धर्मस्थल

निर्धनों, वंचितों और समाज के शोषितों के न्याय प्रदाता राजा ग्वेल

डॉ. मोहन चंद तिवारी

राजा ग्वेल देवता खुशहाल,समतावादी और न्यायपूर्ण, राज्य व्यवस्था के प्रतिमान हैं. राजा ग्वेलदेव ने समाज के रसूखदारों और दबंगों को खबरदार करते हुए कहा मेरे राज्य में कोई भी बलवान निर्बल को और धनवान निर्धन को नहीं सता सकता-

 “न दुर्बलं कोऽपि बली मनुष्यो,
बलेन बाधेत मदीयराज्ये.

ज्योतिष

कुमाऊंनी दुदबोली के रचनाकार लोककवियों और स्थानीय जागर गाथाओं को आधार बनाकर आधुनिक संस्कृत साहित्य के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् डा.हरिनारायण दीक्षित जी ने अपने महाकाव्य ‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’ में न्यायकारी महानायक ग्वेल देवता के जिस चरित्र का महामंडन किया है वह आधुनिक युगबोध की भ्रष्टाचार और शोषणपूर्ण राज्य व्यवस्था से सीधे संवाद करने वाला अति उत्तम महाकाव्य है.

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यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारे स्कूल और कालेज के राजनीतिशास्त्र के विद्द्यार्थियों को यूनान और मिश्र की मृत सभ्यताओं के प्लेटो,अरिस्टोटल आदि राजनैतिक विचारकों को पढ़ाया जाता है किंतु देश की मिट्टी से जुड़े चाणक्य, विदुर, कालिदास,भारवि आदि भारतीय विचारकों के राजनैतिक चिंतन को हेय की दृष्टि से देखा जाता ह और न ही इन स्वदेशी चिंतकों  को राजनीति शास्त्र के पाठ्यक्रम में कभी कोई स्थान मिल पाया है.

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उत्तराखंड की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के इतिहास से जुड़े न्याय देवता ग्वेलज्यू की पोस्ट लिखने का हमारा एक खास प्रयोजन यह भी है कि संस्कृत भाषा के ‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’ नामक महाकाव्य के माध्यम से प्रजाहितकारी शासनव्यवस्था की एक उजली तस्वीर पेश की जा सके भले ही वह ऐतिहासिक हो या काल्पनिक इससे कोई खास अंतर नहीं पड़ता. महत्त्वपूर्ण यह है कि राज्य के नेतृत्व में पराक्रम और ईमानदारी का शुभसंकल्प हो तो समाज में बदलाव तुरंत आ जाते हैं. दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि साम्यवाद और समाजवाद पश्चिमी चिंतन नहीं न्यायदेवता ग्वेल ने इसी सिद्धांत के आधार पर आम जनता को  राजनैतिक न्याय प्रदान किया.यही कारण है कि उत्तराखंड की सभ्यता और संस्कृति की कोख से उपजा यह देवचरित्र अपने न्यायकारी  कर्तव्यों के फलस्वरूप जन-जन का पूज्य बन गया.

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वर्तमान संदर्भ में यह हमारी गुलाम और अंग्रेज मानसिकता का ही द्योतक है कि हम राजनैतिक धरातल पर कभी रामराज्य के नाम पर तो कभी स्वराज प्राप्ति का नारा देकर और कभी तरह तरह के लोक लुभावन जुमलों से अच्छे दिनों के सब्जबाग दिखा कर अपनी भोली भाली जनता को छलते आए हैं. बीते 73 वर्षों से राजनेताओं ने कभी कोशिश नहीं की कि जनता को खासकर गरीब और निर्धन वर्ग को तुरंत न्याय का अधिकार मिल सके.अदालतों में लंबित मामले तुरन्त निपटाए जा सकें.

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आज न्याय के संवैधानिक मौलिक अधिकार को प्राप्त करना इतना महंगा और कष्टसाध्य हो गया है कि न्याय पाने की प्रतीक्षा में कई पीढियां खफ जाती हैं फिर भी पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता है. यह हाल तब है जब हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के अधिवक्ता रह चुके विभिन्न राजनैतिक दलों  के राजनेता इस लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं. पर इन न्यायविद नेताओं ने जनसामान्य को न्याय तुरंत दिलाने या देश की बदहाल न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए इन नेताओं द्वारा कुछ भी नहीं किया गया. आज भी इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था  में सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करके या पैसे के बल पर बड़े बड़े नामी गिरामी वकीलों की फीस चुकाकर न्याय को विलम्बित किया जा सकता है जिसका सीधा सा मतलब है सामान्य और गरीब जनता को उसके न्याय प्राप्ति के मौलिक अधिकार से वंचित कर देना.

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राजा हाल राय के समय में राज्य के कुछ शासनाधिकारी तानाशाही का राज्य कायम किए हुए थे. कुछ कर्मचारी घूस और रिश्वत भी लेते थे. बाला गोरिया के राजा बनते ही धूमाकोट के प्रशासन में भारी बदलाव नज़र आने लगे. डा. दीक्षित जी ने कहा है कि राजा ग्वेल के युवराज बनते ही राज्य कर्मचारियों की लापरवाही, मक्कारी और घूसखोरी की आदतें ऐसे ही गायब हो गईं जैसे खरगोश के सिर से सींग गायब हो जाते हैं

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राजा ग्वेल ने अपने पैतृक राजकाज संभालने के तुरंत बाद राज्य में भारी मात्रा में परिवर्तन किए.उनके पिता राजा हालराय की शासन व्यवस्था बहुत कुछ अच्छी नहीं थी वह भ्रष्टाचार में लिप्त थी. स्वयं बाला गोरिया और उनकी माता कालिंका राजमहल की सात सौतेली रानियों के आतंक और अत्याचार से पीड़ित थे. राजमहल षड़्यंत्रों का अड्डा बना हुआ था और राजा हालराय को कुछ पता ही नहीं था. ऐसे में जब राज परिवार के लोग ही अन्याय और अत्याचार का दंश झेल रहे हों तो प्रजा की सुनवाई कौन करेगा? इसका अनुमान स्वयं ही लगाया जा सकता है.

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दरअसल,मध्यकाल के सामंतवादी उस राजतंत्रीय शासन प्रणाली में गरीबों के लिए न्याय मिलना कितना कठिन और दुर्लभ रहा होगा इसका अनुमान हम आज के लोकतान्त्रिक युग की खस्ताहाल न्याय व्यवस्था से भी लगा सकते हैं जो मूलतः जनता द्वारा चुनी हुई शासन प्रणाली है. मगर देश का साहित्यकार फिर भी अपने अतीत से प्रेरणा ले कर आज भी अपने वर्तमान की भ्रष्ट समाज व्यवस्था से संवाद करता आया है. वह भले ही सबको न्याय दिलाने में असमर्थ हो किंतु न्याय देवता ग्वेलज्यू के माध्यम से सबको त्वरित न्याय मिलने का जन जागरण तो कर ही सकता है.कुमाऊं अंचल में इंसाफ के देवता ग्वेलज्यू की जो घर घर में जागर लगाई जाती है उसके बोल भी कुछ इसी प्रकार के हैं-

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गोरिया महाराजन के राजा नाम लिनीं तुमारौ.
दुदाधारी कृष्ण अवतारी नाम छौ तुमारौ॥

दयावान तपवान नंगा कौ सिर ढक्छा झुका के.
पेट भरछा,निधनी कैं धन,पुत्र दिछा अपुत्री कैं॥

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इंसापी देव छा दुदी में को बाल छाटछा.
तब महाराजन के राजा नाम लिनीं तुमारौ॥
        -जै उत्तराखंड जै ग्वेल देवता,पृ.22

राजा हाल राय के समय में राज्य के कुछ शासनाधिकारी तानाशाही का राज्य कायम किए हुए थे. कुछ कर्मचारी घूस और रिश्वत भी लेते थे. बाला गोरिया के राजा बनते ही धूमाकोट के प्रशासन में भारी बदलाव नज़र आने लगे. डा. दीक्षित जी ने कहा है कि राजा ग्वेल के युवराज बनते ही राज्य कर्मचारियों की लापरवाही, मक्कारी और घूसखोरी की आदतें ऐसे ही गायब हो गईं जैसे खरगोश के सिर से सींग गायब हो जाते हैं-

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ततस्तु तेषां किल कर्मचारिणा-
मुत्कोचलिप्सा प्रशशाम सत्वरम्.

कार्यप्रमादश्शशश्रृङ्गतां गतो
निरङ्कुशत्वं च ननाश चित्ततः॥
                 -ग्वल्लदेव.,20.6

राज्य की बागडोर सम्भालते ही because सबसे पहले राजा ग्वेल ने ऐसे प्रजाहितकारी शासनादेश और राजकीय फ़रमान जारी किए जिनका संबंध न्याय, सत्य और सामाजिक बराबरी पर आधारित राज्य की स्थापना से था ताकि उस सामंतशाही के युग में गांव के जमींदारों की तानाशाही और अफसरशाही के भ्रष्ट प्रशासन से प्रजा को मुक्ति मिल सके और गरीब और अमीर,स्त्री और पुरुष समस्त प्रजाजनों को राज्य द्वारा देय पूरा इंसाफ मिल सके.

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राजा ग्वेल ने अपने राज्य के न्यायालयों में ऐसे आदेश जारी किए जिससे कि बिना पक्षपात के सब को समान रूप से न्याय मिल सके. राजा ग्वेल ने आदेश जारी किया कि जैसे तराजू because तौलते समय यह भेदभाव नहीं करती कि तौली जाने वाली वस्तु सोना-चांदी है या मिट्टी उसी प्रकार न्यायाधिकारियों को न्याय करते हुए राजा और रंक में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए-

न्यायालये सन्तु समे समाना,
ग्राह्यो न कस्यापि च तत्र पक्षः.

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तुला विधत्ते तुलने न भेदं,
स्वर्णस्य रौप्यस्य च मृतिकायाः॥
                -ग्वल्लदेव.,21.21

राज्याभिषेक हो जाने के बाद because राजा ग्वेलदेव ने अपने राज्य में न्याय और सत्य की प्रतिष्ठा और प्रजा की भलाई के लिए ऐसे अनेक शासनादेश और फ़रमान जारी किए जो आज भी प्रजातांत्रिक राज्य के लिए प्रासंगिक और अनुकरणीय हैं.उनमें से कुछ

शासनादेश इस प्रकार हैं-

1. मेरे राज्य में कोई भी बलवान व्यक्ति निर्बल को नहीं सताए और कोई भी धनवान व्यक्ति निर्धन को अपमानित न करे-

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न दुर्बलं कोऽपि बली मनुष्यो,
बलेन बाधेत मदीयराज्ये.
न निर्धनं कोऽपि धनी च मानी,
विमानयेत्क्वापि कथञ्चनापि॥
              – ग्वल्लदेव.,21.13

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2. मेरे राज्य में कोई भी दुष्ट पढा लिखा शहरी मानसिकता वाला व्यक्ति गांवों के भोले भाले लोगों का मज़ाक न उड़ाए और उनके साथ ठगी न करे-

नाशिक्षितं कोऽपि सुशिक्षितो ना,
ग्राम्यं जनं कोऽपि न नागरो ना.
स्वशिक्षया नागरचित्तवृत्त्या,
प्रवञ्चयेद्वोपहसेच्चदुर्धीः॥
ग्वल्लदेव.,21.14

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3. राजा ग्वेल ने कृषि प्रधान अपनी राज्यव्यवस्था में कृषि के विकास because के लिए अनेक प्रकार के उपाय किए,ताकि गांवों में रहने वाले खुशहाल बनें और वे गरीबी का कष्ट न सहें-

कृषेर्विकासाय विचारपूर्व,
नाना प्रयत्ना अपि संविधेयाः.
धनोदयो ग्राम्यजनेषु यैस्सयाद,
दरिद्रता नैव वसेच्चतेषु॥
        -ग्वल्लदेव.,21.15

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4. न्यायदेवता राज्य के शहरी इलाकों में उद्योगों का ऐसा चहुंमुखी विकास करना चाहते थे जिससे कि धन की देवी लक्ष्मी  हमेशा ही यहां डेरा डालकर बैठी रहीं-

उद्योगवृद्धिर्विविधा पुरेषु,
राज्यस्य सर्वेष्वपि संविधेया.
यथा हि पौरेषु जनेषु लक्ष्मीस्
सुखं वसेदत्र मदीयराज्ये॥
         -ग्वल्लदेव.,21.16

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5. न्यायदेवता ने आदेश जारी किया कि because राज्य में अज्ञान का अंधकार दूर करने और ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए सभी शहरों और गांवों में विद्यालयों का निर्माण किया जाना चाहिए-

अज्ञाननाशाय निजप्रजानां,
ज्ञानस्य लाभाय तथा ह्यमूषाम्.
विद्यालयास्सन्त्यपि चालनीया,
ग्रामेषु सर्वेषु तथा पुरेषु॥
            -ग्वल्लदेव.,21.17

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संक्षेप में ग्वेलज्यू के लोक कल्याणकारी राज्य because की अवधारणा उन न्याय,सत्य और सामाजिक बराबरी के मूल सिद्धांतों पर आधारित थी जिसमें न कोई भी भूखा होना चाहिए,न कोई भी पीड़ित होना चाहिए, न कोई भी भयभीत होना चाहिए, न कोई भी अनपढ होना चाहिए,न कोई भी दीन होना चाहिए, न कोई भी दुःखी होना चाहिए और न कोई भी धनहीन होना चाहिए-

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ममात्र राज्ये न भवेत्क्षुधार्त्तो,
न पीडितः कोऽपि न कोऽपि भीतः.
नाशिक्षितः कोऽपि न कोऽपि दीनो,
न दुःखितो नापिच वित्तहीनः॥
                      -ग्वल्लदेव.,2137

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उत्तराखंड के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से न्याय देवता ग्वेल मात्र एक पत्थर की मूर्ति को पूजने का धार्मिक विश्वास या परंपरागत मान्यता ही नहीँ बल्कि यह बाहुबलियों और सत्ता के because मद में चूर धनबलियों के विरुद्ध साहस पराक्रम जुटाने हेतु सामान्य जन का आत्म विश्वास और राजधर्म की आंतरिक प्रेरणा शक्ति भी है.यह असत्य,अन्याय तथा अपराधवृति के विरुद्ध लड़ने की दिव्य शक्ति को जगाने का साहित्यिक जन जागरण भी है.

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आज पूरे देश में आर्थिक विषमता की चर्चा चल रही है.एक तरफ भ्रष्ट नेता पानी की तरह चुनावों में पैसा लुटा रहे हैं तो दूसरी ओर देश की एक बहुत बड़ी आबादी,भूख, कुपोषण, स्वास्थ्य और because शिक्षा के संसाधनों की कमी का दंश झेल रही है, जिसका मुख्य कारण है आर्थिक विषमता और प्रशासनिक भ्रष्टाचार.और नेताओं की अयोग्यता.किन्तु न्याय देवता ग्वेल के उपर्युक्त शासनादेश बताते हैं कि उन्होंने घोर सामंतवादी राजतंत्र के जमाने में भी आम जनता को सामाजिक न्याय का कल्याणकारी शासन प्रदान किया. उन्होंने गांव गांव में लोक अदालतों की स्थापना करके आम जनता के घर घर न्याय पहुंचाया.

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उत्तराखंड के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से न्याय देवता ग्वेल मात्र एक पत्थर की मूर्ति को पूजने का धार्मिक विश्वास या परंपरागत मान्यता ही नहीँ बल्कि यह बाहुबलियों और सत्ता के मद में चूर because धनबलियों के विरुद्ध साहस पराक्रम जुटाने हेतु सामान्य जन का आत्म विश्वास और राजधर्म की आंतरिक प्रेरणा शक्ति भी है.यह असत्य,अन्याय तथा अपराधवृति के विरुद्ध लड़ने की दिव्य शक्ति को जगाने का साहित्यिक जन जागरण भी है.

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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय because के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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