साहित्यिक-हलचल

युवा लेखक ललित फुलारा की कहानी ‘घिनौड़’ और ‘पहाड़ पर टैंकर’ पर एक विमर्श…

  • अरविंद मालगुड़ी

पिछले दिनों ललित फुलारा की कहानी ‘घिनौड़’ और ‘पहाड़ पर टैंकर’ पढ़ी. इन दोनों ही कहानियों को मैंने छपने से पहले और छपने के बाद एक नहीं, दो-दो बार पढ़ा है. ‘घिनौड़’ (गौरेया) जहां एक वैज्ञानिक सोच वाली मनोवैज्ञानिक कहानी है, वहीं ‘पहाड़ पर टैंकर’ जड़ों से कट चुके उत्तराखंड के नौजवानों को जड़ों की तरफ लौटने की प्रेरणा देनी वाली. ‘घिनौड़’ को लेकर उत्तराखंड के कहानीकार और वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी ने टिप्पणी की ‘कहानी लिखी तो अच्छी है, शिल्प एवं भाषा की दृष्टि से. शुरुआत रोचक है लेकिन अधूरी सी लगी. आखिर कथा पहुँची कहाँ?’

यह बात सही है कि इस कहानी को पढ़ते हुए पाठकों को लगता है कि पिरदा और उनके बच्चे घनु की कहानी को आगे पहुंचाया जा सकता था. पर हो सकता है कि लेखक ने कहानी को वहीं इसलिए छोड़ा हो कि पाठक खुद ही अंदाजा लगा लें कि पिरदा और घनु की जिंदगी में आगे क्या हुआ होगा? पिरदा की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और उसे गौरेया के रूप में अपनी दादी दिखाई देती है और वह बेहोश हो जाता है. बाद में पता चलता है कि औतर ज्यादा पीने से उसको दिमागी बीमारी हो गई है और छवियां दिखने लगी हैं.  दरअसल, पहाड़ के जीवन को करीब से देखने और उसे भोगने वाले जानते हैं कि पहाड़ के लोगो देवी-देवताओं में इतनी आस्था रखते हैं कि बीमारी में भी पहले झाड़-फूंक उसके बाद दवा और डॉक्टर. यही पहाड़ी समाज की हजारों साल पुरानी परंपरा  है.

”पिरदा को भांग की बुरी लत है. चेहरे में मांस कम, गढडे ज्यादा दिखाई देते हैं. शरीर में बस हड्डियां ही बची हैं. फतुई ऐसे झूलती है जैसे काया पर टांग रखी हो. दिनभर बैल और बकरियों के साथ जंगल में घूमते रहते हैं. औतर जेबों में पन्नियों में लपेटकर रखी रहती है. कितनी औतर फूंकते हैं कोई नहीं जानता!” ऐसे पिरदा पहाड़ों के गावों में सार्वभौमिक हैं. नशा इस कदर बढ़ गया है कि कम उम्र के बच्चों की जेब में भी बीड़ी का बंडल रखा हुआ मिलता है. वैसे यह कहानी एक उपन्यास की शक्ल ले सकती है अगर लेखक इसमें अपनी सोच और पहाड़ की परिस्थितियों को विस्तारपूर्वक रखे तो.

पर्यावरण और पहाड़ चेतना की कहानी है पहाड़ पर टैंकर

वहीं लंबी कहानी ‘पहाड़ पर टैंकर’ के केंद्र में पर्यावरण चिंता और पहाड़ चेतना है. साहित्यिक पत्रिका परिकथा में प्रकाशित इस कहानी में बुढ़ी रेवती और दिल्ली में बसे उसके बच्चे हैं. कमर में चोट लगने के बाद दिल्ली इलाज के लिए अपने बेटे के पास आई रेवती जब टैंकरों से पानी भरते हुए देखती है, तो उसे अपने गांव में आए टैंकर की याद आ जाती है और वह अपने पोती रेनू को इसके बारे में बताती है. पर्यावरण में पीएचडी कर रही रेनू यह सुनकर पढ़ाई खत्म होने के बाद गांव जाने और वहां की दशा और दिशा सुधारने की ठान लेती है. इस तरह शहर में पली-बढ़ी और शिक्षित लड़की अपने जड़ों की तरफ लौट आती है और गांव में ही बाखली संस्था खोलती है और आसपास के गांवों के लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत करती है.

रेनू गांव के लोगों से कहती है ‘ हिमालय नहीं रहेगा तो ये पेड़-पोधे, ये जंगल और पहाड़ कुछ भी नहीं रहेंगे. दुनियाभर में 40 फीसदी से भी ज्यादा लोगों के आजीविका से जुड़े हैं ये पहाड़.. और तुम लोगों के भी. पहाड़, जंगल और प्रकृति नहीं रहेगी तो तुम और हम भी नहीं रहेंगे. कभी सोचा इस बारे में. क्या तुम अपने पुरखों की स्मृतियां मिटाना चाहते हो. वैसे भी इन खंडहर मकानों ने पुरखों की यादों को बिसरा दिया है. रो रहे होंगे हमारे पुरखें इनकी हालत देखकर.” रेनू ने सिर्फ अपने पुरखों के खंडहर मकान को संवारती है, बल्कि गांव की महिलाओं को भी शिक्षित और आत्मनिर्भर करती है.

पहाड़ पर टैंकर का एक पैरा देखिये

बड़े-बड़े पत्थरों के बीच इक्का-दुक्का जगह घास अभी भी ऊगी हुई है. जहां- जहां गोबर की लिपाई छूटी है, वहां से चिटियां अंदर- बाहर आ रही हैं. कुछ दिनों पहले ही इस चौथर की सफाई हुई है. गोठ में धुआं लगा है. जब दरवाजा पर लटका जंग खाया ताला खोला गया तो पार धार के बिसन दा ने खोली पर हुक्का फूंकते हुए कहा था, ‘अब तो इस खंडहर में भी जान आ गई ठहरी. सालों बाद किसन दा के घर का दरवाजा खुला ठहरा.’

ललित फुलारा

रेवती सुबह ही पंचायत घर से बड़ी दरी मांगकर ले आई थी जो कई जगह से फटी थी. चौथर में महिलाओं का जमघट लगा हुआ है . गोठ से बड़ी केतली में चाय उबल रही है.. जिसका धुआं आंगन को महका रहा है. रेनू को आमा के साथ गांव आए हफ्ता भर हो गया है. दुबली-पतली काया, लंबी नाक और दाएं-बाएं कान की तरफ के सफेद हो चुके बालों वाली लंबीकद रेनू रानीखेत से लौट आई है. जैसे ही वह टॉर्च थामे आंगन में पहुंची औरतों की फुसफुसाहट शुरू हो गई. बाप रे!! ये लड़की तो डरती भी नहीं है. रात-अधरात कहीं भी टॉर्च थाम खम-खम चल देती है. न भीसौंण का डर और न ही बाघ का. भूमिया देव ने क्या हिम्मत दी है इसे. ये रेनू के पैतृक घर का आंगन है जहां उसे गांव की महिलाओं के साथ बैठक करनी है.

गंगा रेनू के लिए पानी ले आई. धोती के पल्लू से चश्मे को पोछते ही रेनू महिलाओं के बीच जा बैठी. सभी के हाथों में चाय के गिलास हैं. चौथर की दीवार पर गांव के कुछ पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग भी बैठकर बीड़ी फूंक रहे हैं. हिमालय भीतर से खौल रहा है पानी की तरह. गर्म हो गया है बहुत. शिवजी हमसे नाराज हो रहे हैं. क्या तुम लोग चाहते हो कि शिव-पार्वती का वास हिमालय तेजी से पिघले. वो पहाड़ों के पीछे सेफद चमकने वाला हिमालय एक दिन पूरा पिघल जाए! वो हिमालय जिसे सुबह उठते ही तुम लोग हाथ जोड़ते हो, चाहते हो वो नष्ट हो जाए! बादल फटने की घटनाएं क्यों हो रही हैं. कभी बारिश का बिल्कुल न होना और कभी बर्बादी ले आना ये सब क्यों हो रहा है? इसकी वजह पहाड़ और प्रकृति से छेड़छाड़ ही तो है.

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