

डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल
विज्ञान शिक्षक
पी एम श्री कमलाराम नौटियाल राजकीय आदर्श इंटर कॉलेज, धौंतरी (उत्तरकाशी)
(राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी भारत द्वारा उत्कृष्ट विज्ञान शिक्षक सम्मान 2022)
सारांश
पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस (Parthenium hysterophorus L.), जिसे सामान्यतः गाजर घास, कांग्रेस घास अथवा सफेद टोपी घास के नाम से जाना जाता है, विश्व की सबसे खतरनाक आक्रामक खरपतवारों में से एक है। यह कृषि, जैव विविधता, पशुधन, मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरण पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। तीव्र वृद्धि, अत्यधिक बीज उत्पादन तथा विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता के कारण यह विश्व के अनेक देशों में तेजी से फैल चुकी है।
यद्यपि इसके दुष्प्रभाव व्यापक हैं, फिर भी हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों ने इसके कुछ संभावित उपयोगों एवं औषधीय गुणों की ओर भी संकेत किया है। प्रस्तुत लेख में पार्थेनियम की उत्पत्ति, वितरण, वनस्पतिक विशेषताएं, दुष्प्रभाव, नियंत्रण के उपाय तथा संभावित उपयोगों का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
परिचय
पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस, एस्टेरेसी (Asteraceae) कुल का एक वार्षिक शाकीय पौधा है। इसका मूल निवास उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका माना जाता है, किंतु वर्तमान में यह एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा प्रशांत क्षेत्र सहित विश्व के अनेक देशों में फैल चुका है।
भारत में इसका पहला रिकॉर्ड वर्ष 1880 में प्राप्त हुआ, जबकि 1950 के दशक के बाद इसे एक गंभीर आक्रामक खरपतवार के रूप में पहचाना गया। आज यह भारत के लगभग सभी राज्यों में पाया जाता है तथा परती भूमि, सड़क एवं रेलवे किनारों, कृषि क्षेत्रों, चरागाहों तथा शहरी क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैला हुआ है।

वनस्पतिक विशेषताएं
पार्थेनियम एक तीव्र गति से बढ़ने वाला बहु-शाखित पौधा है, जिसकी ऊँचाई सामान्यतः 1–1.5 मीटर तथा अनुकूल परिस्थितियों में 2.5 मीटर तक हो सकती है।
इसका जीवन चक्र मुख्यतः दो अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है—
- रोसेट अवस्था (Rosette Stage): प्रारंभिक अवस्था, जिसमें पौधा भूमि के समीप पत्तियों का गुच्छा बनाता है।
- प्रजनन अवस्था (Reproductive Stage): परिपक्व अवस्था, जिसमें पौधा अत्यधिक शाखित होकर बड़ी संख्या में पुष्प उत्पन्न करता है।
इसकी पत्तियाँ गहरे हरे रंग की, मुलायम रोमयुक्त तथा गहराई तक खंडित होती हैं। पुष्प छोटे, सफेद तथा गुच्छों में विकसित होते हैं।
तीव्र प्रसार के प्रमुख कारण
पार्थेनियम की आक्रामकता के पीछे अनेक जैविक विशेषताएँ उत्तरदायी हैं—
- अत्यधिक बीज उत्पादन
एक अकेला पौधा अपने जीवनकाल में लगभग 10,000 से 25,000 तक बीज उत्पन्न कर सकता है। ये बीज लंबे समय तक मिट्टी में जीवित रहते हैं तथा अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित हो जाते हैं।
- तीव्र वृद्धि
अंकुरण के मात्र 4–8 सप्ताह के भीतर ही पौधा पुष्पन प्रारंभ कर देता है।
- प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता
यह सूखा, उच्च तापमान तथा कम पोषक तत्वों वाली भूमि में भी आसानी से विकसित हो जाता है।
- बहुआयामी प्रसार
इसके बीज अनेक माध्यमों से फैलते हैं, जैसे—
- वायु
- जल
- पशु
- वाहन
- कृषि यंत्र
- बाढ़
- दूषित बीज एवं चारा

एलीलोपैथिक (Allelopathic) प्रभाव
पार्थेनियम में पार्थेनिन (Parthenin) सहित अनेक विषैले जैव सक्रिय रसायन पाए जाते हैं।
ये रसायन मृदा में पहुँचकर अन्य पौधों के—
- बीज अंकुरण
- जड़ विकास
- पौध वृद्धि
- प्रकाश संश्लेषण
को बाधित करते हैं। परिणामस्वरूप स्थानीय वनस्पतियाँ धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
पार्थेनियम मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक माना जाता है। विशेष रूप से इसके परागकण एवं पौधे का प्रत्यक्ष संपर्क अनेक एलर्जी संबंधी समस्याएँ उत्पन्न करते हैं।
त्वचा संबंधी समस्याएँ
- एलर्जिक डर्मेटाइटिस
- खुजली
- चकत्ते
- त्वचा में जलन
श्वसन संबंधी समस्याएँ
- अस्थमा
- ब्रोंकाइटिस
- एलर्जिक राइनाइटिस
- श्वसन कष्ट
अन्य प्रभाव
- आँखों में जलन
- बुखार
- सिरदर्द
- प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव
पशुधन पर प्रभाव
यदि पशु पार्थेनियम का सेवन करते हैं, तो निम्न समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं—
- मुख में घाव
- अत्यधिक लार स्राव
- दस्त
- भूख में कमी
- त्वचा रोग
- दूध की गुणवत्ता में गिरावट
कई मामलों में दूध में कड़वाहट भी देखी गई है।

कृषि एवं जैव विविधता पर प्रभाव
पार्थेनियम कृषि उत्पादन तथा प्राकृतिक पारिस्थितिकी दोनों के लिए गंभीर चुनौती है।
इसके कारण—
- फसल उत्पादन में कमी
- चारे की उपलब्धता में गिरावट
- स्थानीय वनस्पतियों का विस्थापन
- जैव विविधता का ह्रास
देखा गया है कि सोयाबीन, मक्का, गेहूँ, धान, मूंग, चना सहित अनेक फसलों की वृद्धि एवं उत्पादकता पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कई क्षेत्रों में इसने स्थानीय पौध समुदायों का लगभग पूर्णतः स्थान ले लिया है।
प्रमुख रासायनिक घटक
पार्थेनियम में अनेक जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
- सेस्क्वीटर्पीन लैक्टोन्स
- पार्थेनिन
- कैफिक अम्ल
- फेरुलिक अम्ल
- क्लोरोजेनिक अम्ल
- फ्लेवोनॉयड्स
- टरपेनॉइड्स
- वाष्पशील तेल
इन्हीं रसायनों के कारण इसके विषैले एवं जैविक प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
पार्थेनियम के संभावित लाभकारी उपयोग
यद्यपि पार्थेनियम एक अत्यंत हानिकारक खरपतवार है, फिर भी वैज्ञानिक अनुसंधानों में इसके कुछ संभावित उपयोग सामने आए हैं।
- कम्पोस्ट निर्माण
फूल आने से पूर्व एकत्रित पौधों से उच्च गुणवत्ता की जैविक खाद तैयार की जा सकती है।
- बायोगैस उत्पादन
इसे बायोगैस संयंत्रों में सहायक जैविक पदार्थ के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
- जैव कीटनाशक
इसके अर्क में कीटनाशी, निमेटोडनाशी तथा कुछ हद तक खरपतवारनाशी गुण पाए गए हैं।
- भारी धातुओं का अवशोषण
यह मृदा एवं जल से कैडमियम तथा निकेल जैसी भारी धातुओं को अवशोषित करने की क्षमता रखता है, जिससे प्रदूषित क्षेत्रों के उपचार (Phytoremediation) में इसकी उपयोगिता की संभावना है।
- औषधीय संभावनाएँ
प्रयोगशाला स्तर के अध्ययनों में इसके अर्क में—
- कैंसररोधी
- मधुमेहरोधी
- सूजनरोधी
- दर्दनाशक
- रोगाणुरोधी
गुणों की सूचना प्राप्त हुई है। हालांकि, इन उपयोगों की पुष्टि हेतु अभी व्यापक नैदानिक एवं वैज्ञानिक अनुसंधान अपेक्षित हैं।
पार्थेनियम नियंत्रण के उपाय
भौतिक नियंत्रण
- फूल आने से पूर्व पौधों को उखाड़ना
- नियमित निराई-गुड़ाई
- प्रभावित क्षेत्रों की सतत निगरानी
रासायनिक नियंत्रण
आवश्यकतानुसार निम्न शाकनाशियों का उपयोग किया जा सकता है—
- 2,4-D
- ग्लाइफोसेट
- एट्राजीन
- मेट्रिब्यूजिन
जैविक नियंत्रण
जैव नियंत्रण के लिए निम्न जीव प्रभावी पाए गए हैं—
- Zygogramma bicolorata (पत्ती भृंग)
- Epiblema strenuana (स्टेम गॉल मॉथ)
प्रतिस्पर्धी पौधों का उपयोग
कुछ पौधे पार्थेनियम की वृद्धि को प्रभावी रूप से दबाते हैं—
- Cassia tora
- Tagetes spp. (गेंदा)
- Stylosanthes spp.
- Tephrosia purpurea
निष्कर्ष
पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस एक अत्यंत आक्रामक एवं हानिकारक खरपतवार है, जो कृषि, पर्यावरण, जैव विविधता तथा मानव एवं पशु स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है। इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए भौतिक, रासायनिक, जैविक तथा सामुदायिक उपायों पर आधारित समन्वित खरपतवार प्रबंधन (Integrated Weed Management) अपनाना आवश्यक है।
साथ ही, कम्पोस्ट, जैव कीटनाशक, बायोगैस तथा फाइटोरिमेडिएशन जैसे क्षेत्रों में इसके संभावित उपयोगों पर वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि इस गंभीर समस्या को आंशिक रूप से उपयोगी संसाधन में परिवर्तित किया जा सके। हालांकि, इसके औषधीय उपयोगों को अभी प्रारंभिक शोध तक सीमित माना जाना चाहिए और इन्हें चिकित्सीय रूप से स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
