
- नीरज उत्तराखंडी, पुरोला/मोरी
उत्तरकाशी जिले के मोरी विकासखंड के दूरस्थ पर्वतीय गांव इन दिनों सदियों पुरानी लोक परंपरा ऊन कटाई पर्व के उल्लास में डूबे हुए हैं। देवक्यारा बुग्याल सहित ऊंचाई वाले चरागाहों में करीब तीन माह तक भेड़-बकरियों और मवेशियों को चराने के बाद अगस्त-सितंबर में भेड़पालकों यानी स्थानीय बोली में ‘भेड़ाल’ की गांवों में वापसी शुरू हो गई है। पशुधन के साथ गांव लौटते भेड़ालों के स्वागत को लेकर ग्रामीणों में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है।
तीन माह बाद घर लौटता है पशुधन, शुरू होती है पर्व की रौनक
गर्मियों की शुरुआत के साथ मोरी क्षेत्र के कई गांवों से भेड़पालक अपने पशुधन को लेकर ऊंचे बुग्यालों और पारंपरिक चरागाहों की ओर निकल जाते हैं। देवक्यारा कुयाल और आसपास के बुग्यालों में करीब तीन माह तक भेड़-बकरियों एवं अन्य मवेशियों को चराने के बाद अब उनकी वापसी शुरू हो गई है।
भेड़ालों की वापसी केवल पशुधन के गांव लौटने का अवसर नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले लेती है। इसी अवसर पर गांवों में ऊन कटाई पर्व मनाया जाता है।
कुलदेवता की पूजा से शुरू होती है सुरक्षित वापसी की खुशी
ऊन कटाई पर्व का मुख्य संबंध भेड़ों की ऊन कटाई से है, लेकिन इसका सांस्कृतिक स्वरूप कहीं अधिक व्यापक है। ग्रामीण अपने कुलदेवता सिद्धवा रमोला की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं और बुग्यालों में पशुधन की सुरक्षित चराई तथा सकुशल गांव वापसी के लिए देवता का आभार जताते हैं।

ग्रामीणों का विश्वास है कि देवभूमि के ऊंचे बुग्यालों में पशुधन की रक्षा और भेड़ालों की सुरक्षित वापसी में देव आशीर्वाद की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसलिए पर्व में धार्मिक आस्था और पशुपालन परंपरा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
हर परिवार की होती है भागीदारी
भेड़ालों के स्वागत में गांव का लगभग हर परिवार अपनी भागीदारी निभाता है। ग्रामीण पारंपरिक रूप से आटे की परात, घी, मक्खन, तेल और काखड़ी लेकर पहुंचते हैं। एकत्रित सामग्री का हिस्सा भेड़ालों, ध्यानटुड़ियों तथा पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने वाले बजगियों को सम्मान स्वरूप दिया जाता है।
यह परंपरा केवल भोजन और सामग्री के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज में सामूहिक सहयोग, आपसी भाईचारे और सम्मान की भावना को भी मजबूत करती है।
तीन दिन चलता है सामूहिक भोज ‘दोफारी’
ऊन कटाई पर्व के दौरान करीब तीन दिन तक चलने वाला सामूहिक भोज ‘दोफारी’ विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। इसमें गांव के बुजुर्गों के साथ युवा भी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।
सामूहिक भोज के दौरान ग्रामीण एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं और वर्षों पुरानी लोक परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं। आधुनिक जीवनशैली और तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश के बीच दोफारी जैसी परंपराएं ग्रामीण समुदाय की सामूहिकता को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
रात का मेला और तांदी-चोपती नृत्य बढ़ाते हैं पर्व की रंगत
पर्व की सबसे खास झलक रात में लगने वाले मेले में देखने को मिलती है। ढोल-दमाऊं की थाप के बीच ग्रामीण पारंपरिक तांदी और चोपती नृत्य करते हैं। गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से गांव की लोक संस्कृति रातभर जीवंत रहती है।
बच्चों और युवाओं के लिए यह आयोजन विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। बुजुर्ग जहां परंपरागत गीतों और नृत्य की विरासत को आगे बढ़ाते हैं, वहीं युवा पीढ़ी उसमें भाग लेकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ती है।
पशुपालन से संस्कृति तक जुड़ा है पर्व
सामाजिक कार्यकर्ता किशन सिंह रावत के अनुसार ऊन कटाई पर्व केवल भेड़ों की ऊन काटने से जुड़ा आयोजन नहीं है, बल्कि यह मोरी क्षेत्र की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। यह पर्व पशुपालन, आस्था, सामूहिक सहयोग और लोक संस्कृति का जीवंत प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। बदलते समय में जब पारंपरिक पशुपालन और लोक संस्कृति के सामने कई चुनौतियां हैं, तब ऊन कटाई जैसे पर्व अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने का संदेश देते हैं।
लोक संस्कृति के संरक्षण की जरूरत
मोरी के दुर्गम पर्वतीय गांवों में सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी ग्रामीण जीवन की धड़कन बनी हुई है। बुग्यालों में पशुपालन, भेड़ालों की वापसी, कुलदेवता की पूजा, सामूहिक भोज, ढोल-दमाऊं और तांदी-चोपती—इन सभी परंपराओं का एक साथ दिखाई देना इस पर्व को विशिष्ट बनाता है।
विशेषज्ञों और ग्रामीणों का मानना है कि ऐसी लोक परंपराओं को केवल उत्सव तक सीमित न रखकर इनके दस्तावेजीकरण, संरक्षण और नई पीढ़ी तक हस्तांतरण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। ऊन कटाई पर्व मोरी की सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ हिमालयी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक पशुपालन की कहानी भी कहता है।
देवक्यारा के बुग्यालों से लौटते पशुधन के साथ गांवों में फिर से गूंजती ढोल-दमाऊं की थाप इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के बीच भी पहाड़ अपनी लोक जड़ों और सदियों पुरानी सामूहिक परंपराओं को आज तक संजोए हुए है।
