April 17, 2021
संस्मरण

पितरों की घर-कुड़ी आबाद रहे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—8

  • प्रकाश उप्रेती

ये हमारी ‘कुड़ी’ (घर)  है. घर को हम कुड़ी बोलते हैं. इसका निर्माण पत्थर, लकड़ी, मिट्टी और गोबर से हुआ है. पहले गाँव पूरी तरह से प्रकृति पे ही आश्रित होते थे इसीलिए संरक्षण के लिए योजनाओं की जरूरत नहीं थी. जिसपर इंसान आश्रित हो उसे तो बचाता ही है. पहाड़ों में परम्परागत रूप से एक घर दो हिस्सों में बंटा रहता है. एक को गोठ कहते हैं और दूसरे को भतेर. गोठ नीचे का और भतेर ऊपर का हिस्सा  होता है. इन दो हिस्सों को भी फिर दो भागों में बांट दिया जाता है: तल्खन और मल्खन .

तल्खन बाहर का हिस्सा और मल्खन अंदर का हिस्सा कहलाता है. अक्सर भतेर में तल्खन बैठने के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो वहीं मल्खन में सामान रखा जाता है. गोठ में खाना बनता है. मल्खन में चूल्हा लगा रहता और खाना बनता है. तल्खन में लोग बैठकर खाना खाते हैं.

हम मल्खन से सारी चीजें चट्ट न कर दें इसलिए अम्मा और ईजा हमको डराते थे कि मल्खन मत जाना वहां ‘कुंड़ीं बूढैय्’ बैठी रहती है. मल्खन जाने में डर भी लगता था. बाद- बाद में जैसे-जैसे समझ आती गयी यह डर भी दूर हो गया. 

बचपन में मल्खन हमारी छुपने की जगह होती थी. अंदर की तरफ होने की वजह से वहाँ अक्सर घुप्प अंधेरा होता था. यह अंधेरा, छुपन-छुपाई खेलने के लिए एकदम उपयुक्त हुआ करता था.  मल्खन ही वह जगह भी होती थी जहाँ थोड़ी बहुत खाने की चीजें (जो भी हों) रखीं रहती थीं. जैसे दही, कोई दिल्ली से आए तो उनकी दी हुई मिठाई, गुड़, चीनी, गटा, मिश्री, कुंज, चने , कोई बिस्किट का पैकेट, आदि. हम मल्खन से सारी चीजें चट्ट न कर दें इसलिए अम्मा और ईजा हमको डराते थे कि मल्खन मत जाना वहां ‘कुंड़ीं बूढैय्’ बैठी रहती है. मल्खन जाने में डर भी लगता था. बाद- बाद में जैसे-जैसे समझ आती गयी यह डर भी दूर हो गया. …

हमारी (लेखक) ‘कुड़ी’ (घर)

कुड़ी के ढांचे में पत्थर और मिट्टी के अलावा बंस, दादर, थुमी, भराण की भूमिका अहम होती है. इन सब लकड़ी के अलग- अलग आकार- प्रकार से कुड़ी टिकी रहती है. अपना यही सब देखते- सुनते बचपन गुजर गया. पहाड़ पर अब सीमेंट आ गया है. लेंटर वाले घर बन रहे हैं. पुराने घर गरीबी और लेंटर वाले घर अमीरी का प्रतीक हो गए हैं. हर किसी की एक अदत चाहत गाँव में लेंटर वाला मकान बनाने की हो गई है. हाय, हाय रे लेंटर…

ईजा ने आज भी कुड़ी को आबाद रखा है. कुड़ी का एक -एक पत्थर और लकड़ी ईजा को जानते हैं, ईजा उनको. ईजा को पता होता है कि किस पत्थर से पानी टपकेगा और कहां से मिट्टी निकलने वाली है. कब घर को लीपना है और कब उसकी मरम्मत करनी है. ईजा का वो घर है. उनके लिए कुड़ी सिर्फ कुड़ी नहीं बल्कि स्मृतियों का इतिहास है जिसे वो खंडहर नहीं होने देना चाहती हैं.

पहले गाँव में  कुड़ी के दरवाजों का बंद होना और कुड़ी का खंडहर होना गाली माना जाता था. जब लोग गाली देते थे या ‘घात’ (ईश्वर को साक्षी मानकर किसी का अहित चाहना) डालते थे तो कहते थे- ‘तेर कुड़ी खनारी हे जो’, ‘तेर कुड़ी द्वहर पट बंद हे जी’. परन्तु अब गाँव के गाँव खंडहर हैं और कुड़ी पर ताले ही लटक रहे हैं, न जाने किसकी घात लगी है. गाँव के गाँव खाली/भूतहा हो गए हैं और जो कुड़ी बची भी हैं, वो भी बस ढ़हने के इंतजार में…

ईजा ने आज भी कुड़ी को आबाद रखा है. कुड़ी का एक -एक पत्थर और लकड़ी ईजा को जानते हैं, ईजा उनको. ईजा को पता होता है कि किस पत्थर से पानी टपकेगा और कहां से मिट्टी निकलने वाली है. कब घर को लीपना है और कब उसकी मरम्मत करनी है. ईजा का वो घर है. उस घर से हम मकान की तरफ आ गए लेकिन ईजा किसी 2bhk या 3bhk, 4 bhk की बजाय घर में रहना चाहती हैं. उनके लिए कुड़ी सिर्फ कुड़ी नहीं बल्कि स्मृतियों का इतिहास है जिसे वो खंडहर नहीं होने देना चाहती हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं.)

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