सामरिक इतिहास के लिए विख्यात मातृवंशीय नंबूदरी ब्रह्मणों की विवाह पद्धति

मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. so आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से ‘मंजू दिल से…’ नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से… की प्रथम किस्त…


मंजू दिल से… भाग-1

  • मंजू काला

यूँ..तो विश्व के अनेक देश मातृसत्तात्मक प्रणाली का पालन करते हैं….किंतु प्रायः यह देश के कुछ समुदाय तक ही सीमित रहता है… अधिकांश राष्ट्र पितृसत्तात्मक है. उदाहरण स्वरूप पश्चिमी सुमात्रा, because दक्षिण पूर्वी चीन, ताइवान, थाईलैंड, श्रीलंका, नेपाल, मूल अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, घाना, दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया आदि!  हमारे देश में मातृसत्तात्मक प्रणाली पालन करने वाले मेघालय के खासी…. कर्नाटक के बंट और केरल के नायर समुदाय सम्मिलित हैं. विश्व के अधिकांश समाज पितृ सतात्मक होते हैं…, ऐसे में मातृसत्तात्मक समाज के बारे में सीखने और समझने की जिज्ञास बनी रहती है..!

घाना

ऐतिहासिक दस्तावेज़ों कहते हैं… की.. because नायर, नाग राज्य के क्षत्रिय थे. परशुराम के क्रोध से घबराकर ये क्षत्रिय समुदाय दक्षिण की ओर बढ़ गये  थे !  यह तथ्य भी हो सकता है क्योंकि कर्नाटक के बंट ..समुदाय और नायर समुदाय में अनेक समानताएं हैं …उनमें सबसे मुख्य मातृसत्तात्मक प्रणाली है.

गृहिणी

संभवतः यह रीति इसलिए प्रचलित हुई क्योंकि पुरुष वर्ग सैन्य व्यवसाय के कारण घर-गृहस्थी से दीर्घ समय तक दूर रहते थे. ऐसे समय में गृहिणी को संपत्ति का अधिकार और ज्ञान दोनों because आवश्यक हुए होंगे. सबसे वृद्ध पुरुष अर्थात प्रथम पुत्र या भाई वैधानिक प्रमुख माना जाता है. मलयालम में इस पारिवारिक प्रमुख को “कारनवर” कहा जाता है. संपत्ति माँ के द्वारा, पुत्रियों को विरासत में मिलती थी.

मत

एक मत यह भी मानता है because की ये नेपाल के नेवर सदस्य केरल में आकर नायर समुदाय के रूप में बस गए. वास्तुकला को देखकर यह समानता  सिद्ध भी होती है! पशुपति और भगवती पूजन दोनों संस्कृतियों को एक सूत्र में जोड़ती है. एक ब्रिटिश राज्य के पूर्व केरल छोटे सामंती राज्यों में बँटा हुआ था, नायर ऐसे क्षेत्रों के “स्वामी” अथवा “नायक” या “नायर” के नाम से विख्यात थे. वे शिक्षा, साहित्य और कला के पुजारी थे.

मत

पारंपरिक व्यवसाय में योद्धा होने के कारण उनका युद्ध कला “कल्लरिपयअट्टू” में निपुण होना स्वाभाविक था. because पुश्तैनी घरों में सर्प-पूजन के लिए पूजा-स्थल निश्चित रूप से बनाये जाते थे..जिन्हें मलयालम में “सर्प-कावू” कहते हैं. आज भी यह परंपरा केरल के मंदिरों में देखी जाती है  और ऐसा मैंने केरल भ्रमण के दौरान स्वयं भी देखा है! सर्प की पूजा  केरल के मंदिरों में प्रायः की जाती है! मलयालम भाषा तमिल और संस्कृत के मिश्रण से बनी है  इसलिए भाषा में संस्कृत प्रचुर मात्रा में सुनाई देती है. बंट समुदाय की तुलु..भाषा मलयालम भाषा से मिलती-जुलती हैं. अन्य उपनाम जो इस समुदाय के अंतर्गत आते हैं, वह हैं मेनन, पणिक्कर, कुरूप, पिल्लै.. नम्बियार.. आदि!

मत

आइये जानते हैं..आखिर मातृवंशीय किनको कहा जाता है!

इसका अर्थ है परिवार या “तरवाड” so माँ के नाम से पहचाना जाना. परिवार की…इकाई में भाई, बहनों के बच्चे और उनकी बेटियों के बच्चे सम्मिलित होते हैं. नानी अथवा सबसे वृद्ध स्त्री को परिवार में सम्मान और संपत्ति दोनों प्राप्त थे. संभवतः यह रीति इसलिए प्रचलित हुई क्योंकि पुरुष वर्ग सैन्य व्यवसाय के कारण घर-गृहस्थी से दीर्घ समय तक दूर रहते थे. ऐसे समय में गृहिणी को संपत्ति का अधिकार और ज्ञान दोनों आवश्यक हुए होंगे. सबसे वृद्ध पुरुष अर्थात प्रथम पुत्र या भाई वैधानिक प्रमुख माना जाता है. मलयालम में इस पारिवारिक प्रमुख को “कारनवर” कहा जाता है. संपत्ति माँ के द्वारा, पुत्रियों को विरासत में मिलती थी.

मत

प्राचीन समय में विवाह के पश्चात वर, but वधू के घर आकर रहने लगता. स्त्री का स्तर उच्च था किन्तु पुरुष को भी आदर का स्थान प्राप्त था. “कारनवर” परिवार के सभी निर्णय लेता और नियम निर्धारित करता. संयुक्त संपत्ति, विवाह संबंध इत्यादि उनके देख-रेख में संपन्न होता. मातृसत्तात्मक पद्धति 1957 में कानूनी तौर पर रद्द कर दी गई जिससे पिता परिवार प्रधान हो गया और सभी संतानों को समान अधिकार प्राप्त हुए.

मत

नायर विवाह …भारत के अन्य विवाह के विपरीत so बड़े सरल और संक्षिप्त होते हैं. विवाह की पहली रस्म जिसे “लड़की देखना” अथवा “पेनु-कानल” कहते हैं वह अन्य भारतीय समाजों के समान ही होता है. सगाई को मलयालम में, “निश्चयम” कहा जाता है जिसमें दोनों परिवार विवाह-तिथि, स्थल और मुहूर्त का संयुक्त-निर्णय लेते है. विवाह का मुहूर्त, शुभ समय देखकर दिन के समय निर्धारित किया जाता है, दोपहर तक विवाह सम्पन्न हो जाता है. दोपहर, संध्या या रात में विवाह विरले ही होता है.

मत

अन्य समुदायों की तरह,….नायर विवाह मंडप में शगुन की कुछ आवश्यक सामग्री तय होती है. पहला “निरपरा” कहलाता है. “परा” का अर्थ है लकड़ी से निर्मित चावल मापने वाला पात्र. so “निरपरा” का अर्थ है चावल से भरा हुआ पात्र, जो भावी समृद्धि की कामना और प्रतीक दोनों दर्शाती है.! चावल के मध्य नारियल के फूलों का गुच्छा लगाया जाता है. केले के तने से सुसज्जित मंडप की दूसरी अनिवार्य वस्तु है “निला-विलक्कु”. “निला” का अर्थ है धरा या भूमि, विलक्कु अर्थात दीप. अनेक अवसरों पर केरल में तांबे के भव्य दीप प्रज्वलित किये जाते हैं. because अनेक समारोह में इनका महत्त्व होता है, जैसे स्वागत, उत्सव, नित्य संध्या-पूजन, विशेष पूजा, विवाह आदि. “विलक्कु” कई प्रकार के होते हैं और इनका उपयोग अमुक उपलक्ष्यों पर किया जाता है.

मत

विवाह में दो प्रकार के दीप प्रयोग किए जाते हैं. दूसरा “चंगलवट्ट-विलक्कु” जो सांकल-युक्त होता है. इस दीप से वधू की ज्येष्ठ मामी …वर का स्वागत करती है. मातृसत्तात्मक प्रणाली के कारण मामा-मामी की विवाह समारोह में विशेष भूमिका होती है… (उत्तराखण्ड की विवाह परंपरा में भी वर के मामा को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है!) वर because एवं उनके परिवार का सबसे प्रथम स्वागत, वधू की छोटी बहनें करती हैं. इस रस्म को “ताल-पोली” कहते हैं. खुशहाली और समृद्धि की मंगल कामना में थाल सजाया जाता है. थाल को मलयालम में “तालम” कहा जाता है…और इसमें पुष्प, विलक्कु, चावल, नारियल, पान, सुपारी, धान का गुच्छा इत्यादि सजाकर स्वागत जुलूस आयोजित किया जाता है. मंदिर के जुलूस में भी युवतियाँ और कन्याएँ “ताल-पोली”, में सम्मिलित होती हैं. वधु की माँ “अष्ट-मांगलयम” से दूल्हे का स्नेहपूर्ण अभिनंदन करती है.

मत

एक थाल में आठ शगुन-रूपी वस्तुओं को सजाया जाता है जो मंगल कामना से जुड़े हैं. इसके अंतर्गत हैं, “कनमशी” अर्थात काजल, वाल-कन्नाड़ी विशेष आईना जो धातु से बना होता है, but “ग्रंथम”, अर्थात पूजा की पुस्तक, “वस्त्रम” अर्थात नवीन वस्त्र, “किंडी” अर्थात लंबी थूँथनी युक्त धातु का पात्र, “चंगलवट्टविलक्कु”, “परा”, “कुनगुमा-चेप्पु” अर्थात सिंदूर-दान और “दस-पुष्प”. वधू का भाई, वर के चरण धोने के बाद, उन्हें सम्मानपूर्वक मंडप में बाई ओर बिठा देता है. यह प्रथा उस समय से चली आ रही है जब वर लंबी यात्रा के बाद वधू के घर पहुंचता था.

मत

इस उष्णदेशीय प्रदेश की वेश-भूषा अत्यंत सरल होती है. आमतौर पर सभी व्यक्ति सफेद, सूती वस्त्र धारण करते हैं. वर का परिधान सफेद रंग का रेशमी कुर्ता और सँकरे सुनहरे-पट्टे because युक्त सफेद धोती होती है, जिसे मलयालम में “कसव-मुंडू” कहते हैं. माथे पर चंदन का टीका और गले में सोने की ज़ंजीर पहनते ही दूल्हा मंडप में विराजने के लिए तैयार हो जाता है. इस शुभ घड़ी में ….”नाद-स्वरम” वातावरण में गूंजने लगता है. उत्तर भारत में शहनाई की तरह ही दक्षिण भारत का यह वाद्य यंत्र विवाह में रस्मी तौर पर बजाई जाती है…! (सिने युगल अभिषेक बच्चन व ऐश्वर्या के विवाह के समय”  नादस्वरम “बजाया गया था.. और उस नाद स्वरम ने खूब सूर्खियां भी बटोरी थी! )

मत

मलयाली स्त्रियों को so प्रायः स्वर्ण आभूषण बहुत प्रिय होते हैं. विवाह के समय स्वर्ण आभूषणों से सजी-धजी दुल्हन को मंडप में उसकी बहनें और अन्य महिला रिश्तेदार वधू के दाएं ओर लाकर बिठा देते हैं. नायर महिलाओं में किसी प्रकार का पर्दा या सिर ढंकने का रिवाज नहीं है.

मत

विवाह से एक दिन पूर्व…वधू की मामी उसके हाथों पर मेहंदी लगाती है. उसी संध्या को वर और वधू दोनों अपने-अपने परिवार के ज्येष्ठ सदस्यों के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लेते हैं. because इस संस्कार को “दक्षिणा-कोडुकल” कहा जाता है. वधू का श्रृंगार भी सरल होता है, केश-सज्जा चमेली के गजरे से की जाती है. पारंपरिक पोशाक में वर की भांति ही वधू भीज़री युक्त हथकरघा साड़ी पहनती थी. इस साड़ी में असम के because “मेखला-चादर” के अनुरूप दो भाग होते हैं. वह लंबा भाग जो कमर के चारों ओर लपेटा जाता है उसे “मुंडू” कहते हैं. पल्लू के रूप में बाएं कंधे पर पहना जाने वाले वस्त्र को “वेष्टियि” “नेरयीद” कहते हैं. वधू अपनी इच्छा से किसी भी रंग की रेशमी साड़ी भी पहन सकती है.

मत

मलयाली स्त्रियों को प्रायः स्वर्ण because आभूषण बहुत प्रिय होते हैं. विवाह के समय स्वर्ण आभूषणों से सजी-धजी दुल्हन को मंडप में उसकी बहनें और अन्य महिला रिश्तेदार वधू के दाएं ओर लाकर बिठा देते हैं. नायर महिलाओं में किसी प्रकार का पर्दा या सिर ढंकने का रिवाज नहीं है.

मत

“ताली-केट्टू” मुहूर्त देखकर निभाई जाती है, “ताली” अर्थात मंगलसूत्र और “केट्टू” अर्थात बांधना. नायर समुदाय में वर का परिवार सोने की “ताली” का प्रबंध करता है. सोने की because ज़ंजीर में एक पान के पत्ते के आकार का लटकन होता है जिसे “विवाह-चिह्न” माना जाता है. नायर स्त्रियां सिंदूर अथवा बिंदी लगाती हैं किन्तु “ताली” ही सुहाग का वास्तविक प्रतीक है. निर्धन परिवार में भी इस ताली के बिना विवाह स्वीकार्य नहीं होता. ताली बांधने की क्रिया में वर के बहन की अहम भूमिका होती है. वर जब वधू के गले में सामने से ताली पहनाता है, तब उसकी बहन पीछे से उसे बांधती है. “मोदीरम् माट्टल” अर्थात अंगूठियां बदलना भी एक प्रथा होती है जो संभवतः नई प्रथा है और अब रस्मों में सम्मिलित हो गई है.

मत

वर और वधू पुष्प माला या वर-माला का आदान-प्रदान भी करते हैं. इसके बाद दुल्हन का मामा अथवा पिता उसका दायाँ हाथ दूल्हे के हाथ में देता है और वे एक-दूसरे का हाथ because पकड़कर मंडप के तीन फेरे लेते हैं. विवाह संपन्न होने के लिए नवविवाहित जोड़ा “निला-विलक्कु” की इस प्रकार तीन बार प्रदक्षिणा करते हैं, प्रज्वलित “विलक्कु” अग्नि देव का द्योतक है. नायर विवाह में हवन अथवा यज्ञ नहीं होता, न ही पुरोहित की आवश्यकता होती है. विभिन्न समारोह में दीप की भिन्न-भिन्न बाती-संख्या निर्धारित होती है, विवाह के लिए एक बाती का प्रयोग होता है.

मत

मातृसत्तात्मक धरोहर because और जीवनशैली अब कानूनी स्तर पर अवैध हो चुकी है किंतु महिला प्रधान समुदाय में अभी भी त्योहारों पर कुछ संस्कार पालन होते हैं. उदाहरणतः विशु (नव-वर्ष) और ओणम (राज्य का सर्व-धर्मसमभाव पर्व जो उपज पर्व भी है) जैसे अवसरों पर दामाद अपनी सास को धन-राशि या कोई ना कोई भेंट अवश्य देता है. 

मत

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रथा because “पुडुवा-कोडुक्कल” कहलाती है, जो विवाह में अत्यंत आवश्यक होती है. विवाह मंडप में दूल्हे की ओर से दो साड़ियों की भेंट दुल्हन को दी जाती है. यह प्रथा वर द्वारा आजीवन वधू की ज़िम्मेदारियां निभाने का प्रण है. इस प्रथा के बाद दोनों परिवार के सदस्य नव-दंपति को दूध और केले का सेवन कराते हैं. because इस रस्म में एक दूसरे के जीवन में मिठास घोलने की शुभकामना और बड़ों का आशीर्वाद निहित है. तत्पश्चात सभी बारातियों को शाकाहारी दावत दी जाती है, जिसे मलयालम में सद्या कहते हैं. नायर शाकाहारी नहीं होते, किन्तु पारंपरिक शैली में बनाई जाने वाले अनुष्ठान-भोज, सदैव शाकाहारी ही होते हैं. प्रत्येक व्यंजन में नारियल का प्रयोग होता है, कुछ में नारियल का तेल भी इस्तेमाल होता है.

मत

दावत केले के पत्तों में क्रमानुसार परोसी जाती है. भोज में अनेक प्रकार के अचार, पापड़ और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जाते हैं, जैसे सांबार, तोरन, उप्पेरी, अवियल, कूटूकरी, आदि. मिठाई के because तौर पर अनेक तरह के खीर यानी, पायसम सम्मिलित होते हैं, जिस में प्रमुख है – चक्का-प्रथमन. अन्य दक्षिण भारतीय वैवाहिक रस्म जैसे पिंडलियों में बिछुआ पहनाना या चक्की पर पैर धरना आदि नायर विवाह में देखे नहीं जाते क्योंकि यह मातृसत्ता के संकल्पना के विपरीत है. परिवार में पुत्री कभी पराई नहीं मानी जाती. कन्यादान केवल नाममात्र ही होता है, दोनों परिवार आपस में because बराबरी का महत्व रखते हैं. विवाह के बाद वधु के घर में गृह-प्रवेशम् की औपचारिक क्रिया मनाई जाती है. सास नव-दंपति का स्वागत दीप या विलक्कु से करती है, उसी दीप को बहू को सौंप कर उसे दायें पैर से गृह प्रवेश कराती है.

मत

मातृसत्तात्मक धरोहर और जीवनशैली अब because कानूनी स्तर पर अवैध हो चुकी है किंतु महिला प्रधान समुदाय में अभी भी त्योहारों परbecause कुछ संस्कार पालन होते हैं. उदाहरणतः विशु (नव-वर्ष) और ओणम (राज्य का सर्व-धर्मसमभाव पर्व जो उपज पर्व भी है) जैसे अवसरों पर दामाद अपनी सास को धन-राशि या कोई ना कोई भेंट अवश्य देता है. परिवार की मुखिया को संस्कार-अनुसार त्योहार मनाने के लिए सभी सदस्य अपना सहयोग देते हैं. वर और वधू दोनों परिवारों का मेल-मिलाप विवाह के बाद भी सक्रिय रहता है. त्यौहारों और उत्सवों में परस्पर सम्मिलित होना सामान्य प्रथा है…!

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