Author: Himantar
हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास

ओ हरिये ईजा..कुड़ी मथपन आग ए गो रे
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—38प्रकाश उप्रेती'ओ...हरिये ईजा ..ओ.. हरिये ईज... त्यूमर कुड़ी मथपन आग ए गो रे' (हरीश की माँ... तुम्हारे घर के ऊपर तक आग पहुँच गई है). आज बात उसी- "जंगलों में लगने वाली आग" की. because मई-जून का महीना था. पत्ते सूख के झड़ चुके थे. पेड़ कहीं से भी खूबसूरत नहीं लग रहे थे. चीड़ के पेड़ों से 'पिरूहु' (चीड़ की घास) झड़ कर रास्तों और जंगलों में फैल गया था. रास्तों में इतनी फिसलन कि चलना मुश्किल हो रहा था. हर जगह पिरूहु ही पिरूहु था.
ज्योतिष
ईजा जब भी घास काटने जाती 'दाथुल' (दरांती) या लाठी से पिरुहु को रास्ते से हटातीं चलती थीं. यह उनका रोज का काम था. ईजा के साथ सूखी लकड़ी लेने हम भी जाते थे तो ईजा कहती थीं- because "भलि अये हां, इनुपन पिरूहु है रो रडले" (ठीक से आना, इधर चीड़ की घास बिखरी पड़ी है, फिसलना मत). हम संभल-संभल कर चलते थे. कई बार तो 'घस-घस' फिसल भी ...

दीव से ओखा तक
गुजरात यात्रा - सोमनाथ से द्वारिकाधीश तकडॉ. हरेन्द्र सिंह असवाल यात्रायें मनुष्य जीवन जीवन की आदिम अवस्था से जुड़ी हुई हैं. चरैवेति चरैवेति से लेकर अनन्त जिज्ञासायें मनुष्य को घेरे रहती हैं. इस बार दिल्ली की लंबी प्रदूषित अवधि ने मुझे बाहर निकलने के लिए इतना विवश किया कि बिना किसी योजना के मै निकल गया जयपुर. जयपुर से डस्टर से चार लोग निकल पड़े. कहाँ जाना है? कहाँ रुकना है? कुछ पता नहीं. आजकल ओयो रूम्स हैं न. जहाँ तक पहुँचेंगे वहीं ओ यो रूम्स देख लेंगे. पुराने ज़माने में लोग यात्रा पर निकलते थे तो चट्टियों पर रुकते थे. ये चट्टियां हर नौ मील पर हुआ करती थी. अक्सर यात्री हर दिन नौ मील की दूरी तय करते और अपने रात्रि पड़ाव तक पहुँच जाते. वे धार्मिक यात्रायें होती थी. जिसमें पुण्य प्राप्ति और मुक्ति की कामना से श्रद्धालु निकला करते थे. मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. मैं तो दिल्ली की तंग ...

राजनीति में अदला बदली
भाग—1डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्रराजनीति, जिसका संबंध समाज में शासन और उससे संबंधित नियम या नीति से है. यह नीति और नियम, राज करने वालों से लेकर समाज के विभिन्न वर्गों पर प्रभाव डालता है. परंतु सत्ता के कई संदर्भ में इसकी दिशा और दशा बदल जाती है, और तब यह सत्ता विशेष के हाथों की कठपुतली मात्र बनकर रह जाती है. यहीं से राजनीति की अदला बदली का खेल शुरू होता है.सत्ता पाने के लिए और अपने अनुसार समाज में नीति का निर्माण करने के लिए वैश्विक इतिहास में कई संघर्षों को देखा जा सकता है. साथ ही, इन संघर्षों में नीति बनाने वालों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि नीति निर्माता समय काल और स्थिति को समझता है और उसी के अनुरूप अपने विचारों को व्यक्त करता है. कुछ राजनीति के विचारक स्वतंत्र रूप में अपने विचारों को सभी के समक्ष प्रस्तुत करते दिखते हैं, जिससे उन्हें कई परेशानियों का सामना भ...

“खाव” जब आबाद थे
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—37प्रकाश उप्रेतीपहाड़ में पानी समस्या भी है और समाधान भी. एक समय में हमारे यहाँ पानी ही पानी था. इतना पानी कि सरकार ने जगह-जगह सीमेंट की बड़ी-बड़ी टंकियाँ बना डाली थी. जब हमारी पीढ़ी सीमेंट की टंकियाँ देख रही थी तो ठीक उससे पहले वाली पीढ़ी मिट्टी के "खाव" बना रही थी. आज बात उसी 'खाव' की. 'खाव' मतलब गाँवों के लोगों के द्वारा जल संरक्षण के लिए बनाए जाने वाले तालाब.
बात थोड़ी पुरानी है लेकिन उतनी भी नहीं कि भुलाई और भूली जा सके. हमारे यहाँ कई जगहों के और गाँवों के नाम के साथ खाव लगा है.जैसे- रुचि खाव, खावे ढे, पैसि खाव, और भी कई खाव थे. कई जगहों की पहचान ही खाव से थी. जगहें तो अब भी हैं लेकिन खाव समतल मिट्टी में तब्दील हो गए हैं. सीमेंट ने पानी और खाव दोनों को निगल लिया.
वह समय था जब पानी लेने के लिए सुबह-शाम 'पह्यरियों' (पानी लाने वाली महिलाएँ) की लाइ...

कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में कृषिमूलक जलप्रबन्धन और ‘वाटर हारवेस्टिंग’
भारत की जल संस्कृति-11डॉ. मोहन चन्द तिवारी(7 फरवरी, 2013 को रामजस कालेज, ‘संस्कृत परिषद्’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी 'संस्कृत: वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य' में मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य "कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जलप्रबन्धन और वाटर हारवेस्टिंग" से सम्बद्ध लेख)
वैदिक काल और बौद्ध काल तक कृषि व्यवस्था के विकास के साथ साथ राज्य के स्तर पर भी जलप्रबन्धन और ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणालियों का भी सुव्यवस्थित विकास हुआ. सिन्धु सभ्यता के प्राचीन नगर 'लोथल' की कृषि व्यवस्था के संदर्भ में हम देख चुके हैं कि इस काल के जल-प्रबन्धकों ने विषम तथा विपरीत परिस्थितियों में भी जल संसाधनों के सदुपयोग की अनेक विधियों का आविष्कार कर लिया था. इसी युग में जलवैज्ञानिक भूसंस्कृति यानी ग्रह-नक्षत्रों से अनुशासित कृषि संस्कृति का भी उदय हुआ जिसे आधुनिक पुरातत्त्वविदों ने ‘टैराक्वा कल्चर’ की संज्ञा दी है....

… जब दो लोगों की दुश्मनी दो गांवों में बदल गई!
सीतलू नाणसेऊ- खाटा 'खशिया'फकीरा सिहं चौहान स्नेहीरुक जाओ! हक्कु, इन बेजुबान जानवरों को इतनी क्रूरता से मत मारो. सीतलू हांफ्ता-हांफ्ता हक्कु के नजदीक पहुंचा. मगर हक्कु के आंखो पर तो दुष्टता सवार थी. हक्कु भेड़ों तथा उनके नादान बच्चों पर ताबड़तोड़ काथ के छिठे (डंडे) बरसा रहा था. सीतलू ने हक्कु का पंजा पकड़ कर उसे पीछे की तरफ धकेल दिया. इससे पहले की हक्कु खुद को संभालता सीतलू अपनी भेड़ों को चौलाई के खेतों से बाहर निकाल कर मुईला टोप की तरफ बढ़ने लगा. हक्कू की आंखें गुस्से से लाल थी. जमीन पर गिरे हुए अपने ऊन के टोपे को सर पर रखते हुए, अपनी चोड़ी को आनन-फानन में लपेट कर वह सीतलू पर क्रोधित होकर बोला, सीतलू तेरे भेड़ों ने मेरे चौलाई के खेतों पर जो नुकसान किया है. उसका हर्जाना तुझे अवश्य देना पड़ेगा. मैं तुझे छोड़ूंगा नहीं. सीतलू ने विनयपूर्वक उत्तर दिया. हक्कू, मुझे तेरा द...

मां, बचपन और सोनला गांव
डॉ. अरुण कुकसाल(भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे श्री गोविन्द प्रसाद मैठाणी, देहरादून में रहते हैं. ‘कहीं भूल न जाये-साबी की कहानी’ किताब श्री गोविन्द प्रसाद मैठाणीजी की आत्मकथा है. अपने बचपन के ‘साबी’ नाम को जीवंत करते हुये बेहतरीन किस्सागोई लेखकीय अंदाज़ में यह किताब हिमालिका मीडिया फाउण्डेशन, देहरादून द्वारा वर्ष-2015 में प्रकाशित हुई है.)
‘साबी, जीवन में कहां-कहां नहीं भटका और कैसे-कैसे खतरों का बचपन से बुढ़ापे तक सामना नहीं किया. मन-तन की भटकन और मृत्यु से भिडंत उसकी कहानी रही है. सोनला से नन्दप्रयाग, नन्दप्रयाग से देहरादून वहां से बरेली, श्रीनगर, कानपुर होते हुए मध्य प्रदेश और अन्ततः वापस देहरादून. देहरादून लगता है शारीरिक अटकन की अन्तिम कड़ी होगी. भटकनों की इस यात्रा में साबी का मन तो सोनला में ही अटका रहा. अपने गांव के कूड़े का बौंड, ओबरा, हाट्टि, तिबारी, गाड़ का मंगरा, धार का ...

…जरा याद करो कुर्बानी
कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) पर विशेषडॉ. मोहन चन्द तिवारीआज पूरे देश में कारगिल विजय दिवस की 21वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है.आज के ही दिन 26 जुलाई,1999 को जम्मू और कश्मीर राज्य में नियंत्रण रेखा से लगी कारगिल की पहाड़ियों पर कब्ज़ा जमाए आतंकियों और उनके वेश में घुस आए पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया था. उसी उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष '26 जुलाई' का दिन ‘विजय दिवस’ के रूप में याद किया जाता है और पूरा देश उन वीर और जाबांज जवानों को इस दिन श्रद्धापूर्वक नमन करता है.भारतीय सेना का यह ऑपरेशन विजय 8 मई से शुरू होकर 26 जुलाई तक चला था. इस कार्रवाई में भारतीय सेना के 527 जवान शहीद हुए तो करीब 1363 घायल हुए थे. कारगिल के इस युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटाने में उत्तराखंड के 75 जवानों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी थी.
दो महीने से भी अधिक समय तक चले इस युद्ध में भारतीय सेना के वीर सपूतों न...

उत्तराखंड के अमर क्रातिकारी शहीद श्री देवसुमन
क्रातिकारी अमर शहीद श्री देवसुमन की पुण्यतिथि (25 जुलाई) पर विशेषडॉ. मोहन चन्द तिवारी“मां के पदों में सुमन सा
रख दूं समर्पण शीश को”
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों के लेखक और जन्मभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी, क्रातिकारी जननायक, अमर शहीद श्री देव सुमन जी का आज बलिदान दिवस है. श्री देव सुमन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वे अमर शहीद हैं जिन्होंने न केवल अंग्रेजों का विरोध किया बल्कि टिहरी गढ़वाल रियासत के राजा की प्रजा विरोधी नीतियों का विरोध करते हुए सत्याग्रह और अनशन द्वारा अपने प्राण त्याग दिए. श्री देव सुमन जी की पूरी राजनीति महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्य के सिद्धांतों से प्रभावित थी.“मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि मैं जहां अपने भारत देश के लिए पूर्ण स्वाधीनता के ध्येय में विश्वास करता हूं और मैं चाहता हूं कि महराजा की छत्रछाय...

