September 19, 2020
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साहित्यिक हलचल

लॉक डाउन से पहले मिले बड़े लेखक का बड़ा इंटरव्यू

ललित फुलारा धैर्य से पढ़ना पिछली बार हिमांतर पर आपने ‘ईमानदार समीक्षा’ पढ़ी होगी. अब वक्त है ‘बड़े लेखक’ का साक्षात्कार पढ़ने का. लेखक बहुत बड़े हैं. धैर्य से पढ़ना. लेखक बिरादरी की बात है. तीन-चार पुरस्कार झटक चुके हैं. राजनीतिज्ञों के बीच ठीक-ठाक धाक है. सोशल मीडिया पर
साहित्यिक हलचल

‘आसमान की किताब’ और ‘घुघूति-बासूति’

व्योमेश जुगरान हाल में दो ई-किताबों से सुखद सामना हुआ– ‘आसमान की किताबः बसंत में आकाश दर्शन’ और ‘घुघूति-बासूति’. संयोग से दोनों की विषयवस्तु बच्चों से संबंधित है और दोनों ही कृतियों का यह पहला भाग है. लेखक आशुतोष उपाध्याय और हेम पन्त अपनी-अपनी क्षमताओं के अनुसार स्वयंसेवी ढ़ंग से बाल विकास व
उत्तराखंड संस्मरण

पहाड़ की संवेदनाओं के कवि थे शेरदा ‘अनपढ़’

पुण्यतिथि (20 मई) पर विशेष चारु तिवारी  मेरी ईजा स्कूल के दो मंजिले की बड़ी सी खिड़की में बैठकर रेडियो सुनती हुई हम पर नजर रखती थी. हम अपने स्कूल के बड़े से मैदान और उससे लगे बगीचे में ‘लुक्की’ (छुपम-छुपाई) खेलते थे. जैसे ही ‘उत्तरायण’ कार्यक्रम आता ईजा हमें जोर से ‘धात’ लगाती. ‘उत्तरायण,’ […]
उत्तराखंड

पलायन  ‘व्यक्तिजनित’ नहीं ‘नीतिजनित’ है

भाग-एक पहले कृषि भूमि तो बचाइये! चारु तिवारी  विश्वव्यापी कोरोना संकट के चलते पूरे देश में लॉक डाउन है. अभी इसे सामान्य होने में  समय लगेगा. इसके चलते सामान्य जन जीवन प्रभावित हुआ है. देश में नागरिकों  का एक बड़ा तबका है जो अपनी रोटी रोजगार के लिए देश के महानगरों या देश से बाहर […]
संस्मरण

अब घट नहीं आटा पीसने जाते हैं

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—6 प्रकाश उप्रेती इसको हम- जानहर, जंदरु, जांदरी कहते हैं. यह एक तरह से घरेलू चक्की है. उन दिनों बिजली तो होती नहीं थी. पानी की चक्की वालों के पास जाना पड़ता था. वो पिसे हुए का ‘भाग’ (थोड़ा आटा) भी लेते थे. इसलिए कई बार घर पर ही […]
साहित्यिक हलचल

मोटा बांस भालू बांस

जे. पी. मैठाणी सड़क किनारे उस मोटे बांस की पत्तियों को तेज धूप में मैंने, नीली छतरी के नीचे मुस्कुराते, हिलते-डुलते, नाचते-गाते देखा। ये बांस बहुत उपयोगी है- वैज्ञानिक नाम इसका डेंड्राकैलामस जाइगेंटिस हुआ ये पोएसी परिवार से ताल्लुक रखता है। आम बोलचाल में इसे मोटा बांस कहते हैं, सिक्किम की तरफ
संस्मरण

किस्सा टूटी तख्ती का

‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—3 रेखा उप्रेती टूटे हुए मूँठ वाली भारी-भरकम उस तख्ती का पूरा इतिहास तो ज्ञात नहीं, पर इतना ज़रूर जानती हूँ कि पाँच भाई-बहनों को अक्षर-ज्ञान करा, जब वह मुझ तक पहुँची, तो घिस-घिसकर उसके चारों किनारे गोल हो चुके थे. पकड़ने वाली मूँठ न रहने के कारण उसके दोनों तरफ […]
उत्तराखंड

नाराज़ होने की जगह ‘पहाड़वाद’ की बात क्यों नहीं करते जनाब?

ललित फुलारा लगातार ‘पहाड़वाद’ के सवाल को उठा रहे हैं. दिल्ली/एनसीआर में बड़े ओहदों पर बैठे पहाड़ियों की अपनों के प्रति निष्क्रियता और पहाड़ी अस्मिता पर जोरदार कटाक्ष कर रहे हैं. इसे लेकर विवाद भी हो रहा है. युवा समर्थन कर रहे हैं तो कई लोगों को उनकी यह बातें चुभ भी रही है. हिमांतर
समाज/संस्कृति

पिठाड़ी—पिदें की बाकर्या अर बाकर्यों कु त्यार

लोक पर्व दिनेश रावत वर्ष का एक दिन! जब लोक आटे की बकरियाँ बनाते हैं. उन्हें चारा—पत्ती चुंगाते हैं. पूजा करते हैं. धूप—दीप दिखाते हैं. गंध—अक्षत, पत्र—पुष्ठ चढ़ाते हैं. रोली बाँधते हैं. टीका लगाते हैं. अंत में इनकी पूजा—बलि देकर आराध्य देवी—देवताओं को प्रसन्न करते हैं. त्यौहार मनाते हैं, जिसे
संस्मरण

काकड़, कोरैण, रायत और पीसी लूण

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—5 प्रकाश उप्रेती आज बात- ‘कोरैण’ की. कोरैण माने कोरने वाला. लुप्त होने के लिए ‘ढिका’ (किनारे) में बैठा यह औजार कभी भी लुढ़क सकता है. फिर हम शायद ही इसे देख पाएं. उन दिनों पहाड़ में हर घर की जरूरत थी -कोरैण. अब तो इसके कई स्थानापन आ […]