संस्मरण

यादों में एक शहर

डॉ विजया सती दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज से हाल में ही सेवानिवृत्त हुई हैं. इससे पहले आप विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिन्दी–ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में तथा प्रोफ़ेसर हिन्दी – हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया में कार्यरत रहीं. साथ ही महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, संस्मरण, आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं. विजया सती जी अब ‘हिमांतर’ के लिए ‘देश-परदेश’ नाम से कॉलम लिखने जा रही हैं. इस कॉलम के जरिए आप घर बैठे परदेश की यात्रा का अनुभव करेंगे.


बुदापैश्त डायरी-7

  • डॉ. विजया सती

आज उस शहर की बात जहां रहकर हम हिन्दी पढ़ा रहे थे ….

विश्व की सबसे हरी-भरी राजधानियों में एक नाम बुदापैश्त भी है. दुना नदी का बहाव इसे विशेष आकर्षण प्रदान करता है.

छोटी-छोटी पहाड़ियों के उतार-चढ़ाव पर बने लाल छत वाले मकान इसकी खूबसूरती को बढ़ाते हैं. यह एक छोटा शहर है – दिल्ली से कई गुना छोटा, जिसके मुख्य ओने-कोने यात्रा क्रम में बार-बार दिखाई पड़ते हैं.

राजधानी के जीवन में सप्ताह का आरम्भ चहल-पहल के साथ होता है- ऑफिस सुबह साढ़े आठ बजे खुलते हैं, शाम साढ़े चार बजे बंद होते हैं. इन दो समयों पर अपार जनसमूह उमड़ता है. बस-ट्राम-मेट्रो खूब लद-फंद कर चलती हैं. किन्तु भीड़ में एक शालीन व्यवहार रहता है.

बूढ़े लोगों का अपना धीमी गति वाला जीवन है. वे रोजमर्रा का सामान खरीदने निकलते ही हैं. उनके पास पहिए पर चलने वाली छोटी-छोटी ट्रॉलियां होती हैं, और अक्सर हाथ में सहारे के लिए लाठी. उन्हें सार्वजनिक परिवहन सुविधा मुफ्त दी गई है.

महिलाएं लगभग सभी जगह काम करती हैं – स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, बैंक, दुकान. वे बस-ट्राम-और मेट्रो भी चलाती हैं. लड़कियां प्राय: सधे हुए क़दमों और तेज चाल से चलती हैं, अपने पहनावे में रंगों के मेल की ओर विशेष सजग. आभूषणों का शौक रखती हैं, आँखों की सज्जा कुछ विशेष ही, सिर्फ़ काजल की कालिमा की अपेक्षा आँखें अन्य रंगों से भी संवारी जाती हैं और जंचती भी हैं. बालों को भी कई तरह के रंग दिए जाते हैं, यहाँ तक कि हरा और गुलाबी भी.

डैन्यूब नदी यहाँ दुना कहलाती है. सभी फोटो: विजया सती

बूढ़े लोगों का अपना धीमी गति वाला जीवन है. वे रोजमर्रा का सामान खरीदने निकलते ही हैं. उनके पास पहिए पर चलने वाली छोटी-छोटी ट्रॉलियां होती हैं, और अक्सर हाथ में सहारे के लिए लाठी. उन्हें सार्वजनिक परिवहन सुविधा मुफ्त दी गई है.

बस, ट्राम, मेट्रो सभी में छोटे बच्चों की गाड़ी और व्हील चेयर रखने का विशेष स्थान बना है, लंबी दूरी की ट्रेन में साइकिल रखने के स्थान निर्धारित हैं. कुत्तों को चेन में और बिल्ली को आरामदायक टोकरी में यात्रा करने की सुविधा दी गई है !

शहर की बड़ी-बड़ी पुरानी इमारतों में बाहर से बहुत सुन्दर कलाकारी की गई है – बच्चे, फ़रिश्ते या परियों की छवि, फूल-पत्ते, बेल-बूटे, सशक्त पुरुषाकृति या कमनीय नारी छवि या फिर जानवर भी उकेरे गए हैं.

हंगेरियन जोर से नहीं बोलते, मेट्रो में सुबह अखबार या फिर कोई पुस्तक पढ़ते हुए दिखेंगे. उनमें हडबड़ी नहीं है. बस में, बाज़ार में या पैदल चलते हुए एक शांत भाव दिखाई देता है. वे हंसते हुए भी कम ही दिखते हैं. उनकी ड्राइविंग में तेज़ी है.

युवावर्ग मस्तमौला हैं – उन्मुक्त, फैशनेबल. टैटू का प्रचलन हुआ तो शरीर में कहीं भी गुदवा लिया. इनके लिए हर सप्ताहांत सैर-सपाटा लेकर आता है.

बड़े परम्परागत बाज़ार का बाहरी सौंदर्य

अधिकतर हंगेरियन सुन्दर हैं, देश भी उतना ही सुन्दर है. फूलों से विशेष प्यार करते हैं – इसलिए ‘विराग’ यानी फूलों की दुकानें बहुत हैं. साल में छः महीने ठण्ड के – फिर सुहावना मौसम. कुछ दिनों की तेज गर्मी अब हो चली है, वरना यह ठंडा प्रदेश भी भारत के नैनीताल-अल्मोड़ा की तरह पंखे का मोहताज नहीं था!

शहर में स्थान-स्थान पर वीर-योद्धाओं, कवि-कलाकारों, राजनीतिज्ञों-राजाओं की आकृतियां विभिन्न आकारों में स्थापित की गईं हैं. कुछ रोचक मुद्राओं वाले चेहरे भी दिखाई देते हैं.

सर्दी में काले ठूंठ बने वृक्ष बर्फ़ पिघल जाने के बाद जब हरे-भरे होने लगते हैं, तभी फूलों की भी बहार आ जाती है. घरों की छोटी-छोटी बाल्कनियों में तरह-तरह के फूल मुस्कुराते हैं और अधिक धूप से बचाने के लिए उन्हें बाकायदा छतरी लगाकर छाया दी जाती है. सर्दियों में घरों के भीतर बड़े-बड़े गमलों में हरियाली को समेटने का रिवाज़ है.

शहर की बड़ी-बड़ी पुरानी इमारतों में बाहर से बहुत सुन्दर कलाकारी की गई है – बच्चे, फ़रिश्ते या परियों की छवि, फूल-पत्ते, बेल-बूटे, सशक्त पुरुषाकृति या कमनीय नारी छवि या फिर जानवर भी उकेरे गए हैं.

संसद रात में प्रकाशमान

यह शहर अपने जिस स्थापत्य के लिए भी प्रसिद्ध है, उसे बुदा के विशाल किले, संसद भवन, ओपेरा हाउस, राष्ट्रीय दीर्घा, कला संग्रहालय, विभिन्न चर्चों और दुना पर बने कई पुलों में देख सकते हैं.

शहर में स्थान-स्थान पर वीर-योद्धाओं, कवि-कलाकारों, राजनीतिज्ञों-राजाओं की आकृतियां विभिन्न आकारों में स्थापित की गईं हैं. कुछ रोचक मुद्राओं वाले चेहरे भी दिखाई देते हैं.

बुदापैश्त में विविध आकृतियाँ

बुदापैश्त के उत्सा, ऊत और तेर यानी सड़कें, बड़े रास्ते और चौराहे एक बार समझ आ जाने पर इस तरह अपनी गिरफ्त में लेते हैं कि आप उन्हें अपनी स्मृतियों में जीवंत पाएं – मेरी तरह !

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर (हिन्दी) हैं। साथ ही विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिन्दी – ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में तथा प्रोफ़ेसर हिन्दी – हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया में कार्यरत रही हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, संस्मरण, आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।)

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