September 19, 2020
संस्मरण

गांव की रामलीला से ही आरंभ हुआ रंगकर्म का सफर

रंग यात्रा भाग—2

  • महावीर रवांल्टा

अपने दोनों गांवों में नाटक एवं रामलीला की प्रस्तुति,लेखन, अभिनय, उद्घोषणा के साथ ही पार्श्व में अनेक जिम्मेदारियों के निर्वाहन के बाद पढ़ाई के लिए उत्तरकाशी में होने के कारण मैंने वहां रंगकर्म के क्षेत्र में उतरने का मन बना लिया और पूरे आत्मविश्वास के साथ शुरुआत भी की. जिससे मैंने कुछ नाटकों में अभिनय व निर्देशन के माध्यम से उत्तरकाशी के रंग इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी.

उत्तरकाशी में मैंने मुनारबन्दी (1985, महावीर रवांल्टा) बालपर्व (1985,डा अरविंद गौड़) समानांतर रेखाएं (1987, सत्येन्द्र शरत) दो कलाकार (1987, डा भगवती चरण वर्मा) नाटकों में अभिनय के साथ ही उनका निर्देशन भी किया तथा माघ मेला 1987 में वीरेंद्र गुप्ता के निर्देशन में मंचित संजोग(सतीश डे) में मुख्य भूमिका निभाने का अवसर भी मिला. इसके बाद काला मुंह (डा. गोविन्द चातक) हेमलेट(विलियम शेक्सपियर, अनुवाद: अमृत राय) से जुड़ने के साथ ही मुझे बांसुरी बजती रही (1988,डा गोविन्द चातक) अंधेर नगरी (1988, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) बीस सौ बीस (2001, सुभाष रावत) ननकू नहीं रहा (2001, महावीर रवांल्टा) नाटकों में अभिनय के साथ ही ननकू नहीं रहा के निर्देशन का अवसर मिला जिससे रंगकर्म के क्षेत्र में मेरा अनुभव समृद्ध होता गया.

लोककथा पर आधारित जीतू बगड्वाल लिखा गया तो समसामयिक विषय पर केन्द्रित मौत का कारण तैयार हुआ. इनके साथ बिल्कुल नए प्रयोग के तौर पर कुछ लम्बा नाटक साजिश भी मंचित करने का निर्णय हुआ. लगभग 40 बाल कलाकारों के साथ डेढ़ माह की कार्यशाला के बाद भादों मेला (7 से 9 सितंबर 1987) के अवसर पर नाटक मंचित हुए. पुराने तौर-तरीकों से हटकर नए तामझाम के साथ मंचित हुए सत्यवादी हरिश्चंद्र को दर्शकों द्वारा खूब सराहना मिली.

वर्ष 1987 में वर्ष में उत्तरकाशी में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रशिक्षु सुवर्ण रावत से मुलाकात के बाद उनके महरगांव आने पर मैंने महरगांव में बाल कलाकारों को लेकर नाट्य शिविर लगाने का मन बनाया. इसमें मैंने अनेक नाटकों का मंचन करने की ठानी. पौराणिक नाटक, लोक कथाओं पर आधारित नाटकों के साथ ही समसामयिक समस्याओं पर केन्द्रित नाटकों का मंचन मुझे उचित लगा. पौराणिक नाटक के लिए कुछ वर्ष पहले से मेरे मन में घर कर चुका सत्यवादी हरिश्चंद्र मुझे सही लगा इसके लिए मुझे इधर—उधर से सामग्री जुटाकर नाटक लिखने का प्रयास करना पड़ा और मैं इसमें कुछ हद तक सफल भी रहा. लोककथा पर आधारित जीतू बगड्वाल लिखा गया तो समसामयिक विषय पर केन्द्रित मौत का कारण तैयार हुआ. इनके साथ बिल्कुल नए प्रयोग के तौर पर कुछ लम्बा नाटक साजिश भी मंचित करने का निर्णय हुआ. लगभग 40 बाल कलाकारों के साथ डेढ़ माह की कार्यशाला के बाद भादों मेला (7 से 9 सितंबर 1987) के अवसर पर नाटक मंचित हुए. पुराने तौर-तरीकों से हटकर नए तामझाम के साथ मंचित हुए सत्यवादी हरिश्चंद्र को दर्शकों द्वारा खूब सराहना मिली. प्रचार—प्रसार के लिए ब्रोशर के साथ ही अपने हाथ से लिख कर पोस्टर स्थान—स्थान पर लगवाकर लोगों को इस आयोजन के बारे में समुचित जानकारी देने का मेरा प्रयास रंग लाया था. बड़ी संख्या में दूर—पास के लोग नाटक देखने आए थे. गीत—संगीत का जिम्मा प्रेमलाल और चंद्रमोहन सेमवाल ने बखूबी निभाया था.

भादों मेला (8 से 10 सितंबर 1988) महरगांव में एक बार पुनः कला दर्पण के बैनर पर मैंने पूर्व की तरह विभिन्न प्रकार के नाटकों के मंचन का निर्णय लिया. मैंने अहिल्या उद्धार, रथ देवता, अधूरा आदमी लिखकर उन्हीं का पूर्वाभ्यास आरंभ कर दिया. वहीं लगभग 40 बाल कलाकार इसमें शामिल थे. ब्रोशर के साथ ही रंग बिरंगे पोस्टर बनाकर आसपास के सारे गांव व कस्बों तक पहुंचा दिए गए थे. उत्तरकाशी से कला दर्पण के सुरक्षा रावत, सुधा रावत, दिनेश भट्ट नौगांव से बद्री बिजल्वाण, बड़कोट से प्रेम बल्लभ पुरोहित सहित अनेक लोगों की उपस्थिति से अहिल्या उद्धार की प्रस्तुति में रूप सज्जा, वेशभूषा के कारण काफी निखार आया था. संगीत का दायित्व पं जगदीश जगूड़ी एवं चंद्रमोहन सेमवाल के जिम्मे रहा. उम्मीद से कहीं ज्यादा उपस्थिति अहिल्या उद्धार की प्रस्तुति के दौरान रही. सत्यवादी हरिश्चंद्र एवं अहिल्या उद्धार नाटकों की प्रस्तुति के दौरान मैंने एक अभिनव प्रयोग किया जिसमें ध्वनि व प्रकाश के माध्यम से पात्र एवं प्रस्तुतियों के साथ जुड़े सभी लोगों का परिचय प्रस्तुत किया गया था. इसके लिए रंग-बिरंगे पतंग कागज लेकर उन पर अलग-अलग रंगों से जरूरी परिचय लिखा गया था. उन्हें क्रमबद्ध एक दूसरे के साथ चिपकाकर एक रोल बनाया गया फिर एक सांचे में फिट कर रोल को उसमें चारों ओर अंधेरा कर धीरे-धीरे घुमाया गया. पार्श्व में संगीत चलता रहा. पहली बार ऐसा प्रयोग देख दर्शक काफी आश्चर्य व्यक्त रोमांच से भर उठे थे. यहां पर जिक्र करना जरूरी है कि नाटक में महिला पात्रों के लिए महिलाओं के चयन की जो सोच मेरे मन के किसी कोने में दबी पड़ी थी निर्देशन की बागडोर हाथ में आते ही मैंने उस पर भी ध्यान केंद्रित किया. सत्यवादी हरिश्चंद्र एवं अहिल्या उद्धार के सभी महिला पात्र बालिकाओं द्वारा ही अभिनीत किए गए थे और उन्होंने उन्हें निभाते हुए खूब वाहवाही भी लूटी थी. पुरुष पात्रों को महिला पात्रों के रूप में देखने की अभ्यस्त जनता के लिए यह अपने आप में अनूठा व आश्चर्यजनक कदम था. इन प्रस्तुतियों के माध्यम से बरसों के मेरे संकल्प को भी जैसे बहुत बड़ी राह व संतुष्टि मिली थी.

उत्तरकाशी में सुवर्ण रावत के निर्देशन में बांसुरी बजती रही नाटक के आउटडोर विडियो फिल्मांकन में अभिनय व भागीदारी निभाने के बाद सितंबर 1988 में महरगांव में नाट्य शिविर के दौरान साजिश नाटक का विडियो फिल्मांकन उस समय की एक बड़ी और अनोखी घटना थी. गांव के कलाकारों के साथ ही इसमें दिनेश भट्ट, सुधा रावत, सुरक्षा रावत, बद्री बिजल्वाण, प्रेमवल्लभ पुरोहित ने भी अभिनय किया था. इस विडियो फिल्मांकन के दौरान सारे गांववासियों का सहयोग व हिस्सेदारी उत्साहजनक थी. इसके कुछ गीत प्रेमवल्लभ पुरोहित ने लिखे थे. गीतों को पं. जगदीश जगूड़ी व चन्द्र मोहन सेमवाल ने संगीत वीडियो स्वरवद्ध किया था. रूप सागर की ओर से कैमरामैन सुभाष रावत आए थे. बड़े जोश—खरोश के साथ तीन दिन व रात साजिश की आउटडोर शूटिंग की गई. मेरे निर्देशन में पहली बार किसी नाटक के आउटडोर विडियो फिल्मांकन पर हम बेहद उत्साहित एवं रोमांचित थे. लेकिन उस दिन मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया जब रूप सागर से सूचना मिली थी कि साजिश का विडियो टेप खो गया है. किसी नाटक पर विडियो फिल्म बनाने की मेरी महत्त्वाकांक्षी योजना के छिन्न—भिन्न हो जाने पर मैं बहुत दिनों तक व्यथित रहा लेकिन फिर इसे कोई बड़ी दुर्घटना मान अपनी पूर्वावस्था में लौटना ही पड़ा. दुर्भाग्य कि बड़े परिश्रम से रिकॉर्ड किए गए साजिश के गीतों की आडियो कैसेट भी मुझे वापस नहीं मिली थी. आज सोचता हूं कि मुझमें सचमुच बहुत धैर्य वह सहनशीलता का जखीरा रहा होगा तभी तो अपनी एक महत्त्वाकांक्षी योजना पर पानी फिरने के बावजूद सहज बना रह सका. मेरी जगह कोई और होता तो न जाने क्या कर बैठता. आज भी साजिश का वह दंश मुझे कभी कभार बेहद व्यथित कर बैठता है.

पौराणिक नाटक एवं रामलीला को लेकर मैं यह उल्लेख करना जरूरी समझता हूं कि अपनी बाल्यावस्था में मुझे उपला मठ की रामलीला को अनेक बार देखने का अवसर मिला था. वहां पर मैंने सत्यवादी हरिश्चंद्र नाटक के एक अंश की प्रस्तुति के साथ प्रहसन भी प्रस्तुत किया था और विचार व्यक्त करने का सुयोग भी अनेक बार बना. इसके अलावा स्व. ओम प्रकाश नौटियाल के बुलावे पर गुन्दियाटगांव, चपटाड़ी, सरनौल, सर बडियार, बचाणगांव, कुमारकोट सहित कुछ स्थानों पर मुझे पौराणिक नाटकों को देखने का अवसर मिला था और नाटकों के प्रति मेरी गहरी रूचि का ही परिणाम रहा कि मैंने शायद ही कभी किसी प्रस्तुति के समापन से पहले अपना स्थान छोड़ा हो. नाटक के लिए उत्तरकाशी से सरनौल तक आना. रात्रि डेढ़ दो बजे तक नाटक देखना फिर वह फिर बड़कोट तक पैदल वापसी के बाद बस द्वारा उत्तरकाशी जाकर परीक्षा में शामिल होना मेरे जीवन की ऐसी घटनाएं हैं जो नाटक के प्रति मेरी गहरी रुचि की परिचायक हैं और आज मुझे भी हैरत में डालती हैं.

गांव में पौराणिक नाटकों अथवा रामलीला के मंचन का बच्चों में सुसंस्कार विकसित करने, उनके ज्ञानवर्धन, संकोच को दूर करने, उनमें आत्मविश्वास पैदा करने के अलावा उन्हें समाज से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है. बचपन से हमारा उच्चारण दोष सारी उम्र हमें इससे ग्रस्त रखता है लेकिन नाटकों में भागीदारी करते हुए संवाद अदायगी के दौरान इससे आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है. रामलीला व नाटकों के बीच बीच में प्रहसन (कामिक) में अपने समय व समाज की बुराइयों, कुरीतियों पर प्रहार कर उन्हें दूर करने व बुराई से दूर रहने के संदेश का ताना-बाना अद्भुत कल्पना के साथ बुना जाता था. जो उनमें मौलिक सृजन तथा कल्पना शक्ति का संचार व विकास करता था.

साफ तौर पर मुझे यह स्वीकारने में कोई हिचक नहीं है कि मेरे लेखन, अभिनय व निर्देशन की जमीन रामलीला व पौराणिक नाटकों से मेरे गहरे जुड़ाव के कारण मिली. इन्हीं से गुजरते हुए मुझे नाटक लिखने के लिए असीम ऊर्जा व प्रेरणा मिली. रंगकर्म के क्षेत्र में कुछ करने व आगे बढ़ते रहने के लिए इनकी अविस्मरणीय भूमिका रही है. इनकी ओर मेरा जुड़ाव न हुआ होता तो इस क्षेत्र में मेरा कुछ कर पाना संभव नहीं था.

(सभी फोटो महावीर रवांल्टा द्वारा)

(लेखक कवि एवं वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

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