खेत बचाओ अभियान बना जनआंदोलन, अल्मोड़ा में किसानों ने लिया मिट्टी और कृषि संरक्षण का संकल्प

Pushkar Singh Dhami

 

6 करोड़ रुपए से अल्मोड़ा में कराई जाएगी तारबाड़, खेती होगी सुरक्षित : मुख्यमंत्री

  • हिमांतर ब्यूरो | अल्मोड़ा

अल्मोड़ा की हवालबाग घाटी में शनिवार को केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं हुआ, बल्कि पहाड़ की कृषि, मिट्टी और भविष्य को बचाने का सामूहिक संकल्प गूंजा। खेतों की मेड़ों से लेकर कार्यक्रम स्थल तक किसानों, महिला समूहों और जनप्रतिनिधियों की बड़ी भागीदारी ने यह संकेत दिया कि उत्तराखंड में खेती और पर्यावरण संरक्षण को लेकर नई चेतना आकार ले रही है।

राज्य स्तरीय ‘खेत बचाओ अभियान’ के मंच से किसानों ने मिट्टी, जल और कृषि भूमि के संरक्षण का संकल्प लिया। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों और घटती कृषि योग्य भूमि के बीच यह अभियान अब केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी से जुड़ा एक व्यापक जनआंदोलन बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

बदलती जलवायु और खेती की नई चुनौतियां

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम का बदलता मिजाज खेती को सीधे प्रभावित कर रहा है। अनियमित वर्षा, लंबे सूखे, ओलावृष्टि और तापमान में बदलाव ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ऐसे समय में मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखना और पारंपरिक कृषि पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता बन गया है।

कार्यक्रम में विशेष रूप से मांडुआ, झंगोरा, चौलाई और अन्य पारंपरिक मोटे अनाजों के संरक्षण और उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया। ये फसलें न केवल पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में अपेक्षाकृत अधिक टिकाऊ भी मानी जाती हैं।

‘मिट्टी केवल जमीन नहीं, हमारी मां है’

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि देश की शक्ति और आत्मविश्वास के आधार हैं। उन्होंने मिट्टी को भारतीय संस्कृति में मां के समान पूजनीय बताते हुए कहा कि उसकी उर्वरा शक्ति को बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।

मुख्यमंत्री ने किसानों से नियमित मिट्टी परीक्षण कराने, जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने और वैज्ञानिक सलाह के अनुरूप खेती अपनाने का आह्वान किया। उनका कहना था कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ कृषि व्यवस्था छोड़ना आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। उनके अनुसार इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच संतुलन ही सतत विकास का आधार है।

किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में पहल

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने बताया कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने बजट में 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। बागवानी, पॉलीहाउस, फलोत्पादन, कोल्ड स्टोरेज, मेगा फूड पार्क और सुगंधित फसलों के क्षेत्र में अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं।

उत्तराखंड में लगभग 23 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सुगंधित फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही मोटे अनाजों को भी नई पहचान दिलाने के प्रयास जारी हैं। किसानों को मिलने वाली सहायता राशि सीधे डीबीटी के माध्यम से उनके खातों में पहुंचाई जा रही है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है और बिचौलियों की भूमिका कम हुई है।

खेतों की सुरक्षा के लिए छह करोड़ की तारबाड़ योजना

पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली जानवरों से फसलों को होने वाला नुकसान किसानों की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। इस चुनौती को देखते हुए मुख्यमंत्री ने अल्मोड़ा जनपद में लगभग छह करोड़ रुपये की लागत से तारबाड़ कार्य कराए जाने की घोषणा की।

किसानों का मानना है कि यदि फसलें सुरक्षित रहें तो खेती के प्रति युवाओं का भरोसा भी बढ़ेगा और पलायन जैसी समस्याओं पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा।

आत्मनिर्भर उत्तराखंड की आधारशिला

कृषि मंत्री गणेश जोशी ने किसानों से प्राकृतिक और जैविक खेती को अपनाने का आग्रह करते हुए कहा कि खेतों को बचाकर ही आत्मनिर्भर उत्तराखंड का निर्माण संभव है। उन्होंने बताया कि ड्रैगन फ्रूट, कीवी और मिलेट जैसी फसलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार प्रभावी नीतियों पर कार्य कर रही है।

उनके अनुसार खेती का क्षेत्रफल घटने के बावजूद कृषि उत्पादों में वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियां किसानों के लिए नए अवसर खोल रही हैं।

CM Dhami In Almora

एक अभियान से आगे की कहानी

हवालबाग में आयोजित यह कार्यक्रम केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहा। यहां उपस्थित किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और युवाओं ने कृषि संरक्षण, मिट्टी संवर्धन और जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देने का सामूहिक संकल्प लिया। उत्कृष्ट किसानों को सम्मानित कर उनके अनुभवों को भी साझा किया गया।

दरअसल, उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पर्यावरण संरक्षण का माध्यम भी है। ऐसे में ‘खेत बचाओ अभियान’ का संदेश केवल खेतों तक सीमित नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों के लिए जल, जंगल, जमीन और जीवन को बचाने का संदेश भी है।

हवालबाग से उठी यह आवाज बताती है कि खेती को बचाना केवल किसानों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मिट्टी, पानी और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा ही भविष्य की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि की सबसे बड़ी गारंटी बन सकती है। यदि जनभागीदारी इसी तरह बढ़ती रही तो ‘खेत बचाओ अभियान’ वास्तव में उत्तराखंड के कृषि पुनर्जागरण का आधार बन सकता है।

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