
भद्रज मंदिर मानो बांज की सरणी से चमकती मणि
भद्रज मंदिर: यात्रा वृत्तांतसुनीता भट्ट पैन्यूली
जिज्ञासा से था आकुल मन
वह मिट्टी, हुई कब तन्मय मैं,
विश्वास मांगती थी प्रतिक्षण
आधार पा गयी निश्चय मैं!
बाधा-विरोध अनुकूल बने
अंतर्चेतन अरूणोदय में,
पर भूल विहंस मृदु फूल बने
मैं विजयी प्रिय,तेरी जय में.
-सुमित्रा नंदन पंत
जिस चरम पर पहुंचकर आकांक्षाओं की पूर्ति तो हो जाती है, किंतु जिज्ञासायें नये स्वरूप में जन्म लेकर मन को और विस्मित कर देती हैं,ऐसी भावनाओं को शब्दों में कैसे अभिव्यक्त किया जाये ? जब अंतर्मन में प्रश्न उठते हैं. हम यहां क्यों आये हैं?कौन सी अदृश्य शक्ति हमें यहां खींच लायी है? हम नहीं आते तो क्या उस सर्वशक्तिमान की अनूस्यूत सत्ता को महसूस करने से हम वंचित न रह जाते? क्यों विराजती है यह सर्वोच्चमान शक्ति मानवीय पहुंच से इतनी दूर? शायद धार्मिक यात्राओं के दौरान मानव की इस चित्तवृत्ति हेतु कि हम कहां जा रहे है...









