Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
कुमाऊंनी होली संग, झूमता बसंत

कुमाऊंनी होली संग, झूमता बसंत

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. पुष्पलता भट्ट 'पुष्प'हिमालय  के प्रांगण में स्थित, देवताओ की अवतार स्थली ,ऋषि मुनियों की तपोभूमि  उत्तराखंड अपने नैसर्गिक सौंदर्य के लिए विश्व भर में जाना जाता है. अभाव,कठोर परिश्रम,संघर्ष  में भी वहां के  लोग अपने लिए खुशियों के पल जुटा ही लेते हैं. जीवन यापन का प्रमुख साधन खेती होने के कारण  वहां तीज- त्योहार,  मेले- उत्सव सभी  कृषि से जुड़े होते हैं. होली ऐसा ही एक परम्परागत त्योहार है,  जो वहां के संघर्ष भरे जीवन में नव उमंग व नव उत्साह लेकर आता है. उत्तराखंड में बसंत पंचमी (इसे माघ शुक्ल पंचमी भी कहते हैं ) से शीत ऋतु की समाप्ति  मानी जाती है. पूरी धरती प्योली, बुराँस, दुदभाति, दाड़िम,सरसों के पुष्पों का पिछौड़ा (चूनर) ओढ़ दुल्हन सी इठलाती है. नई फसल कटकर खलिहानों से घर आती है. और अगली फसल के लिए खेतों में बुआई का काम शुरू हो जाता है. प्रकृति नाचती है, तो मन भी नाचता है....
पाती प्रेम की

पाती प्रेम की

कविताएं
यामिनी नयन गुप्ताइतिहास के पन्नों में जाकर कालातीत होने को अभिशप्त हो गई परीपाटी चिट्ठियों की वह सुनहरा दौर, डाकिए का इंतजार साइकिल की घंटी डाक लाया का शोर, अब नजर नहीं आतीं लाल रंग की पत्र पेटियां प्रियतम की पाती का दौर;बूढ़ी आंखों की प्रतीक्षा कुशलक्षेम का समाचार, गौने की राह तकती नवयुवती का इंतजार आपसी संवाद का जरिया, संदेशे प्रेम के खलिहानों का दौर;सुदूर कंक्रीट के शहरों में जा बसे बेटे का खत… फक्त कागज का पुर्जा ना था, पुरानी चिट्ठियों को उलट-पलटकर बार-बार पढ़ने का सुख, रोजी-रोटी की टोह में सब हो गई बातें बीते समय की धैर्य मानो गया है चुक;अब नहीं भाता किसी को इंतजार प्रतीक्षा प्रत्युत्तर की, कभी समय मिले तो लगाओ हिसाब तकनीक ने कितना लिया और क्या दिया, चिट्ठियों के जरिए बांटा गया अपनापन रिश्तो को सहेजने-सवांरने का ढंग अब कभी लौटकर नहीं आयेंग...
अपेक्षा/उपेक्षा

अपेक्षा/उपेक्षा

कविताएं
निमिषा सिंघलअपेक्षाएं पांव फैलाती हैं... जमाती हैं अधिकार, दुखों की जननी का हैं एक अनोखा.... संसार।जब नहीं प्राप्त कर पाती सम्मान, बढ़ जाता है क्रोध... आरम्पार, दुख कहकर नहीं आता.. बस आ जाता है पांव पसार।उलझी हुई रस्सी सी अपेक्षाएं खुद में उलझ.. सिरा गुमा देती हैं।भरी नहीं इच्छाओं की गगरी.... तो मुंह को आने लगता है दम।भरने लगी  गगरी... उपेक्षाओं के पत्थरों से, जल्दी ही भर  भी गईं.. पर रिक्तता बाकी रही...।मन का भी हाल  कुछ ऐसा ही है स्नेह की नम मिट्टी..  पूर्णता बनाए रखती हैं, उपेक्षाएं रिक्त स्थान छोड़ जाती हैं। (लेखिका मूलत: आगरा उत्तर प्रदेश से हैं तथा कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित एवं ‘सर्वश्रेष्ठ सदस्य एवं सर्वश्रेष्ठ कवि सम्मान’ सावन.इन (अक्टूबर-2019, जनवरी-2020) जैसे कई सम्‍मानों से सम्‍मानित हैं)...
होली के रंग…

होली के रंग…

कविताएं
होली पर की कल्याण सिंह चौहान दो कविताएं  1. होली के रंग रंग ले रंग ले, तन रंग ले, तन रंग ले, तु मन रंग ले, होली के रंग रंग ले।। रंग ले रंग ले.... रंग ले रंग ले, दुनिया के रंग ले रंग ले, रंग ले रंग ले, दुनिया अपने रंग रंग ले, रंग ले रंग ले, तु प्यार के रंग रंग ले।। रंग ले रंग ले.... रंग ले रंग ले, मैं मैं ना रहे, रंग ले रंग ले,  तू तू ना रहे, सच्चा रंग रंग ले, तू पक्का रंग रंग ले।। रंग ले रंग ले..... रंग ले रंग ले, तू कान्हा के रंग रंग ले, रंग ले रंग ले, तू श्यामा के रंग रंग ले, ऐसा रंग ले, कि रंग छूटे ना, होली के रंग रंग ले, रंग ले रंग ले.....।। **********************************2. होली है   ऐगी होली फागै की, भाईचारा प्यार की। छोली जाली मठ्ठा बल, छोली जाली मठ्ठा। पंचैती चौक, होली खेलणू, सरू गौं कठ्ठा। ऐगी होली फागै की, भाईचारा प्यार की।। होली है स रा रा रंग उडणू, ...
कोरोना की छाया में होली की आहट

कोरोना की छाया में होली की आहट

लोक पर्व-त्योहार
प्रो. गिरीश्वर मिश्रइस बार टंड और ठिठुरन का मौसम कुछ लंबा ही खिंच गया. पहाड़ों पर होती अच्छी बर्फवारी के चलते मैदानी इलाके की हवा रह-रह कर गलाने वाली होने लगी थी. बीच में कई दिन ऐसे भी आए जब सूर्यदेव भी कम दिखे और सिहरन कुछ ज्यादा बढ़ गई. पर ठिठुरन बाहर से अधिक अन्दर की भी थी. because सौ साल में कभी ऐसी उठापटक न हुई थी  जैसी करोना महामारी के चलते हुई, सब कुछ बेतरतीब और ठप सा होने लगा. एक लंबा खिचा दु : स्वप्न जीवन की सच्चाई बन रहा था. सांस लेने पर बंदिश और स्पर्श करने से संक्रमण के महाभय के  अज्ञात प्रसार की चिंता  से सभी विचलित  और  सकते में  आ चुके  थे. सभी तरह के भेदों  से ऊपर उठ कर संसार के अधिकाँश देश एक-एक कर कोरोना की चपेट में आते गए. इस यातना की महा गाथा में स्कूल, कालेज, आफिस, फैक्ट्री हर कहीं बाधा, व्यवधान और पीड़ा का विस्तार होता गया .करोना'होली है भाई होली है' because ...
चिपको: खेतिहर देश में खेल नहीं खेत जरुरी  हैं…

चिपको: खेतिहर देश में खेल नहीं खेत जरुरी  हैं…

पर्यावरण
प्रकाश उप्रेती चिपको आंदोलन कुछ युवकों द्वारा ‘दशौली ग्राम स्वराज्य संघ’ बनाने की कहानी से शुरू होता है. चिपको के दस साल पहले कुछ पहाड़ी नौजवानों ने चमोली जिले के मुख्यालय गोपेश्वर में ‘दशौली ग्राम स्वराज्य संघ’ बनाया. जिसका मकसद था वनों के नजदीक रहने वाले लोगों को वन सम्पदा के माध्यम से सम्मानजनक रोजगार और जंगल की लकड़ियों से खेती-बाड़ी के औज़ार बनाना . यह गाँव में एक प्रयोग के बतौर था . 1972 -73 के लिए उत्तर प्रदेश के वन विभाग ने संस्था के काष्ठ कला केंद्र को अंगू के पेड़ देने से इनकार कर दिया . गाँव वाले इस हल्की और मजबूत लकड़ी से खेती-बाड़ी के औज़ार और हल बनाते थे  गाँव के लोगों को इससे कोई शिकायत नहीं थी कि अंगू के पेड़ से खेलों का सामान बने . वो तो केवल इतना चाहते थे कि “पहले खेत की जरूरतें पूरी की जाएँ because और फिर खेल की. एक खेतिहर देश में यह माँग  नाजायज़ भी नहीं थी”[1] लेकिन सरकार को...
लोक के रंग में रंगी कुमाऊं की होलियां

लोक के रंग में रंगी कुमाऊं की होलियां

लोक पर्व-त्योहार
चन्द्रशेखर तिवारीउत्तराखण्ड के अनेक पर्व व त्यौहारों ने स्थानीय गीत, नृत्य, गायन और संगीत को जन्म देकर यहां की सांस्कृतिक परम्परा को समृद्ध करने का कार्य किया है. यहां के पर्व त्यौहारों में धर्म, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम तो दिखायी ही देता है साथ ही साथ इनमें सामूहिक सहभागिता, लोक जीवन की सुखद कामना और प्रकृति के साहचर्य में रहते हुए उसके प्रति संरक्षण की भावना भी परोक्ष तौर पर परिलक्षित होती है. उत्तराखण्ड खासकर कुमाऊं अंचल में मनाई जाने वाली होली भी कुछ ऐसी विशिष्टताओं के लिए जानी जाती है. शिशिर ऋतु के अवसान होते ही सम्पूर्ण पहाड़ में बसंत की सुगबुगाहट होने लगती है. ऊंचे शिखरों में खिले लाल बुरांश के फूल पहाड़ के लोगों को बसन्त आगमन की सूचना देने लगते हैं. गुलाबी ठण्डी बयार में सीढ़ीदार खेतों में फूली सरसों इठलाने लगती है. आंगन के आस-पास खडे़ आडू-खुबानी व पंय्या के पेड़ जहां सफेद...
उत्तराखण्ड में कण्डाली की खेती हो सकती है रोजगार का सशक्त साधन

उत्तराखण्ड में कण्डाली की खेती हो सकती है रोजगार का सशक्त साधन

अभिनव पहल
लेख एवं शोध जे.पी. मैठाणीउत्तराखण्ड में प्रमुखतः दो प्रकार की कण्डाली पाई जाती है, 400 मीटर से 1400 मीटर तक की ऊँचाई तक उगने वाली सामान्य कण्डाली जिसे बिच्छू घास या बिच्छू बूटी भी कहते हैं। because डांस कण्डाली का वानस्पतिक नाम Girardinia heterophylla जिरार्डिनिया हैट्रोफाइला या Girardinia diversifolia जिरार्डिनिया डाइवर्सिफोलिया है। जबकि सामान्य कण्डाली का वानस्पतिक नाम Dioca urtica डायोका because अर्टिका है। कण्डाली की कोमल पत्तियों और शीर्ष वाले भाग को जिन पर तेज चुभने वाले कांटे होते हैं। और शरीर पर लगने से बेहद जलन होती है। इसका प्रयोग उत्तराखण्ड में सब्जी, काफली बनाने में किया जाता है। (यह आयरन का प्रमुख स्रोत है।)यही नहीं कोरोना लॉकडाउन के दौरान कण्डाली because चाय के निर्माण और प्रयोग पर कई अभिनव प्रयास पूरे प्रदेश में हुए हैं और सामान्य कण्डाली रोजगार का अच्छा साधन बनक...
आई लव स्पैरो- मुझे गौरेयों से प्यार है

आई लव स्पैरो- मुझे गौरेयों से प्यार है

पर्यावरण
विश्व गौरेया दिवस पर विशेषअनीता मैठाणीएक सयानी गौरेया- हमारी चीं-चीं, चूं-चूं के बीच आज ये क्या मच-मच लगी है इंसानों की, कि जिसे देखो अपना एंड्राॅयड फोन लिए घर के आगे पीछे घूम रहा है कि कहीं हम दिख भर जाएं क्लिक, क्लिक, क्लिक, और वो सोशल मीडिया में दोस्तों के बीच शेखी बघार कर पोस्ट डाल सके कि ये देखो साहब हम भी ठहरे बड़े वाले प्रकृति प्रेमी, पर्यावरणविद् और गौरेया के पक्षधर। एक दूसरी गौरेया- मुझे लगता है इसमें हमें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, चाहे जो हो इन दशकों में उन्हें कम से कम हमारे अस्तित्व की चिंता तो हुई।एक बेबी गौरेया- हाँ यही मैं भी कह रही हूँ लेने दो उन्हें हमारी फोटू। कौन सा रोज-रोज लेते हैं कोई हमारी फोटू। कहकर छुटकी ढाई सेेंटीमीटर की मुस्कान मुस्कुरा दी। और साथ में एक दूसरा बेबी गौरेया भी अपने पोपले मुंह से खी-खी कर पेट पकड़ कर हंस पड़ा।एक सयाना चिड़ा- कुछ गं...
देश-दुनिया में शायद ही कहीं ऐसा हुआ हो- पंड़ित, क्षत्रीय और शिल्पकार का सफल संयुक्त परिवार

देश-दुनिया में शायद ही कहीं ऐसा हुआ हो- पंड़ित, क्षत्रीय और शिल्पकार का सफल संयुक्त परिवार

टिहरी गढ़वाल
डॉ. अरुण कुकसालउत्तराखण्ड में सामाजिक चेतना के अग्रदूत 'बिहारी लालजी' के 18 मार्च, 2021 को बूढ़ाकेदार आश्रम में निधन  होना एक युग नायक का हमारे सामाजिक जीवन से प्रस्थान करना है.टिहरी गढ़वाल जनपद की भिलंगना घाटी में धर्मगंगा और बालगंगा के संगम पर है बूढ़ाकेदार (पट्टी-थाती कठूड़). समुद्रतल से 1524 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बूढ़ाकेदार so कभी गंगोत्री - केदारनाथ पैदल मार्ग का प्रमुख पड़ाव था. यह क्षेत्र नाथ संप्रदाय से प्रभावित रहा है. ‘गुरु कैलापीर’ इस क्षेत्र का ईष्टदेवता है. यहां बुढाकेदारनाथ, राजराजेश्वरी और बालखिल्येश्वर के प्राचीन मंदिर हैं.टिहरी गढ़वाल यह सर्वमान्य हक़ीक़त है कि जातीय भेदभाव से आज भी हमारा समाज नहीं उभर पाया है.  समय-समय पर जागरूक लोगों ने इसके लिए प्रयास जरूर किए पर कमोवेश आज भी because हमारा समाज इस मुद्दे पर सदियों पूर्व की यथास्थिति में वहीं का वहीं ठिठका हुआ ...