
2010 में पशुबलि बंद, अब हनोल महासू देवता मंदिर में घांडुवा चढ़ाने की परंपरा भी समाप्त
- नीरज उत्तराखंडी, त्यूणी
प्रसिद्ध श्री महासू देवता मंदिर, हनोल में धार्मिक परंपरा को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। देवता की आज्ञा के अनुसार अब मनौती पूरी होने पर मंदिर में घांडुवा (बकरा) चढ़ाने की परंपरा समाप्त कर दी गई है। मंदिर में पशुबलि की प्रथा वर्ष 2010 में ही पूरी तरह बंद हो चुकी है। अब घांडुवा चढ़ाने के स्थान पर श्रद्धालु पूजा-अर्चना के दौरान जटा नारियल अर्पित कर सकेंगे।
इसके साथ ही श्रद्धालु घांडुवे के निर्धारित मूल्य के बराबर अथवा अपनी श्रद्धानुसार चढ़ावे की राशि मंदिर समिति कार्यालय में जमा करा सकेंगे। समिति की ओर से जमा राशि की रसीद भी दी जाएगी। मंदिर समिति और क्षेत्रीय धार्मिक प्रतिनिधियों के अनुसार यह निर्णय देवता की आज्ञा के आधार पर लिया गया है।
छह खतों और तीन पट्टियों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में निर्णय
गुरुवार को श्री महासू देवता मंदिर, हनोल में आयोजित बैठक में बावर क्षेत्र की छह खतों तथा सीमावर्ती बंगाण क्षेत्र की तीन पट्टियों से जुड़े कारीदों, स्याणों, बजीरों और गणमान्य लोगों ने भाग लिया।
बैठक में धार्मिक परंपराओं के साथ ही आगामी 19 से 21 नवंबर तक प्रस्तावित स्वर्ण कलश स्थापना के धार्मिक अनुष्ठान की तैयारियों और व्यवस्थाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इसी दौरान देवता की आज्ञा के अनुसार घांडुवा चढ़ाने की परंपरा समाप्त करने का निर्णय सार्वजनिक रूप से घोषित किया गया।
2010 में बंद हो चुकी है पशुबलि
पांडवकालीन महत्व और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र श्री महासू देवता मंदिर, हनोल में देश के विभिन्न हिस्सों से वर्षभर श्रद्धालु पहुंचते हैं। पूर्व में मनौती पूरी होने पर मंदिर में छोटे मेमने और बकरे पशुबलि के रूप में चढ़ाने की परंपरा प्रचलित थी।
सामाजिक जागरूकता और मंदिर समिति के प्रयासों के बाद वर्ष 2010 में मंदिर में पशुबलि की प्रथा पूरी तरह बंद कर दी गई। हालांकि मनौती पूरी होने पर घांडुवा चढ़ाने की परंपरा अलग रूप में जारी थी। अब इसे भी समाप्त करने का निर्णय लिया गया है।
सांठीबिल के बजीर दीवान सिंह राणा और बावर खत के सदर स्याणा चमन सिंह चौहान ने बताया कि देवता की आज्ञा के अनुसार अब मंदिर में घांडुवा नहीं चढ़ाया जाएगा। इसके स्थान पर श्रद्धालु जटा नारियल अर्पित कर सकेंगे।
जटा नारियल से पूजा, मंदिर समिति में जमा होगी राशि
मंदिर समिति श्रद्धालुओं को मनौती पूरी होने पर घांडुवा अथवा बकरा चढ़ाने के बजाय जटा नारियल अर्पित करने के लिए प्रेरित करेगी। श्रद्धालु घांडुवे के निर्धारित मूल्य के बराबर अथवा अपनी श्रद्धानुसार राशि मंदिर समिति कार्यालय में जमा कर रसीद प्राप्त कर सकेंगे।
समिति का कहना है कि नई व्यवस्था से श्रद्धालु अपनी धार्मिक आस्था और परंपरा के अनुरूप पूजा-अर्चना कर सकेंगे। साथ ही पशुबलि और पशु चढ़ाने की पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने का संदेश भी समाज तक पहुंचेगा।
स्वर्ण कलश स्थापना की तैयारियां तेज
हनोल महासू देवता मंदिर में 19 से 21 नवंबर तक स्वर्ण कलश स्थापना का तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान प्रस्तावित है। इसमें जौनसार-बावर, बंगाण, यमुना घाटी और पछवादून के अलावा हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और शिमला सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
आयोजन को भव्य बनाने के लिए मंदिर समिति ने तैयारियां तेज कर दी हैं। बैठक में संभावित भीड़ को देखते हुए भंडारे में भोजन व्यवस्था, सुरक्षा, पेयजल, पथ-प्रकाश, यातायात प्रबंधन और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं पर चर्चा की गई।
बैठक में प्रमुख निर्णय
देवता की आज्ञा से मंदिर में घांडुवा चढ़ाने की परंपरा समाप्त कर दी गई है। अब इसके स्थान पर श्रद्धालु जटा नारियल अर्पित करेंगे। घांडुवे के निर्धारित मूल्य के बराबर अथवा श्रद्धानुसार राशि मंदिर समिति कार्यालय में जमा कर रसीद ली जा सकेगी।
इसके साथ ही 19 से 21 नवंबर तक होने वाले स्वर्ण कलश स्थापना धार्मिक अनुष्ठान के लिए व्यापक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। पशुबलि और पशु चढ़ाने की पुरानी व्यवस्था के स्थान पर वैकल्पिक धार्मिक परंपरा को प्रोत्साहित करने का भी निर्णय लिया गया।
ये लोग रहे मौजूद
बैठक में सांलीबिल के बजीर दीवान सिंह राणा, सदर स्याणा चमन सिंह पंवार, स्याणा सुनील राणा, किशन सिंह, रणेश्वर सिंह, भुवनेश्वर पंवार, संतराम चौहान, सूरतराम जोशी, अर्जुन सिंह रावत, मंदिर समिति के सचिव मोहनलाल सेमवाल, हरिश्चंद्र राणा, धीरज सिंह राणा, नरेंद्र नौटियाल, विक्रम सिंह राजगुरु, टीकाराम नौटियाल, मातबर सिंह राणा और बलवीर सिंह चौहान सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।
घांडुवा से जटा नारियल तक का यह बदलाव हनोल मंदिर की धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण परिवर्तन माना जा रहा है। वर्ष 2010 में पशुबलि बंद होने के बाद अब मनौती के रूप में बकरा चढ़ाने की परंपरा समाप्त किए जाने से मंदिर में पशु चढ़ाने की व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में एक और कदम उठाया गया है।
