
गांधी जयंती (2 अक्टूबर, 2026) पर विशेष

प्रो. गिरीश्वर मिश्र
शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा
महात्मा गांधी का स्मरण एक कृतज्ञ राष्ट्र द्वारा राष्ट्रपिता को सम्मान देने मात्र की बात नहीं है, बल्कि आज के बर्बर होते समय की एक खास मानवीय जरूरत भी है। चीजों की अनुपस्थिति या अभाव भी उनके महत्व के ज्ञान का कारण बनता है। आज के दौर में जब धैर्य, सत्य, अहिंसा, करुणा, भाईचारा, सहयोग, पारस्परिकता और विश्वास जैसे शब्द दैनिक जीवन और व्यवहार से बाहर होते जा रहे हैं, तब उनकी जरूरत भी शिद्दत से महसूस हो रही है। ऐसे क्षणों में गांधी प्रासंगिक हो उठते हैं। उनका जीवन मानवीय चेतना के रूपांतरण की एक असाधारण कोशिश के रूप में सभ्य जगत के आधुनिक इतिहास में दर्ज एक मिसाल बन गया है। भारत के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में उनका कर्मठ जीवन और चिंतन आज भी प्रेरित करता है।
दक्षिण अफ्रीका में सत्य के उन्मेष और आत्म-साक्षात्कार के साथ गांधी जी के जीवन में सात्विक संघर्ष की नींव पड़ी। इस संघर्ष का आधार था—अपने देश-काल की चेतना को प्रश्नाकुल दृष्टि से देख पाना। गांधी जी स्वयं से, अपने समाज से, औपनिवेशिक अंग्रेज सरकार से और प्रभुता जमाए बैठी अंग्रेजी सभ्यता से लगातार प्रश्न पूछते रहे। वे सब कुछ जांचते-परखते रहे और अपने लोकधर्मी विवेक से उठ रहे सवालों के जवाब तलाशते रहे। पर वे यहीं नहीं रुकते थे। अपने वैचारिक मंथन से उपजे निष्कर्षों को व्यवहार और आचरण में उतारने की उनकी जिद थी। यह उनकी फितरत या आदत बन गई थी, जिसे वे ‘प्रयोग’ कहते थे। अपने निजी जीवन में खान-पान, स्वास्थ्य और रहन-सहन आदि को लेकर भी वे प्रयोगशील बने रहे। उनके जीवन में प्रश्न उठाने और उनसे टकराने का सिलसिला लगातार चलता रहा।
नस्लवाद और साम्राज्यवाद से यही प्रश्न और टकराव सुदूर दक्षिण अफ्रीका में आठ वर्ष लंबे सत्याग्रह का रूप लेता है। यह अपने ढंग के आरंभिक व्यापक अहिंसात्मक प्रतिरोधों में से एक था। अन्याय के प्रतिकार की इस नई लड़ाई में उन्होंने जन-चेतना जगाने के लिए कई तरह की पहल की। उन्होंने बहुभाषी अखबार निकाला और संवाद की राह बनाई। सामाजिक चेतना जगाने के अनेक कार्य किए। उनका ‘हिन्द स्वराज’ इसी तरह की प्रखर टकराहट का दस्तावेज बना। यह उनका हृदय-संवाद था।
इस पुस्तक में उन्होंने अपनी मातृभाषा में विचार व्यक्त किए। बेहद सीधी और सरल गुजराती में गांधी जी ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि एक समुदाय के रूप में हम कहां खड़े हैं? हम क्या देख रहे हैं? और हमें क्या कुछ नहीं दिख रहा है? वे हमारी दृष्टि के धुंधलके को साफ कर रहे थे, क्योंकि दृष्टि का स्पष्ट होना जरूरी है। यह अकारण नहीं है कि ‘हिन्द स्वराज’ प्रश्नों और उनके उत्तरों के रूप में रचा गया है। इसे कृष्ण और अर्जुन के संवाद की तरह एक संवाद-शृंखला भी कहा जा सकता है।
स्मरणीय है कि उस समय दुनिया में पश्चिमी सभ्यता का लगभग निष्कंटक वर्चस्व स्थापित था। गांधी जी ने निर्भयता के साथ उसकी परीक्षा सार्वजनीन मानवीय धरातल पर की और बड़े कड़े शब्दों में उसकी सीमाओं को स्पष्ट रूप से उजागर किया। उनके अवलोकन में आधारभूत जरूरतों और आत्मिक विकास की दृष्टि से पश्चिमी सभ्यता केवल अधूरी ही नहीं थी, बल्कि जीवन और जगत के प्रतिकूल भी दिखाई देती थी।
दक्षिण अफ्रीका के लंबे प्रवास से भारत लौटने के बाद गांधी जी ने सक्रिय राजनीति में भाग लिया और उसके बाद की कथा से हम सब परिचित हैं। उनकी चिंता के केंद्र में समग्र भारत था। उन्होंने भारत के आर्थिक विकास का प्रश्न उठाया और अपने चिंतन के आधार पर भविष्य का एक नक्शा प्रस्तुत किया। इस सोच में ‘ग्राम स्वराज’, ‘चरखा’ और ‘खादी’ के माध्यम से जनभागीदारी के साथ आर्थिक बदलाव लाने पर बल दिया गया। वे प्रश्न उठाते हैं कि सामर्थ्य का लोकतंत्रीकरण कैसे हो? इसके लिए वे विकेंद्रीकरण की ओर उन्मुख व्यवस्था का उद्घोष कर रहे थे।
इसी तरह ‘बुनियादी तालीम’ भी समग्र शिक्षा के प्रश्न का उत्तर थी। वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा—सभी का भलीभांति ख्याल रख सके। कहा जा सकता है कि गांधी जी के ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ की अवधारणा देश की पूरी जनता की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उसके बहुमुखी कल्याण के प्रश्न का उत्तर थी।
इन सभी नवाचारों में गांधी जी देश में स्थित होकर देश को देश की ही नजर से देखने की कोशिश कर रहे थे। वे अग्रगामी चिंतक थे। जीवन के अंतिम क्षणों तक वे देश के भविष्य के प्रश्न से उलझते रहे। अपने देहावसान से कुछ ही घंटे पहले तैयार किए गए अपने अंतिम मसौदे में उन्होंने कांग्रेस के मौजूदा स्वरूप को समाप्त कर उसे ‘लोक सेवक संघ’ में रूपांतरित करने का प्रस्ताव रखा था। जिस राजनीतिक लड़ाई का उद्देश्य अंग्रेजी राज को समाप्त कर भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराना था, वह स्वराज की लड़ाई का सिर्फ एक अंश थी। सामाजिक, नैतिक और आर्थिक मोर्चों पर लड़ाई अभी बाकी थी और स्वतंत्रता को आधार बनाकर वे उस लड़ाई को जारी रखना चाहते थे।
गांधी जी ने भारत के लिए ‘स्वराज’ का स्वप्न देखा था, जिसमें देश के स्वत्व की प्रतिष्ठा हो। वे देश में सिर्फ राजनीतिक आजादी ही नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आत्मिक स्वायत्तता भी देखना चाहते थे। गांधी जी के सारे संघर्ष और प्रयास प्रश्नों के इसी ताने-बाने में गुंथे हुए थे। उनके आगे के सामाजिक जीवन का एजेंडा ‘हिन्द स्वराज’ अथवा भारतीय स्वशासन की मूल अवधारणा के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। करीब तीस वर्ष बाद, 1938 में, जब ‘हिन्द स्वराज’ का नया संस्करण आने वाला था, तब पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इसमें किसी खास बदलाव की जरूरत नहीं है।
महात्मा गांधी को इस बात का सदा अहसास रहता था कि वे कहां खड़े हैं और उनके लिए देश-काल का परिदृश्य अत्यंत व्यापक था। इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए उन्होंने मानव-सत्य के अच्छे-बुरे विविध रूपों का गहराई से साक्षात्कार किया था। ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ के यथार्थ तथा उनमें निहित शक्ति को उन्होंने भारत के मौलिक चिंतन के अध्ययन से स्वयं अर्जित किया था। वे बाइबिल और कुरान से परिचित थे, पर गीता, उपनिषद, रामायण और लोक-जीवन उनके प्रमुख विचार-स्रोत बने रहे। वस्तुतः विचारों की विविधता को वे स्वाभाविक मानवीय परिघटना के रूप में ग्रहण करते थे और अपने आश्रम में विभिन्न धर्मों की प्रार्थनाओं के पाठ और स्मरण का अभ्यास भी करते थे।
गांधी जी ने देश-काल की प्रवृत्तियों और आगामी परिवर्तनों को पहचानते हुए आगाह भी किया था। उन्होंने सात सामाजिक पापों का उल्लेख किया और उनसे बचने के लिए सावधान किया था—सिद्धांतविहीन राजनीति, श्रम के बिना धन, नैतिकतारहित व्यापार, चरित्रविहीन शिक्षा, विवेकविहीन सुख, मानवताविहीन विज्ञान और त्यागरहित पूजा।
समकालीन जीवन में उभर रही त्रासदियों को देखते हुए इन पर विचार करना और भी आवश्यक हो गया है। ये सभी आज प्रश्न और चुनौती बनकर हमारे सम्मुख उपस्थित हैं। हमने उन्नति और प्रगति की जो राह चुनी, वह हमें दूसरी दिशा में लेती गई। गांधी जी अपने आचरण में आत्म-नियंत्रण, आत्म-सम्मान, नैतिक विकास, आत्मनिर्भरता और आत्मबल के अनेक प्रयोग प्रस्तुत करते रहे। विचारों को कर्म में उतारना उनका बड़ा सरोकार था और इसके लिए उन्हें निजी जीवन में कष्ट भी सहने पड़े।
देश की स्वतंत्रता के नायक के रूप में गांधी जी को आदर देते हुए हमने उन्हें सड़कों, संस्थाओं, नोटों और सिक्कों में सुरक्षित रखने की कोशिश की। यह सब करते हुए कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से मानो अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली गई। इस क्रम में स्मारकों के बीच बसते-बसाते गांधी धीरे-धीरे जीवन और आचरण से ओझल होकर बाहर की वस्तु का आकार लेते गए। गांधी के विचार और कर्म को जीवंत और चेतन बनाए रखने के बजाय हमने उन्हें धीरे-धीरे जड़वत कर दिया।
आज की भयावह बर्बरता हमें उनके बताए रास्ते से भटकने की कहानी सुनाती है। आज जब लोभ और उपभोग पर केंद्रित जीवन की दुर्दांत स्थिति से सारी दुनिया छटपटा रही है, तब जरूरी हो गया है कि हम अपने भ्रमों को तोड़ने की हिम्मत करें। महात्मा गांधी इसके लिए आंखें खोलने वाले गुरु सरीखे हैं।
जरूरी है कि हम उनकी दीक्षा को केवल दोहराते न रहें, बल्कि उसे अपने जीवन और व्यवहार में भी उतारें—स्वदेशी बनें, सत्य बोलें, अहिंसा अपनाएं, अपरिग्रह की राह पर चलें और अंतिम जन को न भूलें। मरीचिका जैसी विकास-यात्रा से हमें ‘यू-टर्न’ ही क्यों न लेना पड़े, आज यह जरूरी हो गया है कि कम-से-कम गांधी-दृष्टि वाले जीवन का एक न्यूनतम कार्यक्रम व्यक्ति और संस्था—दोनों स्तरों पर बनाया और अपनाया जाए।
आज विश्व में भारत के पर्याय बन चुके गांधी को केवल हमारी स्मृति का अतिरिक्त भार बनाकर रखने के बजाय भारतीय जीवन में पुनः प्रतिष्ठित करने की जरूरत है।
