उत्तराखण्ड में कण्डाली की खेती हो सकती है रोजगार का सशक्त साधन

  • लेख एवं शोध जे.पी. मैठाणी

उत्तराखण्ड में प्रमुखतः दो प्रकार की कण्डाली पाई जाती है, 400 मीटर से 1400 मीटर तक की ऊँचाई तक उगने वाली सामान्य कण्डाली जिसे बिच्छू घास या बिच्छू बूटी भी कहते हैं। because डांस कण्डाली का वानस्पतिक नाम Girardinia heterophylla जिरार्डिनिया हैट्रोफाइला या Girardinia diversifolia जिरार्डिनिया डाइवर्सिफोलिया है। जबकि सामान्य कण्डाली का वानस्पतिक नाम Dioca urtica डायोका because अर्टिका है। कण्डाली की कोमल पत्तियों और शीर्ष वाले भाग को जिन पर तेज चुभने वाले कांटे होते हैं। और शरीर पर लगने से बेहद जलन होती है। इसका प्रयोग उत्तराखण्ड में सब्जी, काफली बनाने में किया जाता है। (यह आयरन का प्रमुख स्रोत है।)

डांस कण्डाली

यही नहीं कोरोना लॉकडाउन के दौरान कण्डाली because चाय के निर्माण और प्रयोग पर कई अभिनव प्रयास पूरे प्रदेश में हुए हैं और सामान्य कण्डाली रोजगार का अच्छा साधन बनकर सामने उभर कर आयी है। जबकि दूसरी ओर डांस कण्डाली जिसके डंठलों से इको फाइबर because यानी कण्डाली का रेशा निकलता है इस पर उत्तराखण्ड में कई संस्थायें वर्ष 1996-97 से कार्य कर रही हैं।

हिमालय में पाई जाने so वाली कण्डाली अथवा बिच्छू घास से आगाज फेडेरशन के छात्रों द्वारा निर्मित कपड़ों के उत्पाद

आगाज़ फैडरेशन ने सर्व प्रथम वर्ष 2001 में इस पर कार्य प्रारंभ किया था बाद में वर्ष 2005-2006 में उत्तराखण्ड बांस एवं रेशा विकास परिषद और 2009 से 2012 because तक हिमोत्थान सोसायटी देहरादून के साथ प्राकृतिक रेशा आधारित स्वरोजगार के लिए कार्य किया वर्तमान में संस्था अपनी सहकारिताओं के माध्यम से उत्तराखण्ड बांस एवं रेशा विकास परिषद, हस्ताक्षर ट्रस्ट, चिटकू स्टूडियो पिथौरागढ़, because ई0आर0बी0 टैक्सटाइल ग्वालियर और आई.आई.सी.डी. जयपुर के साथ डांस कण्डाली रेशा आधारित स्वरोजगार के साधनों को विकसित करने के लिए सतत् प्रयास कर रही है।

जुताई

आगाज़ फैडरेशन के अध्यक्ष जेपी मैठाणी अपने सहयोगियों को because कण्डाली से रेशे तैयार करने का प्रशिक्षण देते हुए. सभी फोटो जेपी मैठाणी

डांस कण्डाली या सामान्य कण्डाली को because स्वरोजगार के रूप में बेकार बंजर, कम उपजाऊ और जंगली जानवरों के आतंक वाली जमीन पर आसानी से उगाकर ग्रामीण/किसान प्रति नाली एक वर्ष में 5 से 6 हजार रूपये कमा सकते हैं।

आगाज द्वारा वर्ष 2006 से नेटल टी का-स्वधा ब्रांड के नाम से विपणन कर 16परिवारों को रोजगार दिया गया.

जुताई

कैसे करें कण्डाली की खेती-

कण्डाली के बीज बोते समय ध्यान रखने योग्य बातें-

1. एक नाली भूमि (200 वर्ग मीटर) में 100 ग्राम because कण्डाली का बीज बोया जा सकता है। या 1 नाली में अधिकतम 300 पौध ही होनी चाहिए। (1 ग्राम में डांस कण्डाली के लगभग 200 और सामान्य कण्डाली के 300 से 350 बीज आते हैं।)

2. कण्डाली के बीज सिर्फ 40 प्रतिशत ही जमते हैं। इसमें खोखले बीज बहुत अधिक होते हैं। बीजों को बोने से पहले दो घंटे के लिए हल्के गुनगुने पानी में डुबोकर रखें खाली और बेकार बीज दो घंटे बाद भी पानी के ऊपर तैरते रहेंगे, उनको निकाल कर फेंक दें। उसके बाद पानी निथार दें।

कुछ इस तरह कण्डाली से रेशे निकाल कर कपड़े की बुनाई की जाती है.

3. पानी निथारने के बाद बचे बीजों जो कि सही और because भारी बीज होंगे इन बीजों को बारीक बालू और थोड़ा पानी डालकर अच्छी तरह मिला दें। दूसरी तरफ खेत की जुताई साथ-साथ होनी चाहिए

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4. खेत की जुताई एक बार पर्याप्त है जुताई करने के बाद खेत में पाटा लगाकर जमीन समतल कर दें। वैसे कण्डाली की खेती के लिए समतल अच्छी भूमि होना आवश्यक नहीं है। लेकिन हल्की काली, because पत्तों की खाद वाली मिट्टी में कण्डाली के पौधे झुण्ड में बढ़ते हैं एक ही पौध पर कई डंठल निकल आते हैं। लेखक द्वारा किये गये एक शोध के अनुसार प्रथम वर्ष में एक बीज से उगे एक पौध पर 5 से 6 डंठल हो जाते हैं अगर यह पौधा डंठल काटने के बाद वहीं रहा तो अगले वर्ष इसी पौधे के राइजोम से (डांस कण्डाली के जड़ पर 1 वर्ष के पश्चात आलू की तरह कंद बन जाते हैं। so जो गुच्छों के रूप में होते हैं) 10-12 डंठल निकलकर झाड़ी का रूप ले लेगी। but इसलिए यह माना जाता है कि एक नाली में अधिकतम 300 पौधे ही रखने चाहिए। दूसरी ओर सामान्य कण्डाली की जड़ें बहुत गहरी चली जाती हैं और सामान्य कण्डाली डांस कण्डाली की तुलना में ज्यादा तेजी से फैलती है इसलिए शोध बताते हैं कि एक नाली में सामान्य कण्डाली के 350-400 से अधिक पौधे नहीं होने चाहिए।

उत्तराखंड

5. पाटा लगे खेत में रेक या हैंड हो से ऊपरी so सतह को हल्का भुरभुरा बना दें। फिर रेत मिले बीजों को सावधानीपूर्वक छिड़क दें। उसके प्श्चात पुनः रेक या हैंड हो से बीजों को जमीन में मिला दें। ध्यान रहे बीज आधा इंच से ज्यादा गहरे नहीं जाने चाहिए। वरना बहुत कम बीज जमेंगे।

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6. दोनों प्रकार की कण्डाली को छिड़कवा विधि या so लाइनों में बोया जा सकता है। अगर बीजों को लाईनों में बो रहे हैं तो दो लाईनों के बीच कम से कम डेढ़ फीट की दूरी रखें।

कण्डाली (बिच्छू घास)

7. घने उगे पौधों को जिनकी ऊँचाई 3-4 इंच हो गयी हो but और अभी कांटे न बने हों उनको उखाड़कर पुनः खेत में खाली स्थान पर रोप सकते हैं। रोपण का कार्य बरसात से पहले किया जाना चाहिए।

8. कण्डाली के चुभन से बचने के लिए ग्लव्स का प्रयोग बेहद because जरूरी है। इसके फूलों के परागण से एलर्जी हो सकती है इसलिए मास्क का प्रयोग करें या मुंह पर साफ कपड़ा बांध लें।

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9. वैसे तो कण्डाली की because खेती जीरो मेंटेनेन्स होेती है लेकिन फिर भी लाईनों के मध्य बीज बोने के 30 से 40 दिन के भीतर सड़ी-गली पत्तियां बिखेर देनी चाहिए। ध्यान रखें 30-40 दिन की कण्डाली पर कांटें हो चुके होंगे अतः मोटे कपड़े पहलें या शरीर को ढक कर रखें।

10. डांस कण्डाली के डंठलों को but काटने का सही वक्त अक्टूबर है- रेशे के लिए फूल या बीज बनने से पहले डंठलों को काट लेना चाहिए साथ खेत में किनारे किनारे के कुछ पौधों को बीज बनने के लिए छोड़ देना चाहिए। काटे गये डंठलों से टहनियां और पत्तियां हटाने के बाद डंठलों के so बंडल बनाकर खेत में ही खड़े करके रख देना चाहिए बाद में डिगमिंग यूनिट में डंठलों को भिगाकर या उबालकर डंठलों से रेशा निकाल लिया जाएगा।

11. जबकि सामान्य कण्डाली जिसकी because पत्तियों का प्रयोग सब्जी बनाने या चाय बनाने में प्रयुक्त की जाती हैं उसकी पत्तियां दो माह बाद काटनी प्रारंभ करें।

अधिक जानकारी के लिए व्हाट्सएप्प पर संपर्क करें- 8126653475

ई मेल आईडी-aagaasfederation@gmail.com

(लेखक पहाड़ के सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार एवं पीपलकोटी में आगाजसंस्था से संबंद्ध हैं)

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