
‘भक्ति की शक्ति’ कहें या ‘शक्ति की भक्ति’?

दिनेश रावत
“आप अपने घर से चावल की केवल एक मुट्ठी लेकर उनके पास जाइए। वे अपना स्यांरू-पासू निकालेंगे और उसी एक मुट्ठी चावल को देखकर आपके भूत, वर्तमान और भविष्य की कुछ तस्वीरें आपके सामने रख देंगे; यूँ कहें कि आपके बारे में बहुत कुछ बताने लगेंगे।”
लोकपूजित एवं प्रतिष्ठित इष्टदेवी माँ रेणुका की दिव्य उपासना, प्रचलित देवपरंपरा और पीढ़ियों से चली आ रही गणत विद्या की साधना—इन तीनों को यदि एक साथ देखें, तो सहज ही एक नाम सामने आता है—श्रद्धेय श्री शक्ति प्रसाद सेमवाल जी।
उन्हें देखते-समझते हुए मन में सहज ही एक प्रश्न उठता है कि इसे ‘भक्ति की शक्ति’ कहें या ‘शक्ति की भक्ति’? शायद दोनों ही अभिव्यक्तियाँ उनके व्यक्तित्व और साधना पर समान रूप से सार्थक बैठती हैं। क्योंकि जहाँ उनकी भक्ति में शक्ति का अनुभव होता है, वहीं उनकी शक्ति का मूल भी भक्ति में ही दिखाई देता है।
माँ रेणुका के दिव्य धाम से सुशोभित और पाँच पांडव देवताओं के देवत्व से दैदीप्यमान रवांई लोकांचल का सुदूरवर्ती सरनोल गाँव अपनी विशिष्ट देवपरंपरा और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। इसी पावन परिवेश में क्षेत्र की आराध्य देवी माँ रेणुका के प्रतिष्ठित पुजारी परिवार में श्री शक्ति प्रसाद सेमवाल जी का जन्म हुआ।

बचपन से ही उन्होंने जिस वातावरण में आँखें खोलीं, वहाँ देव-आस्था और गणत विद्या केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं थीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा थीं। यही संस्कार आगे चलकर उनकी साधना, सेवा और जीवन-दृष्टि का आधार बने।
श्री सेमवाल जी वर्तमान में सरनोल, पुरोला और देहरादून—तीनों स्थानों से आत्मीय रूप से जुड़े हुए हैं। देहरादून के ऋषि विहार स्थित उनका निवास अब महज एक घर नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसे आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका है, जहाँ ज्योतिष और गणत विद्या में आस्था रखने वाले लोग अपनी जिज्ञासाओं और जीवन की उलझनों के समाधान की आशा लेकर पहुँचते हैं।
अपनी आराध्य देवी माँ रेणुका के प्रति उनकी अगाध आस्था का सहज अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोगों की समस्याओं के समाधान, ज्योतिषीय विश्लेषण और गणना से जुड़े जिस सेवा-कार्य को उन्होंने अपनाया, उस केंद्र का नाम भी अपनी आराध्य देवी के नाम पर ‘रेणुका ज्योतिष केन्द्र’ रखा।
परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय
इस ज्योतिष केंद्र की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। एक ओर ज्योतिषीय गणना एवं विश्लेषण के लिए आधुनिक सॉफ्टवेयर से सुसज्जित कंप्यूटर है, तो दूसरी ओर पीढ़ियों से चली आ रही गणत विद्या के पारंपरिक साधन—स्यांरू, पासू और पातरू/पातड़ू—आज भी उनकी पैतृक धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं।
इस संबंध में वे स्वयं बताते हैं कि यह उनके पूर्वजों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती आई एक अनमोल एवं अद्वितीय विरासत है। उनके पूज्य पिता ने अपने जीवन के अंतिम समय में यह अमूल्य धरोहर उन्हें सौंपते हुए उनसे वचन लिया था कि वे इसका उपयोग जनकल्याण के लिए करेंगे।
पिता को दिया गया वह वचन आज उनके लिए केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि जीवन का दायित्व है, जिसका वे पूरी निष्ठा और कुशलता के साथ निर्वहन कर रहे हैं।
उनके पास आने वाले लोग केवल अपना भविष्य जानने की जिज्ञासा लेकर नहीं आते। किसी के मन में पारिवारिक चिंता होती है, कोई आर्थिक परिस्थितियों को लेकर परेशान होता है, कोई व्यवसाय या नौकरी को लेकर आशंकित होता है, तो कोई जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव को समझना चाहता है। वे ऐसे लोगों की बातें धैर्यपूर्वक सुनते हैं और अपनी विद्या, परंपरागत ज्ञान तथा अनुभव के आधार पर उन्हें मार्गदर्शन देने का प्रयास करते हैं।
विद्या से बढ़कर उनका आत्मीय व्यक्तित्व
मेरे लिए उनकी विशेषता केवल इतनी नहीं है कि वे ज्योतिष और गणत विद्या के अच्छे जानकार हैं। इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनका सहज, सरल और आत्मीय व्यक्तित्व है।
आज जब आधुनिकता की दौड़ में अनेक पारंपरिक विधाएँ, लोकज्ञान और पीढ़ियों से संचित अनुभव धीरे-धीरे हमारी स्मृतियों से ओझल होते जा रहे हैं, ऐसे समय में किसी व्यक्ति का अपनी पैतृक विद्या को सहेजकर रखना और उसे आधुनिक साधनों के साथ जोड़ते हुए आगे बढ़ाना निश्चय ही सराहनीय है। श्री सेमवाल जी इसी परंपरा के एक सजग संवाहक हैं।
अपनी बात करूँ तो श्री सेमवाल जी से मेरा संबंध भी किसी औपचारिक परिचय तक सीमित नहीं है। उनके प्रति मन में जो स्नेह, सम्मान और श्रद्धा है, वह उनके आत्मीय व्यक्तित्व से ही उपजा है।

उनसे मिलने की इच्छा तो सदैव बनी रहती है, लेकिन जीवन की तमाम व्यस्तताओं के बीच मिलने-बैठने और संवाद के लिए समय का समन्वय हमेशा एक चुनौती बना रहता है। फिर भी जब संबंध आत्मीय हो और मन में आस्था हो, तो देर-सवेर ही सही, मिलन का अवसर निकल ही आता है।
उनसे मिलना मेरे लिए कोई सामान्य मुलाकात नहीं होती। वह आत्मीयता, आस्था और अपनत्व से भरा एक ऐसा अनुभव होता है, जिसकी स्मृति और ऊर्जा लंबे समय तक मन-मस्तिष्क में बनी रहती है।
इस बार हुई मुलाकात भी कुछ ऐसी ही रही। एक ओर पूरे परिवार द्वारा किए गए आत्मीय आतिथ्य-सत्कार ने मन को भाव-विभोर कर दिया, तो दूसरी ओर श्री सेमवाल जी द्वारा माँ रेणुका के शुभाशीष-स्वरूप ससम्मान भेंट किए गए अंगवस्त्र ने इस मुलाकात को मेरे लिए सदैव की एक सुखद स्मृति बना दिया।
इसी आत्मीय अवसर पर मुझे भी उन्हें अपना ‘रवांल्टी शब्दकोश (हिंदी–रवांल्टी–अंग्रेजी)’ भेंट करने का सौभाग्य मिला।
ईश्वर से यही प्रार्थना…
अंततः अपने आराध्य इष्टदेव श्री रघुनाथ जी एवं माँ रेणुका से मेरी प्रार्थना है कि वे श्री शक्ति प्रसाद सेमवाल जी को सदैव स्वस्थ, प्रसन्न, ऊर्जावान और सक्रिय रखें। उनकी विद्या, अनुभव, साधना और सेवा-भाव से समाज को इसी प्रकार लाभ मिलता रहे तथा पीढ़ियों से चली आ रही यह लोकविद्या आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचती रहे।
विशेष: यदि आप ज्योतिषीय ज्ञान, गणत (गणना) विद्या, पूजा-पाठ तथा आध्यात्मिक एवं लोकपरंपराओं के प्रति श्रद्धा और आस्था रखते हैं, तो श्री शक्ति प्रसाद सेमवाल जी से मुलाकात आपके लिए एक आत्मीय, सार्थक और मंगलमय अनुभव हो सकती है।
