
- नीरज उत्तराखंडी
लखनऊ. हिन्दी साहित्य की गद्य विधा में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रख्यात साहित्यकार महावीर रवांल्टा को वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित ‘बलदेव मल्ल सम्मान’ प्रदान किया गया. यह सम्मान बी.एम.एन. सेवा संस्थान, लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के निराला सभागार, हजरतगंज, लखनऊ में आयोजित भव्य समारोह में प्रदान किया गया.
समारोह में विधानसभा सदस्य पवन सिंह चौहान, भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कामेश्वर सिंह, आईएएसए महामहिम राज्यपाल के विशेष सचिव श्रीप्रकाश गुप्त तथा प्रभुनाथ राय सहित देशभर से पधारे साहित्य, कला और संस्कृति के साधकों की गरिमामयी उपस्थिति रही.
साहित्य साधना की चार दशक लंबी यात्रा
10 मई 1966 को सुदूरवर्ती सरनौल गांव में जन्मे महावीर रवांल्टा वर्तमान में महरगांव में निवास कर रहे हैं. उन्होंने अस्सी के दशक में लेखन की शुरुआत की और तब से अब तक साहित्य की विविध विधाओं में सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है.
उनकी लेखनी उपन्यास, नाटक, कहानी, कविता, बाल साहित्य, लघुकथा, लोक साहित्य तथा रवांल्टी भाषा तक विस्तृत है. अब तक उनकी 46 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. देशभर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं, वहीं आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी उनका नियमित प्रसारण हुआ है.
उनके साहित्य पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में लघु शोध प्रबंध प्रस्तुत किए जा चुके हैं और कई शोधार्थी वर्तमान में उनके साहित्य पर शोधरत हैं.

लोक साहित्य और रंगकर्म में विशेष योगदान
लोक संस्कृति और रंगमंच के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के चलते महावीर रवांल्टा ने अनेक नाटकों का लेखन, निर्देशन और अभिनय किया है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की संस्कार रंग टोली, विशेष बाल श्रमिक विद्यालय, कला दर्पण तथा मांडी विद्या निकेतन जैसे संस्थानों द्वारा उनकी कहानियों पर आधारित नाटकों का सफल मंचन किया गया है.
रवांई क्षेत्र की लोककथाओं और लोकगाथाओं पर आधारित उनकी कृतियां — ‘सफेद घोड़े का सवार’, ‘एक प्रेमकथा का अंत’ और ‘धुएं के बादल’ — विशेष रूप से चर्चित रही हैं.
भाषा संरक्षण और शोध में अग्रणी भूमिका
महावीर रवांल्टा ने भाषा-शोध एवं प्रकाशन केन्द्र, वडोदरा (गुजरात) के भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण तथा उत्तराखण्ड भाषा संस्थान के भाषा सर्वेक्षण में सक्रिय भूमिका निभाई है. पहाड़ के बहुभाषी शब्दकोश ‘झिक्कल काम्ची ओडायली’ के निर्माण में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
रवांल्टी भाषा में लेखन और उसके प्रचार-प्रसार की शुरुआत का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है.
अर्द्धशताधिक सम्मानों से अलंकृत
उन्हें पूर्व में उत्तराखण्ड साहित्य गौरव सम्मान-गोविन्द चातक पुरस्कार सहित उमेश डोभाल स्मृति सम्मान, तिलाड़ी सम्मान, जनधारा सम्मान, उत्तराखण्ड उदय सम्मान और वेद अग्रवाल स्मृति सम्मान जैसे अनेक प्रतिष्ठित अलंकरण प्राप्त हो चुके हैं. अब तक वे पचास से अधिक सम्मानों से सम्मानित हो चुके हैं.
उनकी चर्चित लघुकथा ‘तिरस्कार’ पर एक लघु फिल्म का निर्माण भी किया जा चुका है.
प्रशासनिक दायित्व के साथ साहित्य साधना
साहित्य सेवा के साथ-साथ महावीर रवांल्टा वर्तमान में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, पुरोला में मुख्य फार्मेसी अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं. प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बावजूद साहित्य, लोकसंस्कृति और भाषा संरक्षण के क्षेत्र में उनकी सक्रियता निरंतर बनी हुई है.
‘बलदेव मल्ल सम्मान-2025’ से सम्मानित होना न केवल उनके चार दशक लंबे साहित्यिक अवदान का सम्मान है, बल्कि उत्तराखण्ड की लोकभाषा और संस्कृति के संरक्षण में उनके योगदान की भी राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है.
