भेड़-बकरी पालन से आत्मनिर्भर बन रहे पहाड़ के गांव, महिलाओं की बढ़ी भागीदारी

Bhed Palak in Uttarakhand

पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका की रीढ़ बना भेड़-बकरी पालन, हजारों परिवारों को मिल रहा सहारा

  • नीरज उत्तराखंडी, पुरोला

पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की सीमित जमीन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और रोजगार के सीमित अवसरों के बीच भेड़-बकरी पालन पहाड़ की आर्थिकी और आजीविका की मजबूत रीढ़ बनकर उभरा है. सर बड़ियार क्षेत्र के दुर्गम गांवों में हजारों परिवार इस पारंपरिक व्यवसाय से सीधे जुड़े हुए हैं.

आय और आत्मनिर्भरता का आधार

विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ में छोटे और सीमांत किसानों के लिए भेड़-बकरी पालन कम लागत और शीघ्र आमदनी देने वाला व्यवसाय है.

  • बकरी का दूध, मांस और खाद स्थानीय बाजार में आसानी से बिक जाते हैं.
  • भेड़ों से ऊन का उत्पादन होता है, जो हस्तशिल्प और वस्त्र उद्योग में उपयोगी है.
  • प्राकृतिक चरागाहों की उपलब्धता से चारे की लागत अपेक्षाकृत कम रहती है.
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पशुपालन की मुख्य जिम्मेदारी निभा रही हैं. स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वे संगठित होकर नस्ल सुधार, टीकाकरण और विपणन के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं. इससे परिवारों की आय में 20–30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है.

Neeraj Uttarakhandi

पारंपरिक से आधुनिकता की ओर

हिमालयी क्षेत्रों में गद्दी और भोटिया समुदाय पीढ़ियों से इस पेशे से जुड़े रहे हैं. अब सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत उन्नत नस्ल, पशु चिकित्सा शिविर और बीमा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं.
राष्ट्रीय पशुधन मिशन के अंतर्गत चारा विकास, नस्ल सुधार और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से पशुपालकों को तकनीकी सहयोग मिल रहा है.

चुनौतियां भी कम नहीं
  • जंगली जानवरों का बढ़ता खतरा
  • ऊन के घटते दाम
  • युवाओं का पलायन
  • जलवायु परिवर्तन से चरागाहों पर प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विपणन, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो पहाड़ी ऊन और ऑर्गेनिक मांस को राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर बाजार मिल सकता है.

भविष्य की संभावनाएं

पर्वतीय राज्यों में पशुपालन आधारित सूक्ष्म उद्योग, ऊन प्रसंस्करण इकाइयां और डेयरी सहकारी समितियां रोजगार के नए अवसर खोल सकती हैं. स्थानीय नस्लों के संरक्षण और जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग से यह क्षेत्र आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम साबित हो सकता है.

भेड़-बकरी पालन केवल एक पारंपरिक पेशा नहीं, बल्कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था का सशक्त स्तंभ है. उचित नीतिगत समर्थन और सुदृढ़ बाजार व्यवस्था मिलने पर यह क्षेत्र ग्रामीण समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है.

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