास पर चर्चा हुई. साथ ही बाहर बस र...
हिन्दी बने व्यवहार और ज्ञान की भाषा

हिन्दी बने व्यवहार और ज्ञान की भाषा

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  अक्सर भाषा को संचार और अभिव्यक्ति के एक प्रतीकात्मक माध्यम के रूप ग्रहण किया जाता है.  यह स्वाभाविक भी है. हम अपने विचार, सुख-दुख के भाव और दृष्टिकोण दूसरों तक मुख्यत: भाषा द्वारा ही पहुंचाते हैं और संवाद संभव होता है. निश्चय ही यह भाषा की बड़ी भूमिका है परंतु इससे भाषा की शक्ति का because केवल आंशिक परिचय ही मिलता है क्योंकि शायद ही कुछ ऐसा अस्तित्व में हो जो भाषा से अनुप्राणित न हो. भाषा से जुड़ कर ही वस्तुओं की अर्थवत्ता का ग्रहण हो पाता है. यही सोच कर भाषा को जगत की सत्ता और उसके अनुभव की सीमा भी कहा जाता है. सचमुच जो कुछ अस्तित्व में है वह समग्रता में भाषा से अनुविद्ध है. ज्योतिष सत्य तो यही है कि भाषा मनुष्य जाति की ऐसी रचना है जो स्वयं मनुष्य को रचती चलती है और अपनी सृजनात्मक शक्ति से नित्य नई नई संभावनाओं के द्वार खोलती चलती है. हम ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगि...
बाल साहित्य का स्पेस ‘मोबाइल’ की ‘स्क्रीन’ ने भर दिया

बाल साहित्य का स्पेस ‘मोबाइल’ की ‘स्क्रीन’ ने भर दिया

साहित्‍य-संस्कृति
बाल दिवस पर विशेषप्रकाश उप्रेती पिछले कुछ समय से हमारी दुनिया बहुत तेजी से बदली है. इस बदलाव में एक पीढ़ी जहाँ बहुत पीछे रह गई तो वहीं दूसरी पीढ़ी बहुत आगे निकल गई है. इस बदलाव में जिसने because अहम भूमिका निभाई वह मोबाइल की स्क्रीन और एक क्लिक पर सबकुछ खोज लेना का भरोसा देने वाला इंटरनेट है. आज  बाल पत्रिकाओं के मुकाबले बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर यूट्यूब के जरिए कहानियाँ देख रहे हैं. उनका पूरा बौद्धिक स्पेस मोबाइल और इंटरनेट तक सिमट गया है.ज्योतिष हिंदी साहित्य के केंद्र में बाल साहित्य कभी नहीं रहा . हमेशा से बाल साहित्य को अगंभीर साहित्यिक कर्म के रूप में देखा गया . आज भी बाल साहित्य के अस्तित्व पर अलग से कम ही बात होती है. इसलिए कभी बचकाना साहित्य कह कर तो कभी साहित्यिक गंभीरता (जो कम ही दिखती है) के नाम पर बाल साहित्य को केंद्र because से बाहर ही रखा गया.  इसके बावजूद हिंदी मे...
डीडीहाट महोत्सव: सिराकोट मंदिर तक बनेगा रोपवे!

डीडीहाट महोत्सव: सिराकोट मंदिर तक बनेगा रोपवे!

पिथौरागढ़
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने क्षेत्र के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं घोषणा कीहिमांतर ब्यूरो, पिथौरागढ़मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पिथौरागढ़ के डीडीहाट में आयोजित पांच दिवसीय डीडीहाट महोत्सव के समापन अवसर पर कुमाऊंनी भाषा में संबोधित करते हुए क्षेत्र के विकास हेतु विभिन्न घोषणाएं कि जिसमें, डीडीहाट नगर से सिराकोट मंदिर तक रोपवे का निर्माण करने, जीजीआइसी डीडीहाट का नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय देव सिंह because डसीला के नाम किए जाने, डीडीहाट खेल मैदान के विस्तारीकरण करने की कार्यवाही हेतु जिलाधिकारी को प्रस्ताव तैयार करते हुए शासन को प्रेषित करने की घोषणा, घसाड़ विद्यालय का उच्चीकरण किए जाने, डीडीहाट नगर के आंतरिक मार्गों के निर्माण व सौंदर्यीकरण किए जाने की स्वीकृति की घोषणा, डीडीहाट महोत्सव को प्रत्येक वर्ष राजकीय मेले के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गई. मुख्यमंत्...
उत्तराखंड का परंपरागत रेशा शिल्प

उत्तराखंड का परंपरागत रेशा शिल्प

साहित्‍य-संस्कृति
चन्द्रशेखर तिवारी प्राचीन समय में समस्त उत्तराखण्ड में परम्परागत तौर पर विभिन्न पादप प्रजातियों के because तनों से प्राप्त रेशे से मोटे कपड़े अथवा खेती-बाड़ी व पशुपालन में उपयोग की जाने वाली सामग्रियों का निर्माण किया जाता था. पहाड़ में आज से आठ-दस दशक पूर्व भी स्थानीय संसाधनों से कपड़ा बुनने का कार्य होता था. ट्रेल (1928) के अनुसार उस काल में पहाड़ के कुछ काश्तकार लोग कुछ जगहों पर कपास की भी खेती किया करते थे.ज्योतिष कुमाऊं में कपास की बौनी किस्म से कपड़ा बुना जाता था. कपड़ा बुनने के इस काम को तब शिल्पकारों की उपजाति कोली किया करती थी. हाथ से बुने इस कपड़े को 'घर बुण’ के नाम से जाना जाता था. टिहरी रियासत में कपड़ा बुनने वाले बुनकरों को because पुम्मी कहा जाता था. भारत की जनगणना 1931, भाग-1, रिपोर्ट 1933 में इसका जिक्र आया है. उस समय यहां कुमाऊं के कुथलिया बोरा व दानपुर के बुनकर तथा गढ़वाल के ...
अशोक चक्र विजेता शहीद हवलदार बहादुर सिंह बोहरा

अशोक चक्र विजेता शहीद हवलदार बहादुर सिंह बोहरा

पिथौरागढ़
प्रकाश चन्द्र पुनेठा उत्तराखण्ड राज्य के जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से लगभग 79 किलोमीटर दूर पश्चिम में गंगोलीहाट तहसील में लगभग 29 किलामीटर दूर रावलखेत गाँव है. रावलखेत गाँव हमारे देश के शाँन्तिकाल के सर्वाच्च वीरता पुरुस्कार अशोक चक्र विजेता, 10वीं बटालियन पैराशूट रेजिमेंट के स्वर्गीय हवलदार बहादुर because सिंह बोहरा का गाँव है. वर्तमान में जिला पिथौरागढ़ में शहीद हवलदार बहादुर सिंह बोहरा एकमात्र अशोक चक्र विजेता है. जब भी हम किसी गाँव में जाते है तो देखते है कि अक्सर गाँव में कई मकान एक दूसरे से सटकर बने हुए हैं, मकानों के आँगन आपस में मिले हुए है, गाँव का मुख्य मार्ग, मकानों के छोटे-छोटे मार्गों से जुड़ा होता है. जिस कारण गाँव में रहने वाले लोग एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं.ज्योतिष इसके विपरीत शहर से दूर पहाड़ों के मध्य घनघोर बीहड़ जंगल के मध्य स्थित रावलखेत गाँव, विस्तृत क्षेत्र में बि...