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देश—विदेश समाज

नोएडा ट्विन टावर: हम कहाँ जा रहे हैं? 

प्रो. गिरीश्वर मिश्र  टीवी पर नोएडा में सुपर टेक के बहुमंज़िले ट्विन टावरों के गिराने और उससे उड़ते धूल-धुआँ के भयावह दृश्य दिखाने के कुछ समय बाद उसके निर्माता का बयान आ रहा था कि उन्होंने सब कुछ बाक़ायदा यानी नियम क़ानून से किया था और हर कदम पर ज़रूरी अनुमति भी ली थी। शायद […]
साहित्‍य-संस्कृति

शिक्षक की गरिमा : पुनर्प्रतिष्ठा की अनिवार्यता

शिक्षक दिवस पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  भारतीय संस्कृति में गुरु या शिक्षक को ऐसे प्रकाश के स्रोत के रूप में ग्रहण किया गया है जो ज्ञान की दीप्ति से अज्ञान के आवरण को दूर कर जीवन को सही मार्ग पर ले चलता है. इसीलिए उसका स्थान सर्वोपरि होता है. उसे ‘साक्षात परब्रह्म’ तक कहा […]
लोक पर्व-त्योहार

कर्मयोगी श्रीकृष्ण: जियो तो ऐसे जियो !

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  सुख की चाह और दुःख से दूरी बनाए रखना जीवित प्राणी का सहज स्वाभाविक व्यवहार है और पशु मनुष्य सब में दिखाई पड़ता है. यह सूत्र जीवन के सम्भव होने की शर्त की तरह काम करता है. पर इसके आगे की कहानी हम सब खुद रचते […]
साहित्‍य-संस्कृति

स्वतंत्र भारत में स्वराज की प्रतिष्ठा

स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त, 2022) पर विशेष  प्रो. गिरीश्वर मिश्र  आज़ादी मिलने के पचहत्तर साल बाद देश स्वतंत्रता का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहा है तो यह विचार करने की इच्छा और स्वाभाविक उत्सुकता पैदा होती है कि स्वतंत्र भारत का जो स्वप्न देखा गया था वह किस रूप में यथार्थ के धरातल पर उतरा. स्वाधीनता संग्राम का […]
साहित्‍य-संस्कृति

सामर्थ्य के विमर्श में मातृभाषा का स्थान 

प्रो. गिरीश्वर मिश्र  मनुष्य इस अर्थ में भाषाजीवी कहा जा सकता है कि उसका सारा जीवन व्यापार भाषा के माध्यम से ही होता है. उसका मानस भाषा में ही बसता है और उसी से रचा जाता है. because दुनिया के साथ हमारा रिश्ता भाषा की मध्यस्थता के बिना अकल्पनीय है. इसलिए भाषा सामाजिक सशक्तीकरण के […]
समसामयिक

सार्वजनिक जीवन में मर्यादा की जरूरत है   

प्रो. गिरीश्वर मिश्र  देश को स्वतंत्रता मिली और उसी के साथ अपने ऊपर अपना राज स्थापित करने का अवसर मिला. स्वराज अपने आप में आकर्षक तो है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके साथ जिम्मेदारी भी मिलती है. स्वतंत्रता मिलने के बाद स्वतंत्रता का स्वाद तो हमने चखा पर उसके साथ की जिम्मेदारी और […]
साहित्‍य-संस्कृति

बुद्ध का स्मरण संतप्त जीवन की औषधि है

बद्ध पूर्णिमा पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  हम सभी अच्छी तरह जीना चाहते हैं परन्तु दिन प्रतिदिन की उपलब्धियों का हिसाब लगाते हुए संतुष्टि नहीं होती है. दिन बीतने पर खोने पाने के बारे में सोचते हुए और जीवन में अपनी भागीदारी पर गौर करते हुए आश्वस्ति कम और आक्रोश, because घृणा, असहायता, कुंठा और […]