गुरुदेव रवींद्र की पुण्यतिथि पर विशेष

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

आज 7 अगस्त को गांधी जी को ‘महात्मा’ का सम्मान देने वाले कवि, उपन्‍यासकार, नाटककार, चित्रकार रवींद्रनाथ टैगोर की 80वीं पुण्यतिथि है. 7 अगस्त 1941 को गुरुदेव का निधन हो गया था. वे ऐसे मानवतावादी विचारक थे, जिन्‍होंने साहित्य, संगीत, कला और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अपनी अनूठी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया. रवींद्रनाथ टैगोर भारत ही नहीं एशिया के प्रथम व्‍यक्ति थे, जिन्‍हें नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था. उन्हें 1913 में उनकी कृति ‘गीतांजली’ के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. कहा जाता है कि नोबेल पुरस्कार गुरुदेव ने सीधे स्वीकार नहीं किया. उनकी ओर से ब्रिटेन के एक राजदूत ने पुरस्कार लिया था और फिर उनको दिया था.

टैगोर ने कविता, साहित्य, दर्शन, नाटक, संगीत और चित्रकारी समेत कई विधाओं में अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया.रवींद्रनाथ टैगोर की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं हैं- हैमांति, काबुलीवाला, क्षुदिता पश्न, मुसलमानिर गोल्पो. प्रसिद्ध उपन्यास हैं- चतुरंगा, गोरा,नौकादुबी, जोगजोग, घारे बायर इत्यादि. उनकी लिखी ‘गीतांजलि’ नामक कविता ने विश्व में सर्वाधिक ख्याति अर्जित की.

यह देश के लिए गौरव की बात है कि भारतीय मनीषा की सर्वोत्कृष्ट प्रस्तुति भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को एक ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है जिनकी रचनाओं को दो दो देशों का राष्ट्रगान बनने का गौरव प्राप्त है- भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’. यहां तक कि श्रीलंका के राष्ट्रगान को भी उनकी कविता से ही प्रेरित माना जाता है.

गुरुदेव रवींद्र वैश्विक समानता और एकांतिकता के पक्षधर थे. कविवर रवीन्द्र द्वारा रचित इस राष्ट्रगान की संस्कृतनिष्ठ शब्दयोजना को देखने से लगता है कि यह गीत न केवल सदियों से गुलामी की मानसिकता में जी रहे लोगों को आजादी के लिए जगाने का गीत है बल्कि राष्ट्ररक्षा का प्रेरणादायी  वैदिक उद्घोष भी है. हमारे ऋषि मुनियों ने जिस गायत्री मन्त्र के ‘भू: भुवः स्व:’ के माध्यम से पूरे ब्रह्माण्ड के अधिनायक सविता देवता की आराधना की है उससे व्यक्ति को ऊर्जस्वी तन और मन की प्राप्ति होती है. सूर्य की प्रथम रश्मियां स्वास्थ्य और चिंतन की जिस प्रकार दिव्य ऊर्जा का संचार करती हैं वैसी ही दिव्य अनुभूति हमें राष्ट्रगान  ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे’ की प्रथम पंक्ति से भी होती है.

मानव शरीर को नेतृत्व प्रदान करने वाला अधिनायक भाव बुद्धि और विवेक है जो विज्ञान के धरातल पर हमें सूर्य की प्रथम किरणों से प्राप्त होता है.उसी वैदिक भावना से अनुस्यूत होकर इस राष्ट्रगान में पंजाब से लेकर बंगाल तक और विवेकानन्द से लेकर गोखले, तिलक, सुभाषचन्द्र बोस एवं गांधी जैसे विचारकों तक के इसी बुद्धि-विवेक की प्रखरतापूर्ण नेतृत्व से पूरे भारत को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक साथ सावधान हो कर खड़ा किया गया है. हजारों साल की गुलामी के घोर तिमिर के बीच शिकागो से लेकर बंगाल तक व्यवस्था परिवर्तन की एक नई सुबह का इस गीत के बोलों में अभिनन्दन का स्वर मुखरित हुआ है.

इस राष्ट्रगान में ‘जय हे, जय हे, जय हे’ का तीन बार प्रयोग हुआ है जो गायत्री मन्त्र के ‘भू: भुवः स्व:’ नामक तीन लोकों का, ब्रह्मांड को धारण करने वाले तीन गुणों- ‘सत्व-रजस्-तमस् का, काल की तीनों पर्याय-अतीत,वर्तमान और भूत काल का, त्रिविध सृष्टि-दैहिक-दैविक और भौतिक का, तीन प्रकार की एषणाएं – पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा का, तीन देव ब्रह्मा- विष्णु-महेश का, तीन देवियां काली- लक्ष्मी- सरस्वती का जय उद्घोष है. राष्ट्रगान के अंत में आए ‘जय-जय-जय-जय हे’ में चार बार जय शब्द का प्रयोग भी सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग इन चारों युगों,बाह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चारों वर्णों, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वेद इन चारों वेदों, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास इन चारों आश्रमों और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की शुभता के भाव को प्रदर्शित करता है.

कवीन्द्र रवीन्द्र द्वारा लिखित इस ‘जन गण मन’ के गीत का हमें इस दृष्टि से भी अवलोकन करना चाहिए कि हमारे इस विश्वकवि के मन में अपने ‘भारतराष्ट्र’ की परिकल्पना कितनी व्यापक और सुमधुर है? धार्मिक सद्भावना और सामाजिक समरसता से यह किस तरह ओतप्रोत है? और भौगोलिक एकता और प्राकृतिक वैभव से इस राष्ट्रगान का एक एक पद किस प्रकार से ‘भारतराष्ट्र’ की अवधारणा को गौरवान्वित कर रहा है? संविधान सभा द्वारा 24 जनवरी 1950 को इसी ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान  को आधिकारिक तौर पर मंजूरी दी गई जिसके बोल इस प्रकार हैं-

“जनगणमन-अधिनायक जय हे
भारतभाग्यविधाता!
पंजाब सिंध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंग
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छलजलधितरंग
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशिष मागे,
गाहे तव जयगाथा.
जनगणमंगलदायक जय हे
भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे..”

इस रचना के उपर्युक्त पदों को ही भारत के राष्ट्रगान होने का सम्मान प्राप्त है. यहां से नीचे दिये गये आगे के चार पद भारतीय राष्ट्रगान का अंग नहीं हैं किन्तु इन पदों में वर्णित भारतराष्ट्र का जो गुणगान गुरुदेव रवीन्द्र ने किया है उसी की प्रेरणा से हजारों वर्ष पुराना नींद में सोया हुआ राष्ट्र जाग रहा था जैसा कि इस गीत की ‘तव करुणारुणरागे निद्रित भारत जागे तव चरणे नत माथा’ जैसी पंक्तियां बताती हैं-

अहरह तव आह्वान प्रचारित,
शुनि तव उदार बाणी
हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक
मुसलमान खृष्टानी
पूरब पश्चिम आसे
तव सिंहासन-पाशे
प्रेमहार हय गाथा.

जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे
भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे..

पतन-अभ्युदय-वन्धुर पन्था,
युग युग धावित यात्री.
हे चिरसारथि, तव रथचक्रे
मुखरित पथ दिनरात्रि.
दारुण विप्लव-माझे
तव शंखध्वनि बाजे
संकटदुःखत्राता.
जनगणपथपरिचायक जय हे
भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे..

घोरतिमिरघन निविड़ निशीथे
पीड़ित मूर्छित देशे
जाग्रत छिल तव अविचल
मंगल नतनयने अनिमेषे.
दुःस्वप्ने आतंके रक्षा करिले अंके
स्नेहमयी तुमि माता.
जनगणदुःखत्रायक जय हे
भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे..

रात्रि प्रभातिल, उदिल रविच्छवि
पूर्व-उदयगिरिभाले-गाहे
विहंगम, पुण्य समीरण
नवजीवनरस ढाले.
तव करुणारुणरागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा.
जय जय जय हे जय राजेश्वर
भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे..”

वस्तुतः, कवीन्द्र रवीन्द्र ने इस पंचपदी राष्ट्रगान में ‘भारतराष्ट्र’ की गंगोत्री से जो भारतीय गणतंत्र की पांच सारस्वत गंगाएं प्रवाहित हुई हैं उनके जलाभिषेक से ही हम आज भी अपने राष्ट्र का कल्याण कर सकते हैं. इस राष्ट्रगान में राष्ट्र कल्याण के जो पांच कालजयी सूत्र गुम्फित हुए हैं,वे इस प्रकार हैं-

पहला सूत्र है- ‘जनगणमन-अधिनायक’

अर्थात् नेतागण  जनता जनार्दन के मन के अनुकूल नेतृत्व प्रदान करें.

दूसरा सूत्र है – ‘जनगण-मंगलदायक’

अर्थात् हमारा जनतंत्र लोक मंगलकारी हो.

तीसरा सूत्र है –‘जनगण-ऐक्य-विधायक’

अर्थात् हमारा लोकतंत्र राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाला बने.

चौथा सूत्र है- ‘जनगण-पथ-परिचायक’

अर्थात् हमारा लोकतंत्र राष्ट्र का पथ प्रदर्शन करने वाला बने.

पांचवां सूत्र है- ‘जनगण-दुःखत्रायक’

अर्थात् हमारा लोकतंत्र जनसामान्य के कष्टों का निवारण करे.

हमें विश्व कवि रवीन्द्र नाथ के राष्ट्रगान की उपर्युक्त गणतांत्रिक संकल्पनाओं का सम्मान करते हुए अपने ‘भारतराष्ट्र’ को महान बनाना चाहिए. गुरुदेव रवींद्र वैश्विक समानता और एकांतिकता के पक्षधर थे. आज हम सब मिलकर अपने इस कालजयी राष्ट्रगान के लेखक गुरुदेव रवीन्द्र की 80वीं पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि कोटि नमन करते हैं, जिनके प्रेरणागीत से हमने स्वतंत्रता आन्दोलन का संग्राम लड़ा, विजयी रहे और भविष्य में उसकी रक्षा के लिए भी सदैव तत्पर हैं. जयहिन्द! जयभारत!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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