बेटियां जब ठान लें तो झुकता है आसमान: ‘मशरूम गर्ल’ दीपिका कैंतुरा की प्रेरक कहानी

Deepika Kaintura

 

नवदुर्गा विशेष | श्रृंखला  – 3

Ashita Dobhal Navdurga

पहाड़ की मिट्टी से जुड़कर स्वरोजगार की नई इबारत लिख रही हैं उत्तरकाशी की दीपिका कैंतुरा। गांव के खाली और अंधेरे कमरों से शुरू हुआ मशरूम उत्पादन आज एक बड़े उद्यम का रूप ले चुका है। अपनी मेहनत, संकल्प और परिवार के सहयोग से दीपिका ने साबित किया है कि पहाड़ की बेटियां केवल सपने देखती ही नहीं, उन्हें साकार करना भी जानती हैं।

पढ़ाई में सामान्य, कक्षा में अक्सर डरी-सहमी रहने वाली, लेकिन चेहरे पर हमेशा मुस्कान लिए एक लड़की ने शायद ही कभी सोचा होगा कि एक दिन उसकी पहचान पूरे क्षेत्र में ‘मशरूम गर्ल’ के रूप में होगी। विद्यालयी जीवन में खेलकूद और सांस्कृतिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली दीपिका कैंतुरा बचपन से ही अपनी अलग पहचान बनाने का हुनर रखती थीं। पढ़ाई में भले ही वह असाधारण नहीं थीं, लेकिन उनकी सक्रियता, सहज स्वभाव और कुछ नया करने की ललक ने उन्हें हमेशा शिक्षकों की नजरों में विशेष बनाए रखा।

उत्तरकाशी जिले के चिन्यालीसौड़ विकासखंड के श्रीकोट गांव निवासी जयेन्द्र सिंह कैंतुरा और कुशमा देवी के घर जन्मी दीपिका परिवार की छोटी संतान हैं। उनके बड़े भाई दीपेंद्र कैंतुरा हैं। पिता भारतीय सेना में कार्यरत थे, जबकि मां ने गृहस्थी की जिम्मेदारियां संभालते हुए दोनों बच्चों का पालन-पोषण किया।

दीपिका की प्रारंभिक शिक्षा अपने पैतृक गांव श्रीकोट में ही हुई। गांव के प्राकृतिक परिवेश, रीति-रिवाजों, खेत-खलिहानों और ग्रामीण जीवन से उनका बचपन से गहरा लगाव रहा। मां के साथ खेती-किसानी में हाथ बंटाना उनके लिए केवल घरेलू काम नहीं, बल्कि आनंद और सीख का माध्यम था। मिट्टी में खेलना, बीज बोना और फिर उन्हीं खेतों में फसलों को लहलहाते देखना उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ता रहा। शायद यही जुड़ाव आगे चलकर उनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत बना।

अंधेरे कमरों से शुरू हुई उजाले की यात्रा

पहाड़ के गांवों में खाली पड़े कमरे और बंद मकान अक्सर पलायन की पीड़ा बयां करते हैं, लेकिन दीपिका ने इन्हीं अंधेरे कमरों में संभावनाओं का उजाला तलाश लिया। गांव के खाली कमरों से शुरू हुआ मशरूम उत्पादन आज एक बड़े मशरूम प्लांट का रूप ले चुका है। यह सफलता केवल दीपिका की मेहनत का परिणाम नहीं, बल्कि उनके बड़े भाई दीपेंद्र कैंतुरा और माता-पिता के सामूहिक संघर्ष, समर्पण और विश्वास की कहानी भी है।

पहाड़ में उत्पादन करना जितनी बड़ी चुनौती नहीं है, उससे कहीं अधिक कठिन है उत्पाद को बाजार तक पहुंचाना। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां, परिवहन की सीमित सुविधाएं, सड़कों की बदहाल स्थिति और विपणन की कमजोर व्यवस्था पहाड़ के छोटे उद्यमियों के सामने बड़ी बाधाएं खड़ी करती हैं। लेकिन दीपिका ने इन चुनौतियों के सामने हार मानने के बजाय अपना रास्ता स्वयं तैयार किया।

उन्होंने मशरूम उत्पादन के साथ-साथ उसकी मार्केटिंग की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर उठाई। आसपास के छोटे बाजारों और गांवों तक स्कूटी से ताजा मशरूम पहुंचाने का निर्णय लिया, ताकि लोगों को बाजार में लंबे समय से रखे मशरूम के बजाय सीधे उत्पादन केंद्र से ताजा मशरूम उपलब्ध हो सके।

शुरुआत में उनकी पहुंच गंगोत्री-यमुनोत्री मार्ग, जोगथ मार्ग और बनचौरा मार्ग के आसपास के बाजारों तक सीमित थी। लेकिन धीरे-धीरे उनका सफर बड़कोट, नौगांव, पुरोला, मोरी और त्यूणी से होता हुआ हिमाचल प्रदेश के रोहड़ू तक पहुंच गया। इस दौरान दीपिका ने वस्तु-विनिमय की परंपरागत व्यवस्था को भी अपने व्यवसाय का हिस्सा बनाया। इसका उद्देश्य चिन्यालीसौड़ स्थित ‘दीप मशरूम फार्मिंग’ के आउटलेट के लिए विभिन्न स्थानीय उत्पादों का संग्रहण करना था।

कहते हैं, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। दीपिका ने इस कहावत को अपने परिश्रम से सार्थक कर दिखाया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने न केवल उत्पादन बढ़ाया, बल्कि बाजार तक पहुंचने के नए रास्ते भी खोज निकाले।

भाई का साथ बना हौसलों की ताकत

किसी भी सफलता के पीछे केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं होता। कई बार परिवार का विश्वास और सहयोग ही सपनों को उड़ान देने वाले पंख बन जाता है। दीपिका की सफलता में उनके बड़े भाई दीपेंद्र कैन्तुरा की भूमिका विशेष रही है। मशरूम उत्पादन से लेकर विपणन, सेमिनार, कार्यशालाओं और विभिन्न आयोजनों तक भाई-बहन की यह जोड़ी लगातार साथ दिखाई देती है।

माता-पिता का आशीर्वाद और भाई का सहयोग दीपिका को हर चुनौती से लड़ने की शक्ति देता रहा है। कभी दोनों व्यवसाय की नई संभावनाएं तलाशते दिखाई देते हैं, तो कभी प्रकृति के सुंदर नजारों के बीच जीवन के छोटे-छोटे पलों का आनंद लेते नजर आते हैं। यह रिश्ता केवल भाई-बहन के स्नेह का नहीं, बल्कि साझा सपनों और सामूहिक उद्यमिता का भी उदाहरण है।

राज्यपाल से सम्मान, प्रधानमंत्री तक पहुंची पहचान

अपने परिश्रम और उद्यमशीलता के बल पर दीपिका ने स्थानीय स्तर से लेकर राज्य स्तरीय मंचों तक अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उन्हें राज्यपाल के हाथों सम्मानित होने का अवसर भी मिला। उनके उत्पादों की मार्केटिंग को सुगम बनाने के लिए राज्यपाल के विशेष कोष से स्कूटी भी प्रदान की गई।

वर्ष 2025 में जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हर्षिल के दौरे पर पहुंचे, तब दीपिका जैसी युवा उद्यमी के स्टॉल ने भी उनका ध्यान आकर्षित किया। यह किसी भी युवा उद्यमी के लिए गर्व का क्षण हो सकता है, जब गांव की मिट्टी से शुरू किया गया छोटा-सा प्रयास देश के शीर्ष नेतृत्व तक अपनी पहचान बना ले।

दीपिका की यात्रा उस बदलती सोच का भी उदाहरण है, जिसमें युवा केवल नौकरी की तलाश तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि स्वयं उद्यम स्थापित कर दूसरों के लिए भी रोजगार और आजीविका के अवसर पैदा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। जिला स्तर पर विभिन्न विभागों और संस्थाओं द्वारा भी दीपिका को सम्मानित किया जा चुका है। हालांकि, दीपिका के लिए ये सम्मान केवल उपलब्धियां नहीं, बल्कि नई जिम्मेदारियों का एहसास भी हैं।

आज ‘दीप मशरूम फार्मिंग’ केवल एक उत्पादन केंद्र नहीं, बल्कि सीखने और प्रेरणा प्राप्त करने का स्थान भी बन चुका है। सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के प्रतिनिधि, विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के विद्यार्थी यहां शैक्षणिक भ्रमण और एक्सपोजर विजिट के लिए पहुंचते हैं। दीपिका और उनके सहयोगी मशरूम उत्पादन की तकनीक, उसके प्रबंधन और विपणन से जुड़ी जानकारी साझा करते हैं। इस प्रयास के माध्यम से हजारों लोगों तक मशरूम उत्पादन का ज्ञान पहुंचाने में भी उनका योगदान रहा है।

पर्यावरण संरक्षण से भी गहरा जुड़ाव

दीपिका की पहचान केवल एक सफल मशरूम उत्पादक तक सीमित नहीं है। वह सामाजिक गतिविधियों, पर्यावरण संरक्षण और जनजागरूकता से जुड़े अभियानों में भी सक्रिय भागीदारी निभाती रही हैं। वर्ष 2022 में वह HESCO (Himalayan Environmental Studies and Conservation Organisation) के एक विशेष साइकिलिंग अभियान का हिस्सा बनीं। प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित इस अभियान में उनकी भागीदारी यह दर्शाती है कि उनके लिए पहाड़ केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। पहाड़ की मिट्टी से प्रेम, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और समाज के लिए कुछ करने की भावना उनके व्यक्तित्व को एक अलग पहचान देती है।

नौकरी के साथ उद्यमिता की जिम्मेदारी

वर्तमान में दीपिका आयुष विभाग द्वारा संचालित आयुर्वेदिक अस्पताल में लैब टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत हैं। नौकरी की जिम्मेदारियों को निभाने के बाद वह अपना शेष समय मशरूम उत्पादन इकाई को देती हैं। यह उनकी मेहनत, अनुशासन और अपने उद्यम के प्रति समर्पण का प्रमाण है। आमतौर पर पहाड़ के युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर होते हैं। बेहतर शिक्षा, नौकरी और सुविधाओं की तलाश में अनेक युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। लेकिन दीपिका ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने यह साबित किया कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, परिवार का सहयोग मिले और स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, तो गांव में रहकर भी आजीविका के सम्मानजनक अवसर तैयार किए जा सकते हैं।

पहाड़ की उम्मीदों को पंख देती बेटियां

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन लंबे समय से एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। खाली होते गांव, बंद पड़े मकान और बंजर होते खेत इस समस्या की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे दीपिका जैसी बेटियां अपने परिश्रम से बदलने का प्रयास कर रही हैं।

पहाड़ भले ही बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना के लिए अनुकूल न हों, लेकिन यहां कृषि आधारित उद्यमों, मशरूम उत्पादन, बागवानी, स्थानीय उत्पादों के प्रसंस्करण और छोटे व्यवसायों की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यदि इन संभावनाओं को उचित प्रशिक्षण, बाजार, परिवहन और संस्थागत सहयोग मिले, तो छोटे-छोटे उद्यम भी पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं।

जिन वीरान घरों को कभी पलायन की निशानी माना जाता था, उन्हीं के खाली कमरों में आजीविका के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं। बंद पड़े मकानों से कारोबार शुरू हो सकता है और बंजर होते खेत फिर से हरियाली से भर सकते हैं। दीपिका की कहानी इसी संभावना का जीवंत उदाहरण है।

उनकी यात्रा बताती है कि आजीविका के लिए केवल सरकारी या निजी नौकरी ही एकमात्र विकल्प नहीं है। अपनी मिट्टी, स्थानीय संसाधनों और परंपरागत ज्ञान के सहारे भी आर्थिक आत्मनिर्भरता का रास्ता तैयार किया जा सकता है। आज दीपिका जैसी बेटियां केवल अपने परिवार का भविष्य नहीं संवार रहीं, बल्कि पहाड़ के उन गांवों में भी उम्मीदों के दीप जला रही हैं, जहां कभी पलायन के कारण सन्नाटा पसर गया था।

उनकी मेहनत से यह विश्वास मजबूत होता है कि आने वाला समय पहाड़ के छोटे उद्यमों, स्थानीय उत्पादों और आत्मनिर्भर युवाओं का भी हो सकता है।

दीपिका कैन्तुरा की कहानी केवल मशरूम उत्पादन की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस पहाड़ी बेटी के साहस, संकल्प और स्वाभिमान की गाथा है, जिसने परिस्थितियों से समझौता करने के बजाय उन्हें बदलने का रास्ता चुना। क्योंकि जब बेटियां ठान लेती हैं, तो मुश्किलों के पहाड़ भी उनके हौसलों के आगे छोटे पड़ जाते हैं।

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