उत्तराखंड हलचल

रोपणी-“सामूहिक सहभागिता की मिशाल खेती का त्यौहार”

रोपणी-“सामूहिक सहभागिता की मिशाल खेती का त्यौहार”

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालपहाड़ों में खेती बाड़ी के कामों को सामूहिक रूप से त्यौहार जैसा मनाने की परम्परा वर्षों पुरानी है. हर मौसम में, हर फसल को बोने से लेकर, निराई—गुड़ाई और कटाई—छंटाई तक सारे कामों को त्यौहार के रूप मनाने की परम्परा सदियों पुरानी है, जिसमें रोपणी (धान की रोपाई) मुख्यत: एक ऐसी परम्परा थी. यह पूरे गांव की सहभागिता, सामूहिकता, आपसी भाईचारा को दर्शाती थी.पहाड़ों में रोपणी के लिए धान की नर्सरी (बीज्वाड़) चैत्र (मार्च-अप्रैल) माह में डाली जाती है, ताकि समय पर पौध तैयार हो जाए. सभी की यह कोशिश रहती थी कि सबकी नर्सरी एक साथ डाली जाय ताकि एक ही समय पर सबकी रोपणी लग सके. आषाढ़ (जून-जुलाई) का महिना एक ऐसा महिना होता है जब पूरे पहाड़ में हर गांव में रोपणी की धूम रहती थी, हर गांव घर परिवार को इंतजार रहता था कि कब उनके खेत में गुल का पानी पहुंचे और कब उनकी रोपणी लगे. बारी—बारी से सबके खे...
अंजीर ला सकता है रोजगार की बयार

अंजीर ला सकता है रोजगार की बयार

उत्तराखंड हलचल
बेडू और तिमला से ही विकसित हुआ है अंजीर. उत्तराखंड में उपेक्षित क्यों?जे. पी. मैठाणीपहाड़ों में सामान्य रूप से जंगली समझा जाने वाला बेडू और तिमला वस्तुत: एक बहुउपयोगी फल है. ​तिमला और बेडू के वृक्ष से जहां पशुओं के लिए जाड़ों में विशेषकर अक्टूबर से मार्च तक हरा चारा मिलता है, वहीं इसका फल अभी तक उपेक्षित माना गया है. दुनिया के कई देशों में लगातार शोध और अनुसंधान तथा कायिक प्रवर्धन से अंजीर को विकसित किया गया. शोध पत्र बताते हैं कि अंजीर जिसका वैज्ञानिक नाम फाइक्स कैरिका है यह मलबेरी ​परिवार यानी मोरेशी परिवार का सदस्य है. मूलत: अंजीर एशिया में तुर्की से उत्तर भारत तक का निवासी माना जाता है. पहले इसको गरीबों का भोजन भी कहा जाता था. जैसे कि आज भी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जिस परिवार को सब्जी नसीब ना हो, ऐसा माना जाता है कि वह परिवार तिमले की सब्जी बनाते हैं या चटनी बनाते ...
टिहरी रियासत के विरुद्ध जन-संघर्षों का अग्रणी व्यक्तित्व

टिहरी रियासत के विरुद्ध जन-संघर्षों का अग्रणी व्यक्तित्व

उत्तराखंड हलचल
दादा दौलतराम खुगशाल (मार्च, 1891- 3 फरवरी, 1960)डॉ. अरुण कुकसाल‘‘आज तक राजा ने हमको पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं दिया जिससे हम बायां अंगूठा लगाने को मजबूऱ हैं, लेकिन अब अगर राजा के कर्मचारी ‘कर’ आदि वसूलने आयें तो हमें उन्हें अपना दायां अंगूठा दिखाना चाहिए और हम दिखायेंगे भी.’’                                                                                                                                    - दादा दौलतराम खुगशाल प्रजामंडल के टिहरी सम्मेलन (25-27 मई, 1947) में दादा दौलतराम ने अपने भाषण में उक्त वक्तव्य देकर राजशाही को खुली चुनौती दे थी. टिहरी रियासत के विरुद्ध हुये निर्णायक आंदोलनों में 3 नाम प्रमुख रूप में सामने आते हैं. अमर शहीद श्रीदेव सुमन, दादा दौलतराम खुगशाल और नागेन्द्र सकलानी. श्रीदेव सुमन टिहरी रियासत के आत्याचारों के खिलाफ स्थानीय जनता की आवाज को देश के राष...
वीरान होती छानियां

वीरान होती छानियां

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालडांडा छानी (गौशाला)- पहाड़ों में हर मौसम के अनुसार और खेती-बाड़ी के अनुसार लोगों ने छानियां बनाई हुई रहती थी जिससे उन्हें अपनी खेती—बाड़ी के काम और चारा—पत्ती लाने में किसी भी तरह की परेशानियों का सामना न करना पड़े, इससे उनका समय भी बचता था और समय पर उनका काम भी निपटता था. उनकी समय सीमा भी निर्धारित रहती थी कि किस समय और किस मौसम में वो कौन—सी जगह की छानी में उनको रहने जाना है, उस हिसाब से फसल बोना और अपनी जरूरत का सामान जुटाकर जाना होता था. मार्च माह के मध्य में मैं और मेरे साथ मेरे गांव के दो चार लोग हम बुरांश लेने अपने गांव की डांडा छानी गए बल्कि जाना तो उससे भी ऊपर था और गए भी. सच कहूं तो बुरांश लेने जाना तो एक बहाना था मुझे तो उन छानियों को देखना था, जो कभी पशुओं और इंसानों से गुलजार हुआ करती थी, आज वो बिल्कुल निर्जन जंगल भी कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. छानियां बिल्क...
प्रकृति की गोद में बसा हरकीदून, बुग्याल और कई किस्म के फूलों की महक जीत लेती है दिल

प्रकृति की गोद में बसा हरकीदून, बुग्याल और कई किस्म के फूलों की महक जीत लेती है दिल

उत्तराखंड हलचल
शशि मोहन रावत ‘रवांल्‍टा’मानव प्रकृति प्रेमी है. प्रकृति से ही उसे आनंद की अनुभूति होती है. मानव का प्रकृति से प्रेम भी स्वाभाविक ही है, क्योंकि प्रकृति उसकी सभी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करती है. इसी प्रकृति ने पर्वतराज हिमालय की गोद में अनेक पर्यटन स्थलों का निर्माण किया है. इन्हीं पर्यटन स्थलों में "हरकीदून" एक अत्यंत रमणीय स्थली है. हरकीदून सीमान्त जनपद उत्तरकाशी का एक पर्यटन स्थल है. जहां प्रतिवर्ष देश-विदेशों से प्रकृति प्रेमी प्रकृति का अनुपम सौंदर्य निहारने के लिए पहुंचते रहते हैं. यह गोविन्दबल्लभ पंत वन्य जीव विहार एवं राष्ट्रीय पार्क के लिए भी प्रसिद्ध है. भोजपत्र, बुरांस व देवदार के सघन वृक्षों के अलावा यहां अमूल्य जीवनदायिनी जड़ी-बूटियां, बुग्याल एवं प्राकृतिक फल-फूल देखे जा सकते हैं.यहां वृक्षों में सर्वाधकि भोजपत्र (बेटुला युटिलिस) तथा खर्सू (क्वेरकस) के वृक्ष प...
लोक संस्कृति में रंग भरने वाला पहाड़ का चितेरा  

लोक संस्कृति में रंग भरने वाला पहाड़ का चितेरा  

उत्तराखंड हलचल
ललित फुलाराभास्कर भौर्याल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. उम्र सिर्फ 22 साल है. पर दृष्टिकोण और विचार इतना परिपक्व कि आप उनकी चित्रकारी में समाहित लोक संस्कृति और आंचलिक परिवेश को भावविभोर होकर निहारते रह जाएंगे. उनके चटक रंग बरबस ही अपनी दुनिया में खोई हुई आपकी एकाग्रता, को अपनी तरफ खींच लेंगे. वो जो अंकित कर रहे हैं, अपनी जड़ों की तरफ ले जाने की खुशी से आपको भर देगा. भास्कर के तैलीय चित्र हृदय की गहराई में जितने उतरते हैं, उनकी कुमाऊंनी में प्रकृति के सौंदर्यबोध वाली कविताएं उजाड़ मन में पहाड़ प्रेम को उतना ही ज्यादा भर देती हैं.भास्कर अब तक 200 से ज्यादा चित्र बना चुके हैं, जिनमें ग्रामीण परिवेश की बारीकियां, पहाड़ की संस्कृति में अहम भूमिका निभाने वाले वाद्य यंत्र, उत्तराखंड की संस्कृति के प्रतीक लोकनृ­त्य झोड़ा और चांचरी, एवं कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी वेशभूषा.... आदि के विविध...
बॅम्बूसा पॉलिमार्फा : एक बहुउपयोगी बांस

बॅम्बूसा पॉलिमार्फा : एक बहुउपयोगी बांस

उत्तराखंड हलचल
जे. पी. मैठाणीबांस के संसार में बांस की कुल प्रजातियों को वानस्पतिक वर्गीकरण के आधार पर दो प्रमुख भागों में बांटा गया है. प्रथम बॅम्बूसा प्रजातियां जैसे- बॅम्बूसा पॉलिमार्फा, बॅम्बूसा वल्गेरिस, बॅम्बूसा बैम्बूस, बॅम्बूसा टुल्डा, बॅम्बूसा बालकोआ, बॅम्बूसा मल्टिप्लैक्स आदि. डैन्ड्राकैलेमस की प्रजातियों में डैन्ड्राकैलेमस एस्पर, डैन्ड्राकैलेमस हैमल्टोनाई, डैन्ड्राकैलेमस हेटरोस्टैचिया, डैन्ड्राकैलेमस लॉन्गिंपैथस, डैन्ड्राकैलेमस सिक्किमेन्सिस आदि. यह एक बहुत ही रोचक बात है कि बांस की प्रजातियों का उद्भव पृथ्वी पर लगभग 30 मिलियन वर्ष पहले हुआ. डायनासोर के विलुप्ति के बाद ही पृथ्वी पर बांस प्रजातियां उत्पन्न हुई हैं. आज हम आपको मूलतः म्यांमार, थाइलैण्ड, बांग्लादेश में पाए जाने वाले एक विशिष्ट बांस बॅम्बूसा पॉलिमार्फा के बारे में जानकारी दे रहे हैं. यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आजकल...
ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालपहाड़ों में बहुत—सी चीजें हमारे बुजुर्गों ने हमें विरासत के रूप में सौंपी हैं पर आज आधुनिकता की चमक—दमक और भागदौड़ भरी जीवनशैली में हम इन चीजों से कोसों दूर जा चुके हैं. हम अपनी पुराने खान—पान की चीजों को सहेजना और समेटना लगभग भूल ही गए हैं. अपने खान—पान में हमने पुराने अनाजों, पकवानों को कहीं न कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया है. आज लोग उस खान—पान को ज्यादा पसंद कर रहे हैं जिसमें पौष्टिकता बहुत कम मात्रा में होती है और शरीर को नुकसान अलग से होता है, जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ रही है. हमारा शरीर रोगों से लड़ने के लिए कमजोर होता जा रहा है. जिस खाने में नाममात्र की भी पौष्टिकता नहीं होती है बल्कि शरीर को मजबूत बनाना तो दूर, कमजोर ज्यादा बना रहा है, ऐसे खान—पान को हमने अपने आज खाने में शामिल किया हुआ है.रवांई घाटी एक ऐसी घाटी है जहां पर लोगों ने आज भी अपनी परम्पराओ...
याद करना लोक-संस्कृति के अध्येता को

याद करना लोक-संस्कृति के अध्येता को

उत्तराखंड हलचल
डॉ. गोविन्द चातक की पुण्यतिथि (9 जून, 2007) पर विशेषचारु तिवारी‘‘सदानीरा अलकनंदा की तरल तरंगों ने राग और स्वर देकर, उत्तुंग देवदारु के विटपों ने सुगंधिमय स्वाभिमान देकर और हिमवन्त की सौंदर्यमयी प्रकृति ने अनुभूतियां प्रदान कर गोविन्द चातक की तरुणाई का संस्कार किया है. इसलिये चातक प्रकृत कवि, कोमल भावों के उपासक, लोक जीवनके गायक और शब्द शिल्पी बने हुये हैं.’’ (सम्मेलन पत्रिकाः लोक संस्कृति अंक)गढ़वाल की लोकविधाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में ही उन्होंने अपना जीवन लगा दिया. एक गहन अध्येता, संवेदनशील लेखक, प्रतिबद्ध शिक्षक, कुशल नाटककार, गूढ़ भाषाविद, प्रबुद्ध आलोचक, लोक विधाओं के शोधकर्ता के रूप में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा. गढ़वाली भाषा और साहित्य के एक ज्ञानकोश के रूप में हम सब उन्हें जानते हैं.वे अपने आप में एक पहाड़ थे. लोक साहित्य और लोकभाषा के. लोक वि...
ईजा के जीवन में ओखली

ईजा के जीवन में ओखली

संस्मरण, उत्तराखंड हलचल
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—14प्रकाश उप्रेतीये है-उखो और मुसो. स्कूल की किताब में इसे ओखली और मूसल पढ़ा. मासाब ने जिस दिन यह पाठ पढ़ाया उसी दिन घर जाकर ईजा को बताने लगा कि ईजा उखो को ओखली और मुसो को मूसल कहते हैं. ईजा ने बिना किसी भाव के बोला जो तुम्हें बोलना है बोलो- हमुळे रोजे उखो और मुसो सुणी रहो... फिर हम कहते थे ईजा- ओखली में कूटो धान, औरत भारत की है शान... ईजा, जै हनल यो...अक्सर जब धान कूटना होता था तो ईजा गांव की कुछ और महिलाओं को आने के लिए बोल देती थीं. उखो में मुसो चलाना भी एक कला थी. लड़कियों को बाकायदा मुसो चलाना सिखाया जाता था.उखो एक बड़े पत्थर को छैनी से आकार देकर बनाया जाता था वहीं मुसो मोटी लकड़ी का होता था लेकिन उसके आगे 'लुअक' (लोहे का) 'साम' (लोहे के छोटा सा गोलाकार) लगा होता था. उखो वाले पत्थर को 'खो' (आंगन का एक अलग हिस्सा) में लगाया जाता था. मुस...