साहित्‍य-संस्कृति

हास्य, व्यंग्य नहीं, हमारे दर्द के कवि हैं शेरदा अनपढ़

हास्य, व्यंग्य नहीं, हमारे दर्द के कवि हैं शेरदा अनपढ़

साहित्‍य-संस्कृति
ललित फुलारा'कुमाउनी शब्द संपदा' पेज पर प्रसिद्ध कवि-गीतकार शेरदा "अनपढ़" की कविताओं के विभिन्न आयाम पर केंद्रित चर्चा 'हमार पुरुख' में वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी, साहित्यकार because देवेन मेवाड़ी और डॉ दिवा भट्ट ने अपने विचार रखे. चारु तिवारी ने शेरदा अनपढ़ की कविता और जीवन यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शेरदा अनपढ़ हास्य, व्यंग्य नहीं, हमारे दर्द के कवि हैं.मूलांक उनका कविता संसार मानवीय संवेदनाओं का संसार है. हर गीत और कविता में जीवन का भोगा हुआ यथार्थ है. जो बोल नहीं सकते, शेरदा की कविताएं उनकी आवाज हैं. जनसंघर्ष, because आध्यात्म, प्रकृति और प्रेम के साथ ही समसामयिक विषयों को संबोधित करने वाले कवि हैं, शेरदा . उनके साहित्यिक अवदान को जितना समेटा जाए, उतना फैलता जाता है. अपनी कविता के बारे में वह कहते थे ... मैं कविता हंसकर भी लिखता हूं, रोकर भी, बीच बाजार में भी लिखता हूं और...
फैशन की बातें- बीते दौर की

फैशन की बातें- बीते दौर की

साहित्‍य-संस्कृति
भुवन चंद्र पंतजिन्दगी भले कितनी तंगहाली में गुजरे लेकिन फैशन को अपने अन्दाज में अपनाना हमारे शौक से ज्यादा मजबूरी बन जाती है. मजबूरी इसलिए कि यदि हम जमाने के अनुसार नहीं चलते तो गंवार व बुर्जुआ कहलायेंगें. बाजार भी इस नस को बखूबी जानता है और हरेक की सामर्थ्य के अनुकूल विकल्प तैयार कर लेता है. बात कर रहे हैं because पिछले 50-60 के बीच बदलते फैशन की, जिसके हम प्रत्यक्षदर्शी रहे. मुमकिन है कि आज की नई पीढ़ी को उस पर यकीन भी नहीं होगा कि कभी ऐसा भी वक्त रहा होगा, जब पैर का जूता भी आम इन्सान को नसीब नहीं था. आज तो पैदा हुए बच्चे को जूते पहना दिये जाते हैं, भले वो चलना न सीखा हो. एक दौर वो भी था, जब पांचवी दर्जे तक तो जूते पहनना अमीर शोहदों की चीज हुआ करती थी. अंक शास्त्र दर्जा 6 में जाने के बाद लाल अथवा सफेद रंग के कपडे़ के जूते मिला करते, जिनके तलवे यदि घिस कर सीधे पैर जमीन को छुए, इससे फ...
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर उनकी मानव-दृष्टि

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर उनकी मानव-दृष्टि

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्रकवि, चिन्तक और सांस्कृतिक नायक गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर साहित्य और कला के क्षेत्र में नव जागरण के सूत्रधार थे. आध्यात्म, साहित्य, संगीत और नाटक के परिवेश में पले बढे और यह सब उनकी स्वाभाविक प्रकृति और रुचि के अनुरूप भी था. बचपन से ही उनकी रुचि सामान्य और साधारण का अतिक्रमण करने में रही पर वे because ऋषि परम्परा, उपनिषद, भक्ति साहित्य, कबीर जैसे संत ही नहीं, सूफी और बाउल की लोक परम्परा आदि से भी ग्रहण करते रहे. कवि का मन मनुष्य, प्रकृति, सृष्टि और परमात्मा  के बीच होने वाले संवाद की ओर आकर्षित होता रहा. प्रकृति के क्रोड़ में जल, वायु, आकाश, और धरती की भंगिमाएं उन्हें सदैव कुछ कहती सुनाती सी रहीं. तृण-गुल्म, तरु-पादप, पर्वत-घाटी, नदी-नद और पशु-पक्षी को निहारते और गुनते कवि को सदैव विराट की आहट सुनाई पड़ती थी. अंक शास्त्रविश्वात्मा की झलक पाने के लिए कवि अपने को तै...
टैगोर का शिक्षादर्शन-‘असत्य से संघर्ष और सत्य से सहयोग’

टैगोर का शिक्षादर्शन-‘असत्य से संघर्ष और सत्य से सहयोग’

साहित्‍य-संस्कृति
रवीन्द्रनाथ टैगोर के जन्मदिन पर विशेषडॉ. अरुण कुकसाल‘किसी समय कहीं एक चिड़िया रहती थी. वह अज्ञानी थी. वह गाती बहुत अच्छा थी, लेकिन शास्त्रों का पाठ नहीं कर पाती थी. वह फुदकती बहुत सुन्दर थी, लेकिन उसे तमीज नहीं थी. राजा ने सोचा ‘इसके because भविष्य के लिए अज्ञानी रहना अच्छा नहीं है’....उसने हुक्म दिया चिड़िया को गंभीर शिक्षा दी जाए. कोविड पंडित बुलाए गए और वे इस निर्णय पर पंहुचे कि चिड़िया की शिक्षा के लिए सबसे जरूरी हैः एक पिंजरा. और फिर पिंजरे में रखकर चिड़िया ज्ञान पाने लगी. लोगों ने कहा so ‘चिड़िया के तो भाग्य जगे !’.......... ‘महाराज, because चिड़िया की शिक्षा पूरी हो गई’. राजा ने पूछा, but ‘वह फुदकती है ? भतीजे-भानजों because ने कहा, ‘नहीं !’ ‘उड़ती so है ?’ ‘एकदम नहीं !’ ‘चिड़िया लाओ,’ butराजा ने आदेश दिया. कोविड चिड़िया लाई गई. उसकी सुरक्षा में because कोतवाल, सिपाही और...
कोरोना और हमारा दायित्व 

कोरोना और हमारा दायित्व 

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्रआजकल नए-नए अकल्पनीय दृश्यों  के साथ हर दिन का पटाक्षेप हो रहा है.  कोरोना पीड़ितों की बेशुमार होती संख्या के साथ मृत्यु का अनियंत्रित तांडव खौफनाक होता जा रहा है. इसका व्यापक अस्तित्व किसी के बस में नहीं है पर इसके समाधान के लिए जो करणीय है उसको देख सुन कर यही लगता है कि हम वह सब ठीक ढंग से नहीं कर पा रहे हैं जो इस दौरान जरूरी था.  इस बीच हमने बहुतों को खो दिया. यह सब तब हुआ जब स्पेन, इटली, ब्राजील because और अमेरिका जैसे देशों के खौफनाक मंजर सारी दुनिया के सामने थे, चिकित्सा विज्ञान के शोध अनुसंधान के परिणाम भी थे और भारत की तैयारी की जानकारी क्या है यह भी मालूम थी. यह जरूर है कि स्थिति की भयानकता का शायद अच्छी तरह पूर्वानुमान नहीं लगाया गया था.आज बढ़ते तनाव और दबाव के माहौल  में जब आर्थिक संसाधन भी सिमटते जा रहे हैं, बेरोजगारी और मंहगाई बढ़ती जा रही है आम आदमी ...
पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की आत्मनिर्भरता

पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की आत्मनिर्भरता

साहित्‍य-संस्कृति
सुनीता भट्ट पैन्यूलीपंचायती राज व्यवस्था में  महिलाओं की सहभागिता और उनका प्रतिनिधित्व महिला सशक्तिकरण,स्वायत्ता और स्थानीय स्वशासन की ओर एक ओजस्वी कदम माना गया because अभी हाल ही की यूनिसेफ की एक  रिपोर्ट ने उत्तर-प्रदेश  में पंचायती चुनावों के बीच, पंचायती व्यवस्था में महिलाओं की सहभागिता  और उनके दायित्व निर्वहन की समस्या को उजागर किया है.यह कैसी व्यवस्था और दोगलापन है स्त्री सशक्तीकरण का? जहां  स्त्री केवल महिला ग्राम प्रधान का मुखौटा पहने  हुए है यानी पद का झुनझुना तो पकड़ा दिया जाता है स्त्री को किंतु अधिकार सारे पुरुष के हाथ में  हैंपंचायती चुनाव ग्राम पंचायत में अपने क्षेत्र के प्रतिनिधित्व व स्व विकास हेतु महिलाओं को जो 1/3 अधिकार मिला है उसके तहत महिलाएं पारिवारिक दबदबे, रसुकता या आरक्षण की but वजह से चुन तो ली जाती हैं  किंतु उसके सभी अधिकार व दायित्व पति, पुत्र, ...
स्वयं सहायता समूह के जरिए पूर्ण हुआ स्वरोगार का स्वप्न

स्वयं सहायता समूह के जरिए पूर्ण हुआ स्वरोगार का स्वप्न

साहित्‍य-संस्कृति
प्रकाश उप्रेती  पहाड़ हमेशा आत्मनिर्भर रहे हैं. पहाड़ों के जीवन में निर्भरता का अर्थ सह-अस्तित्व है. यह सह-अस्तित्व का संबंध उन संसाधनों के साथ है जो पहाड़ी जीवनचर्या के because अपरिहार्य अंग हैं. इनमें जंगल, जमीन, जल, जानवर और जीवन का कठोर परिश्रम शामिल है. इधर अब गांव में कई तरह की योजनाओं के जरिए पहाड़ अपनी मेहनत से नई करवट ले रहा है. इस करवट की एक आहट आपको खोपड़ा गांव में दिखाई देगी.महिला स्वयं सहायता समूह पिछले साल गांव में ‘महिला स्वयं सहायता समूह’ की स्थापना हुई. यह विचार ग्राम पंचायत की तरफ से एक मीटिंग में रखा गया था. ईजा उस मीटिंग में गई हुई थीं. ईजा बताती हैं कि- ‘उस because मीटिंग में हमारी ‘पधानी’ के अलावा दो महिलाएं अल्मोड़ा से आई हुई थीं’. हमारी ग्राम पंचायत में 4 गांव आते हैं. हर गांव से महिलाएं आई हुई थीं. कहीं से चार, कहीं से दस और कहीं से तीन ही. हमारे गांव से दो लोग ...
पहाड़ों से विलुप्त होते घराट…

पहाड़ों से विलुप्त होते घराट…

साहित्‍य-संस्कृति
खजान पान्डेपरम्परागत तौर पर पहाड़ के लोगों की वैज्ञानिक सोच और दृष्टिकोण को देखना हो तो घराट जिसे घट भी कहा जाता है एक नायाब नमूना है. आधुनिकता की दौड़ में पहाड़ so और इसकी जीवनशैली से जुड़ी कुछ चीजें जो लगभग समाप्ति की और हैं उनमें घराट प्रमुख है. यूँ तो आज घर-घर में अनाज पीसने के लिए छोटी-छोटी बिजली से चलने वाली मशीनें लग चुकी हैं किन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में घराट वैज्ञानिक पद्धति से निर्मित स्थानीय तकनीक है जिसके द्वारा सैकडों वर्षों तक लोगों द्वारा अनाज पिसा जाता रहा है.अनाज पीसने के लिए छोटी-छोटी बिजली नदियों के किनारे बने घराट में गाड़-गधेरों से नहरों (गूल) द्वारा पानी को लकड़ी से बने पनाले द्वारा पानी को निचले तल पर बने पंखेदार चक्र में छोड़ा जाता है. ऊपर के तल में दो पाटे (गोल पत्थर) बने हुए होते हैं जिसमें निचला पाटा स्थिर रहता है but और ऊपर का पाटे में चक्र के सीधे खड़े हिस्से (...
गढ़वाल की प्रमुख बोलियाँ एवं उपबोलियाँ

गढ़वाल की प्रमुख बोलियाँ एवं उपबोलियाँ

साहित्‍य-संस्कृति
संकलनकर्ता : नवीन नौटियालउत्तराखंड तैं मुख्य रूप सै गढ़वाळ और कुमौ द्वी मंडलूं मा बंट्यु च, जौनसार क्षेत्र गढ़वाळ का अधीन होणा बावजूद अपणी अलग पैचाण बणाण मा सफल रै। इले ही यु अबि बि विवादौकु बिसै च कि जौनसारी एक स्वतंत्र भाषा च कि गढ़वळी की एक उपबोली च। [उत्तराखंड को मुख्य रूप से गढ़वाल और कुमाऊँ दो मंडलों में विभाजित किया गया है, जौनसार क्षेत्र गढ़वाल के अधीन होने के बावज़ूद अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में सफल हुआ है। इसीलिए यह अभी भी विवाद का विषय है कि जौनसारी एक स्वतंत्र भाषा है या गढ़वाली की ही एक उपबोली है।]गढ़वळी का अंतर्गत आंण वळी मुख्य बोली और उपबोली ई छन – [गढ़वाली के अंतर्गत आने वाली प्रमुख बोलियाँ और उपबोलियाँ इस प्रकार हैं –] #जौनसारी - गढ़वाल मंडल के देहरादून जिले के पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्र जौनसार-बावर में #जौनपुरी - टिहरी जिले के जौनपुर क्षेत्र में #रवाँल्टी - उत्तरकाशी ज...
प्रयोग ही परिवर्तन के संवाहक बनेगें

प्रयोग ही परिवर्तन के संवाहक बनेगें

साहित्‍य-संस्कृति
इन्‍द्र सिंह नेगीये प्रयोग कितना सफल-असफल होता है ये भविष्य के गर्भ में है लेकिन चलना शुरू करेगें तभी कहीं ना कहीं पहुंच पायेगेंये लगभग चार वर्ष पहले की बात है जेठ का समय रहा और हमारे दो परिवारों के बच्चे सौरभ, कनिष्क, कुलदीप,  शुभम एवं रवि समर जेस मोटर मार्ग जो because लखस्यार से निकल कर फिलहाल कचटा गांव में समाप्त हो रहा है, से लगी हमारी पारिवारिक so जमीन जो बजंर हो चुकी थी ने गड्ढे खोदने शुरू किए. एक दिन मुझे भी इन्होने अपने इस कार्य को देखने के लिए आने को कहा तो मैं भी समय निकाल कर चल दिया, रस्ते में जब हम साथ-साथ खेतों की तरफ बढ़ने लगे तो मैंने पूछा कि तुम लोगों को ये गड्ढे खोदने की क्या सूझी तो so कहने लगे कि जरूरी नहीं पढ़ाई लिखाई करने के बाद नौकरी लग ही जायेगी इसलिए जरूरी है इस तरह के कामों को भी साथ-साथ आगे बढ़ाया जाए. मैंने कहा ये तो बहुत दूरदर्शिता पूर्ण बात कह दी तु...