विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून पर विशेष

भुवन चंद्र पंत

पूरा विश्व आज पर्यावरण की समस्या से जूझ रहा है, इसमें दो राय नहीं कि इस समस्या के पीछे हमारी अतिभोगवादी मनोवृत्ति रही है. अति का इति निश्चित है. ’ईट, ड्रिंक एण्ड बी because मैरी’ का विचार पश्चिम की देन है, हमारी विचारधारा तो वैदिक काल से लेकर महात्मा गान्धी तक अपरिग्रह की पोषक रही है. उन्होंने भोग में सुख तलाशा है, तो सनातन संस्कृति ने त्याग में वास्तविक सुख को प्रमुखता दी है. मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि आज की पर्यावरण की समस्या के लिए पश्चिम की भोगवादी संस्कृति उत्तरदायी है, लेकिन दुर्भाग्य है कि आज हम उसी संस्कृति का अनुकरण कर और तथाकथित आधुनिक बनकर स्वयं को भी मुसीबत की ओर धकेल रहे हैं.

नैनीताल

हवि में गाय का घी एक प्रमुख घटक है, इसके अतिरिक्त विभिन्न औषधीय वनस्पतियों व आम के लकड़ियों का प्रयोग बताया गया है. ये सभी घटक वायुमण्डल को शुद्ध because करने वाले हैं. आज का विज्ञान भी यह स्वीकारता  है कि आम की लकड़ी जलाने से फार्मिक एल्डिहाइड नाम गैस बनती है, जो हानिकारक जीवाणुओं व बैक्टिीरिया को मारती है.

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वैदिक संस्कृति में प्रकृति को ही ईश्वर का स्थान दिया गया है, जिन तत्वों से विश्व का संचालन होता है, उन्हीं को पूज्य माना गया है. वैदिक काल में आज की तरह दण्ड संहिता तो थी नहीं, जो पालन न करने वाले को दण्डित कर सके. इसलिए पाप का भय दिखाकर विश्व कल्याण के लिए ऐसी मान्यताएं विकसित की गयी, जो समस्त चराचर जगत के हित में थी. पांच तत्वों- पृथ्वी-जल-वायु, अग्नि और आकाश के बिना प्राणीमात्र के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती. because जो इतने उपयोगी हों, हमारी उत्पत्ति के कारक हों, वहीं तो सर्वशक्तिमान हुए ना. किसी ने ईश्वर को तो अपनी आंखों से देखा नहीं, लेकिन हवा, पानी, सूर्य की ऊष्मा, अग्नि आदि तो मूर्त रूप हैं. सब जानते हैं कि इनके बिना समस्त चराचर का अस्तित्व संभव नहीं. वेदों ने इसीलिए प्रकृति उपासना का रास्ता दिखाया और उसे ईश्वर का स्वरूप माना.

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इसी वैदिक ज्ञान से निःसृत सनातन संस्कृति में इनके संरक्षण के लिए परम्पराओं की शुरूआत हुई. हमारी रस्मों, तीज- त्योहारों तथा परम्पराओं में इसका इस तरह समावेश किया गया कि वे हमारी जीवन शैली का अभिन्न अंग बन गये. उत्तर वैदिक काल में बहु-ईश्वरवाद तथा मूर्तिपूजा की शुरूआत् हुई. उत्तर वैदिक काल में भी because वैदिक परम्पराऐं तो यथावत् रही, लेकिन प्रकृति के साथ ही प्रजापति तथा विष्णु आदि की उपासना तथा मूर्ति पूजा के कारण वैदिक संस्कृति के मूल अग्नि, वायु, वरूण आदि धीरे धीरे नेपथ्य की ओर ओझल होते गये . पौराणिक काल में so सृष्टि के उत्पत्ति, पालन और संहारक के रूप में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अपनी दिव्य शक्तियों के कारण राम, कृष्ण तथा ऋषि-मुनियों के अनुकरणीय चरित्र से प्रेरित होकर उन्हें ईश्वर का स्थान दिया गया.

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बात आते-आते तैंतीस कोटि देवी-देवताओं because तक पहुंच गयी . सनातन संस्कृति में भी  वैदिक परम्पराऐं  बदस्तूर जारी रही, लेकिन इन परम्पराओं के पीछे क्या चिन्तन रहा, इसकी जानकारी के अभाव में हमारी महज परम्पराओं का मात्र एक हिस्सा बन कर रह गयी .

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हमारे पहाड़ में किसी की मृत्यु होने पर तेरहवीं नहीं होती. बल्कि बारह दिन तक प्रेत क्रिया मृतक की आत्मा की शान्ति के लिए की जाती है, और बारहवें दिन पीपल का but पौधा रोपित कर पीपलपानी की रस्म की जाती है. कितनी समृद्ध परम्परा है यह. एक ओर मृतक की स्मृति में पीपल का वृक्ष लगाने से जब तक पीपल का पेड़ खड़ा रहेगा, मृतक याद चिरकाल तक बनी रहेगी, दूसरी ओर पीपल को सबसे अधिक प्राणवायु देने वाला वृक्ष बताया गया है.

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आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती का आह्वान ’वेदों की ओर लौटो’ के पीछे समाज के भटकाव की यही चिन्ता स्पष्ट झलकती है. वैदिक काल से आज तक समय प्रवाहso में क्या से क्या होकर रह गये. सामाजिक, सांस्कृतिक, जीवन मूल्यों के प्रति, आस्था, धर्म व अध्यात्म के बदलते मानदण्ड के बीच वैदिक मूल्य आज भी सनातन संस्कृति में समाहित तो हैं, लेकिन हमें इन परम्पराओं के गूढ़ रहस्यों से वंचित रखा गया.

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वैदिक काल से चली आ रही यज्ञ की परम्परा सनातन संस्कृति में आज भी प्रचलित है. मान्यता है कि यज्ञ की आहुति में दी जाने वाली हवि  अग्नि के माध्यम से सीधे अभीष्ट देवताओं तक पहुंचती है. हवि में गाय का घी एक प्रमुख घटक है, इसके अतिरिक्त विभिन्न औषधीय वनस्पतियों व आम के लकड़ियों का प्रयोग बताया गया है. ये सभी घटक वायुमण्डल को शुद्ध करने वाले हैं. आज का विज्ञान भी यह स्वीकारता  है कि आम की लकड़ी जलाने से फार्मिक एल्डिहाइड नाम गैस बनती है, जो हानिकारक जीवाणुओं व बैक्टिीरिया को मारती है.

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जब कर्मकाण्डी पण्डित हमसे कहें कि यज्ञ में आहुति की जाने वाली हवि सीधे ईश्वर तक पहुंचती है, तो आस्था के नाम पर हम इसे मान तो लेते हैं, साथ ही मन ही मन एकbecause शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि अग्नि में समर्पित यह हवि देवताओं तक कैसे पहुंचती होगी. लेकिन यह महज आस्था का प्रश्न नहीं है, वह अवश्य उन देवताओं तक पहुंचती हैं और वह देवता हैं प्रकृति के ये कारक तत्व. वेदों ने इन्हीं को तो ईश्वर माना था. क्या यज्ञ का यह हवि जब अग्नि के माध्यम से हवा में फैलता है, हमारे वातावरण को शुद्ध नहीं करता? यज्ञ में दी जाने वाली हवि प्रकृति के इन तत्वों को पुष्ट कर वातावरण शुद्ध करती है. आज कोरोना काल में तो हवन आदि और भी अधिक जरूरी हो गया है.

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हमारे पहाड़ में किसी की मृत्यु होने पर तेरहवीं नहीं होती. बल्कि बारह दिन तक प्रेत क्रिया मृतक की आत्मा की शान्ति के लिए की जाती है, और बारहवें दिन पीपल का पौधा रोपित कर but पीपलपानी की रस्म की जाती है. कितनी समृद्ध परम्परा है यह. एक ओर मृतक की स्मृति में पीपल का वृक्ष लगाने से जब तक पीपल का पेड़ खड़ा रहेगा, मृतक याद चिरकाल तक बनी रहेगी, दूसरी ओर पीपल को सबसे अधिक प्राणवायु देने वाला वृक्ष बताया गया है.

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यह मृतक को प्रकृति से उस ऋण से उऋण होने का एक उपक्रम भी है, कि जीवित रहने पर जितनी प्राणवायु का उसने कुदरत से उपभोग किया, उसकी एवज में यह पीपल का but वृक्ष उसकी भरपाई करेगा. लेकिन दुर्भाग्य है कि आज इस समृद्ध परम्परा का वास्तविक महत्व समझे बिना हम पीपल के पेड़ से एक टहनी तोड़कर रोप देते हैं, और उसी में जल अर्पित कर परम्परा का प्रतीकात्मक निर्वाह कर लेते हैं.

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किसी भी शुभ कार्य के बाद ’नौहव पूजा’ (पनघट की पूजा) हमारी रस्म का एक हिस्सा है. जिसमें पनघट की पूजा की जाती है. जल को विष्णु स्वरूप माना गया है, इसलिए यह so हमें जल की महत्ता को प्रतिपादित करता है कि जल की शुद्धता का ध्यान रखें, लेकिन इस ’नौहव पूजा’ के नाम पर ही हम पूजा सामग्री विसर्जित कर उस जल को प्रदूषित कर आयें तो इसे परम्परा के पीछे के चिन्तन की अनभिज्ञता ही कहा जायेगा .

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प्रकृति ने कितनी सुन्दर व्यवस्था की थी, क्षेत्र के जलवायु के अनुकूल खाद्य सामग्री की. गरम क्षेत्रों में जहां शीतलता प्रदान करने वाले पदार्थों की आवश्यकता थी, वहां नारियल because जैसे वृक्षों को उगाया और अति ठन्डे स्थानों के लिए गरम वस्तुऐं प्रकृति में उगाई. लेकिन दुष्ट मानव ने प्रकृति से बराबरी करने की धुन में वैज्ञानिक चमत्कार के नाम पर वह सब कर दिखाया, जो प्रकृति के प्रतिकूल था.

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वैदिक संस्कृति में पर्यावरण के प्रति कितनी जागरूकता थी, इसका अनुमान यजुर्वेेद के इसी मंत्र से लगाया जा सकता है, जिसमें प्रकृति के समस्त तत्वों व कारकों में शान्ति कीbut प्रार्थना कीगयी है – ’’ॐ द्यौरू शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिरू पृथिवी शान्तिरापरू शान्तिरोषधयरू शान्तिरू. वनस्पतयरू शान्तिर्विश्वेदेवारू शान्तिर्ब्रह्म शान्तिरूसर्वं शान्तिरूए शान्तिरेव शान्तिरू सा मा शान्तिरेधि ॥ ॐ शान्तिरू शान्तिरू शान्तिरू॥‘’

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पर्यावरण की समस्या मानव जनित है, इसमें दो राय नहीं . समस्त चराचर जगत की प्रवृत्ति सदैव प्रकृति के अनुकूल चलने की रही है. सभ्यता कितनी ही विकसित हुई हो, लेकिन मनुष्य को छोड़कर समस्त चराचर जगत की प्रकृति नहीं बदली. सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, सभी अपनी गति व दिशा से नहीं भटके, चराचर जगत में वनस्पतियों में जो विशेषताऐं तब थी, वो आज भी हैं. हिंसक, शाकाहारी व so मांसाहारी पशुओं ने अपना भोजन नहीं बदला और प्रकृति के अनुकूल चले. लेकिन इन्सान ने स्वयं तो प्रकृति के विपरीत आचरण किया ही, वनस्पतियों व जीवजन्तुओं में भी नवीन वैज्ञानिक प्रयोग कर कृत्रिम नस्ल तथा बैमौसमी फसलें उगाकर प्रकृति के विरूद्ध जाने का दुस्साहस किया.

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प्रकृति ने कितनी सुन्दर व्यवस्था की थी, क्षेत्र के जलवायु के अनुकूल खाद्य सामग्री की. गरम क्षेत्रों में जहां शीतलता प्रदान करने वाले पदार्थों की आवश्यकता थी, so वहां नारियल जैसे वृक्षों को उगाया और अति ठन्डे स्थानों के लिए गरम वस्तुऐं प्रकृति में उगाई. लेकिन दुष्ट मानव ने प्रकृति से बराबरी करने की धुन में वैज्ञानिक चमत्कार के नाम पर वह सब कर दिखाया, जो प्रकृति के प्रतिकूल था.

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सभी सांकेतिक फोटो pixabay.com से साभार

कहते हैं ना कि ईश्वरके लिए चराचर के but सभी जीवजन्तु बराबर हैं, तब क्या कुदरत ने इनके साथ भेद किया है? ये भीतो वही कर रहे हैं जो हम ईश्वर से अपेक्षा रखते हैं. हवा, पानी, सूरज की ऊष्मा सबके लिए समान हैं, पेड़- पौधे व वनस्पतियां धर्म नहीं देखती, पशु-पक्षियों के लिए सब समान हैं, लेकिन इन्सान धर्म, जाति so और न जाने किन किन वर्गों में बंट गया? इन्हीं सामाजिक बुराइयों को देखकर महर्षि दयानन्द ने वेदों की ओर लौटने का आव्हान किया. सच में जिस दिन हम कुदरत के इन तत्वों व because कारकों को देवता स्वरूप सम्मान देगें तो धार्मिक व सम्प्रदायिक मतभेद समाप्त हो जायेंगे, क्योंकि सभी के उपास्य एक ही होंगे, प्रकृति के ये तत्व. अगर पुनः इन्हें देवतुल्य सम्मान हम दिला सके, तो स्वाभाविक है कि हम प्रकृति के प्रतिकूल काम नहीं करेंगे और पर्यावरण की समस्या स्वतः हल हो जायेगी .

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(लेखक भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल से सेवानिवृत्त हैं तथा प्रेरणास्पद व्यक्तित्वोंलोकसंस्कृतिलोकपरम्परालोकभाषा तथा अन्य सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के अलावा कविता लेखन में भी रूचि. 24 वर्ष की उम्र में 1978 से आकाशवाणी नजीबाबादलखनऊरामपुर तथा अल्मोड़ा केन्द्रों से वार्ताओं तथा कविताओं का प्रसारण.)

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