
युवा लेखकों से दूर होती हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं पर छलका युवा लेखक का दर्द, दे डाली ये सलाह
Hindi literary magazines: क्या गैंगबाज़ी, अड़ियल रवैये, सुप्रेमेसी और संवादहीनता ने हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं को दोयम दर्जे पर पहुंचा दिया है. उन्हें युवा लेखकों से दूर कर दिया है. हिन्दी साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिकाएं अगर लेखकों को एक-एक साल तक इंतजार करवाये और सालों तक उनके मेल का जवाब तक न दें, तो यह वाकई युवाओं के लिए चिंता का विषय है. इसका मुखरता से विरोध होना चाहिए. एक तरफ बढ़ते डिजिटल प्रभाव के कारण हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाएं वैसे ही सिमट चुकी हैं, ऊपर से रचना भेजने वाले युवाओं को अगर जवाब तक न दें, तो इससे उनका दायरा और सिमटेगा ही. पढ़िये युवा लेखक और पत्रकार ललित फुलारा (Lalit Fulara Pain for Hindi literary magazines) का हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं को लेकर छलका दर्द, जो उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर साझा किया है.एक वक़्त था जब हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रति...









