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यमुना घाटी: जल संस्कृति की अनूठी परम्परा

यमुना घाटी: जल संस्कृति की अनूठी परम्परा

यमुना—टौंस घाटी की अपनी एक जल संस्कृति है. यहां लोग स्रोतों से निकलने वाले पानी को देवताओं की देन मानते है. इन नदी—घाटियों में जल स्रोतों के कई कुंड स्थापित हैं.​ विभिन्न गांवों में उपस्थित इन पानी के कुंडों की अपनी—अपनी कहानी है. इस घाटी के लोग इन कुंडों से निकलने वाले जल को बहुत ही पवित्रत मानते हैं और उनकी बखूबी देखरेख करते हैं. जल संस्कृति में आज हम ऐसे ही कुंडों से आपको रू—ब—रू करवा रहे हैं. यमुना घाटी के ऐसे ही कुछ जल कुंडों बारे में बता रहे हैं वरिष्ठ प​त्रकार प्रेम पंचोली

जल संस्कृति भाग—2

कमलेश्वर महादेव मंदिर में जलधारा

कमलेश्वर महादेव
कमलेश्वर नामक स्थान का इस क्षेत्र में बड़ा महत्व है लोग शिवरात्री के दिन उक्त स्थान पर व्रत पूजने पंहुचते है श्रद्धालुओं का इतना अटूट विश्वास होता है कि यहां नंगे पांव पंहुचते है जबकि इस स्थान पर जाने के लिए तीन किमी पैदल मार्ग है. यहां पानी के दो धारे है तथा एक कुण्ड भी है जो नकासीदार पत्थरों से बना है. यही कमलेश्वर महादेव मन्दिर है. यहां इतना पानी निकलता है कि जो आगे चलकर कमल नदी के रूप में प्रवाहित होती है. इस पानी से हजारों एकड़ कृषि भूमी सिंचित होती है, यही वजह है कि इस क्षेत्र में धान की फसल भारी मात्रा में होती है.

कमलेश्वर महादेव मंदिर

जनश्रुति है कि जब पाण्डव कैलाश जा रहे थे तो उन्होने कुछ समय कमलेश्वर में बिताया था. पाण्डवकालीन सभ्यता का प्रतीक यह स्थान लोगों का विशिष्ठ धार्मिक स्थल है. इस पानी की धारा ने अब तक अपना वेग संतुलित रखा है. यह जल धारा यमुनाघाटी के निवासियों की जीवनरेखा भी है. इसी जल धारा के कारण कमलसिराई व रामा सिंराई पट्टीयों के लोगों की आजीविका सुरक्षित है. यही तो! पलायन नाम की यहां कोई गुंजाईश ही नहीं है. बजाय इस क्षेत्र में बहुतायत में लोग अन्य जगहो से आकर बस गये हैं.

सहस्रबाहु कुण्ड, बड़कोट उत्तरकाशी

सहस्रबाहु कुण्ड
यह कुण्ड उत्तरकाशी जनपद के बड़कोट नगर पंचायत बाजार के बीचों बीच में है. यह पहले जमीदोज हो रखा था. सन्1997 में स्थानीय बौखनाग देवता ने इस स्थान को खुदवाया और यह कुण्ड प्राप्त हुआ. किन्तु पुरातत्व विभाग ने दिलचस्पी नही दिखाई. कहा जाता है कि इस कुण्ड को सहस्रबाहु ने बनवाया था. इस स्थल की सुन्दरता अद्भुत है. पुराणों में बड़कोट ही सहस्रबाहु का गढ़ बताया जाता है. जिसका ऐतिहासिक महत्व भी है. स्थानीय लोगो ने बताया कि जब यह कुण्ड प्राप्त हुआ और इसकी सफाई हुई तो यह पानी से भर गया था. परन्तु बाद में इस कुण्ड का सौन्दर्यकरण हुआ और इसके बाहर सीमेन्ट भी लगवाया. इसके बाद कुण्ड का पानी धीरे-धीरे सूखने लगा. वर्तमान में यह बिना पानी का कुण्ड है.

(नोट—आलेख को प्रकाशन से पूर्व लेखक/प्रकाशक की अनुमति लेनी आवश्यक होगी, यह कॉपीराइट के अन्तर्गत है. )
(लेखक सी.सुब्रमण्यम राष्ट्रीय मीडिया अवॉर्ड—2016 द्वारा सम्मानित हैं)

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