October 22, 2020
समाज/संस्कृति

उत्तराखंड हिमालय के जलस्रोतों से अनुप्रेरित वैदिक सभ्यता के आदिस्रोत

भारत की जल संस्कृति-2

  • डॉ० मोहन चन्द तिवारी

“या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति
विधिहुतं या हविर्या च होत्री,
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा
या स्थिता व्याप्य विश्धम्.
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति
यया प्राणिनः प्राणवन्तः,
प्रत्यक्षाभिः प्रसन्नस्तनुभिरवतु
वस्ताभिरष्टाभिरीशः ॥”
   -‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’,1.1

आज ‘अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस’ है. महाकवि कालिदास के विश्व प्रसिद्ध नाटक ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में आए उपर्युक्त अष्टमूर्ति शिव की वंदना से ही मैं अपनी पर्यावरण के मुख्य तत्त्व जल की चर्चा प्रारम्भ करता हूं.महाकवि  कालिदास ने  ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ के इस नांदीश्लोक में शिव की जिन आठ मूर्तियों की वंदना से अपने नाटक का प्रारम्भ किया है,उनके नाम हैं- जल, अग्नि, यजमान, सूर्य, चंद्रमा, वायु, आकाश और पृथ्वी.इनमें भी सबसे पहली मूर्ति जलरूपा ‘आद्यासृष्टि’ है. सृष्टिविज्ञान की दृष्टि से भी ‘जल’ पर्यावरण संतुलन का मुख्य तत्त्व है,क्योंकि सबसे पहले सृष्टि में जल ही विद्यमान था और प्रलय के बाद भी जल ही शेष बचता है.इसलिए जल को सृष्टि का आदिबीज कहा जाता है,उसके बाद ही पृथ्वी, आकाश, वायु आदि का निर्माण हुआ था.

आध्यात्मिक धरातल पर भगवान् शिव की जलरूपी आदिमूर्ति का एक अर्थ आदिशक्ति पार्वती भी है.शाक्त परम्परा मानती है कि जगदम्बा दुर्गा के नौ रूपों में आदिशक्ति का पहला रूप ‘शैलपुत्री’ पार्वती का ही है,जो कैलास पति शिव की अर्द्धांगिनी भी हैं.यानी सम्पूर्ण संसार की सृष्टि के कर्त्ता-धर्ता शिव और पार्वती हैं, जिनकी कालिदास ने जगत के माता पिता (जगतः पितरौ )के रूप में वंदना की है.मूल रूप से ये दोनों आराध्य देवशक्तियां शिव और पार्वती हिमालयवासी हैं और कैलास पर्वत उनका मुख्य लीलाधाम है. यानी भारतीय परंपरा के अनुसार शिव और पार्वती के संयोग से ही इस सृष्टि के सर्जन,पालन और संहार आदि की जितनी भी लीलाएं रची जाती हैं,उनका केंद्र स्थान हिमालय ही है.

विश्व सभ्यता का इतिहास भी बताता है कि जब से मनुष्य का इस धरती पर पदार्पण हुआ है, जल ही उसके भरण-पोषण और आर्थिक प्रगति का अनिवार्य तत्त्व रहा है. विश्व की तमाम प्राचीन सभ्यताएं चाहे वह नील घाटी की सभ्यता हो या सिन्धु-सरस्वती या गंगा-यमुना की घाटी की सभ्यता,नदियों के तटों पर ही विकसित हुई हैं.

पर विश्व में शिव और शक्ति से अनुप्रेरित भारतीय सभ्यता ही एकमात्र ऐसी सभ्यता है,जिसे ‘नदीमातृक’ सभ्यता के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह सभ्यता नदियों की मातृभाव से आराधना करती है. इसलिए विश्व में भारत की ‘मदर इंडिया’ के रूप में भी पहचान बनी है.भारत की परम्परा रही है कि चाहे नवरात्र पूजन हो या कोई वैवाहिक अनुष्ठान घर में ही कलश की स्थापना करके उसके जल में समस्त गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी आदि नदियों का आह्वान किया जाता है-
“गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति.
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु..”

वैदिक संहिताओं के साक्ष्यों से भी ज्ञात होता है कि आदिकाल से ही उत्तराखंड हिमालय धर्म इतिहास और संस्कृति का उद्भव स्थान रहा है.‘ऋग्वेद’ के एक मन्त्र के अनुसार भारतीय संस्कृति का सर्वप्रथम जन्म हिमालय की गिरि-कन्दराओं और नदियों के संगम तटों पर हुआ-
 ‘उपह्वरे गिरीणां संगथे च नदीनां, धिया विप्रो अजायत.’- ऋग्वेद, 8.6.28

वेदों के भाष्यकार महीधर ने यहां गिरि कन्दराओं का अर्थ पर्वतीय प्रदेश किया है. वैदिक मंत्रद्रष्टा ऋषियों ने इन्हीं हिमालय की गिरि कन्दराओं में वैदिक संहिताओं की रचना की और ‘आपो देवता’ सूक्त के रूप में जल देवता की मातृभाव से स्तुति की.आर्यों के मूल स्थान के प्रश्न को लेकर अंग्रेज साम्राज्यवादी इतिहासकारों द्वारा यह जो भ्रांत मान्यता स्थापित की गई है कि वैदिक आर्य विदेशी मूल के थे तो इस मान्यता का जल और नदी विषयक वैदिक मन्त्रों के अंतः साक्ष्यों से स्वतः ही खंडन हो जाता है. मैंने अपने शोधग्रन्थ ‘अष्टाचक्रा अयोध्या : इतिहास और परम्परा’ (उत्तरायण प्रकाशन,दिल्ली,2006) में वैदिक आर्यों के आदि निवास स्थान की समस्या पर पूरे एक अध्याय में विस्तार से चर्चा की है और आर्यों के विदेशी मूल के सिद्धांत का खंडन करते हुए यह खुलासा किया है कि वैदिक आर्यों का मूल निवास स्थान उत्तराखंड हिमालय था. यहां जल विषयक चर्चा के सन्दर्भ में इस तथ्य को विशेष रूप से रेखांकित करना चाहुंगा कि वेद की ऋचाओं में ऋग्वेद के भारतवंशी आर्यों ने गंगा,यमुना,सरस्वती आदि हिमालय की नदियों की जितनी आत्मीयता और श्रद्धाभाव से स्तुति की है,वैसा विदेशी आक्रमणकारी कभी कर नहीं  सकते.यही सबसे बड़ा प्रमाण है कि आर्य विदेशी मूल के नहीं थे और उत्तराखंड हिमालय की गिरि कन्दराओं में नदीमातृक सभ्यता का विकास करते हुए ही उन्होंने वैदिक मंत्रों की रचना की थी.वैदिक आर्य हिमालय की देवभूमि को अपनी माता मानते थे. ऋग्वेद के मंत्रों में ‘पृथिवी माता’ का यह विचार बार बार दोहराया गया है-
“बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्”
             -ऋग्वेद‚ 1.164.33

अथर्ववेद के ‘पृथिवीसूक्त’ में भी मन्त्रद्रष्टा ऋषि भूमि को माता तथा स्वयं को उसका पुत्र बताने में गौरव का अनुभव करता है-
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”
               -अथर्ववेद‚ 12.1.12

उसी प्रकार हिमालय के भूभाग में बहने वाली नदियों के प्रति वैदिक ऋषि के मन में जितनी आत्मीयता और अगाध श्रद्धा है, वह किसी विदेशी आकमणकारी के मनोभावों में नहीं हो सकती –
“इमं मे गंगे यमुने सरस्वति
शुतुद्रि स्तोमै सचता परूष्ण्या.
असिवक्न्या मरूद्वृधे वितस्त-
यार्जीकीये श्रणुह्या सुषोमया..”
               -ऋग्वेद,10.75.5

दरअसल,आर्यों के विदेशी आक्रमणकारी होने की मान्यता व्हीलर आदि ब्रिटिश काल के साम्राज्यवादी इतिहासकारों द्वारा फैलाई गई एक भ्रांत मान्यता है. इस का प्रयोजन सर्वाधिक प्राचीन आर्य सभ्यता के इतिहास को अवमूल्यित करना है. यदि वास्तव में वैदिक आर्य योरोप,ईरान आदि प्रदेशों से आकर यहां भारत में बसे होते तो उन प्रदेशों का और वहां की नदियों का भी वैदिक संहिताओं में उल्लेख अवश्य मिलता,किन्तु वेदों में ऐसे प्रमाण कहीं नहीं मिलते.वैदिक संहिताओं में तो हिमालय से जन्म लेने वाली गंगा,यमुना सरयू,सरस्वती आदि नदियों की ही मातृभाव से वंदना की गई है. बस यही सबसे बड़ा प्रमाण है कि वैदिक आर्यों का मूल निवास स्थान मध्य हिमालय, विशेषकर उत्तराखंड हिमालय था.

वैदिक संहिताओं में सरस्वती नदी को सर्वश्रेष्ठ नदी और सर्वश्रेष्ठ देवी के रूप में पूज्य माना गया है-
“अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति.
अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि॥”
                              -ऋग्वेद,2.41.16

मनुसंहिता से स्पष्ट है कि सरस्वती और दृषद्वती के बीच का भूभाग प्राचीन काल में ब्रह्मावर्त कहलाता था,जिसका वेदों में उल्लेख भारतजनों के निवास स्थान ‘ब्रह्मदेश’ के रूप में आया है. ऋग्वेद के मंत्रों में भी ‘ब्रह्मदेश’ और वहां के निवासी ‘भारतजनों’ की महिमा गाई गई है-
“विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रहमेदं भारतं जनम्”
                              – ऋग्वेद‚ 3.53.12

महाभारत (1.90.26) में भी सरस्वती नदी का कई बार उल्लेख मिलता है. अनेक भरतगण के राजाओं ने इसके तट के समीप कई यज्ञ किये थे. वर्तमान सूखी हुई सरस्वती नदी के समान्तर खुदाई में पुरातत्त्वविद बी.बी.लाल को 5500-4000 वर्ष पुराने शहर भी मिले हैं जिनमें कालीबंगा और  लोथल जैसे हड़प्पा कालीन शहर भी शामिल हैं.(फ्रन्टियर ऑफ इन्ड्स सिविलाइजेशन)

यहां खुदाई में कई यज्ञकुण्डों के अवशेष भी मिले हैं,जो वैदिक काल और महाभारत काल के यज्ञ सम्बन्धी साहित्यिक साक्ष्यों को ही प्रमाणित करते हैं. पहाड़ पर रहने वाला हर व्यक्ति जानता है कि यह देवनदी सरस्वती बद्रीनाथ के ऊपर बंदरपूंछ ग्लेशियर से  निकल कर बद्रीनाथ की व्यास गुफा होते हुए अलकनंदा में मिल जाती है.

सरस्वती नदी के मूल को लेकर इतिहासकारों के मध्य कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं, किंतु इस नदी का वास्तविक मूल स्रोत आज भी अलकनंदा की सहायक नदी बद्रीनाथ के उत्तर में ‘माना’ से आने वाली नदी के रूप में देखा जा सकता है.उत्तराखंड हिमालय में प्रवाहित होने वाली इस नदी को आज भी ‘सरस्वती’ के नाम से ही जाना जाता है.किन्तु विडम्बना यह है कि व्हीलर की इतिहास चेतना से दीक्षित वर्त्तमान इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता सरस्वती की खोज की योजनाएं कुरुक्षेत्र आदि मैदानी इलाकों में ही चलाते हैं.उत्तराखंड के  सरस्वती नदी और अलकनन्दा के तटों पर पुरातात्त्विक अन्वेषण उनके द्वारा नहीं किए जाते क्योंकि यहां इतिहास के जो नए प्रमाण मिलने की संभावना रहती है,उनसे इन पुरातत्त्ववेत्ताओं को अपने ही पूर्वाग्रहों के खंडन की संभावना प्रतीत होती है.

उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास की दृष्टि से सरस्वती का महत्त्व केवल इसकी पवित्रताके धरातल पर ही मूल्यांकित नहीं किया जा सकता है,अपितु इस कारण से भी आज सरस्वती नदी के महत्त्व को समझने की जरूरत है कि यह वैदिक आर्यों के निवास और उनके धार्मिक अनुष्ठानों की भी सर्व प्रथम पावन भूमि रही है.हम आज भारतीय आर्यो की सभ्यता को सारस्वत सभ्यता का नाम देते हैं, तो उसका मूलाधार भी यही सरस्वती नदी ही है.

एक फ्रेंच प्रोटो-हिस्टोरियन माइकल डैनिनो ने अपने शोध ‘द लॉस्ट रिवर’ में सरस्वती नदी की उत्पत्ति और इसके लुप्त होने के संभावित कारणों की खोज की तो उन्होंने खुलासा किया कि ऋग्वेद के 7वें मंडल की ऋचाओं के अनुसार एक समय पर सरस्वती बहुत बड़ी नदी हुआ करती थी,जो कि पहाड़ों से बहकर नीचे आती थी. डैनिनो कहते हैं कि ऋग्वेद में वर्णित भौगोलिक स्थिति के अनुसार यह नदी यमुना और सतलुज के बीच अपना मार्ग बनाती रही है और लगभग पांच हजार वर्ष पहले सरस्वती के बहाव से ही यमुना और सतलुज नदियों को पानी मिलता था.डैनिनो के अनुसार यह सरस्वती हिमालय ग्लेशियर से बहने वाली ‍नदी है,जिसका उद्गम पश्चिम गढ़वाल के बंदरपूंछ ग्लेशियरसे हुआ था. उस समय यमुना भी इसके साथ-साथ बहा करती थी. कुछ दूर तक दोनों नदियां आसपास बहती रहीं और बाद में एक दूसरे से मिल गई.उल्लेखनीय है कि बंदरपूंछ  उत्तराखंड राज्य में स्थित पश्चिमी हिमालय  की ही एक चोटी का नाम है. इसी बंदरपूंछ की चोटी पर स्थित यमुनोत्री हिमनद से यमुना नदी का भी उद्गम हुआ है.

मान्‍यता है कि राजा मांधाता ने मानसरोवर झील की खोज की थी और उन्‍होंने इसी झील के किनारे कई वर्षों तक कठोर तपस्‍या की. एक दूसरी पौराणिक मान्यता रही है कि राजा मान्धाता ने इन्द्र को परास्त करके अमरावती पर विजय प्राप्त की. इस विजय स्मृति को बनाए रखने के लिये मानसरोवर के किनारे पर स्थित पर्वत का नाम ‘गुरला मान्धाता’ रखा गया.

दरअसल,उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास की दृष्टि से सरस्वती का महत्त्व केवल इसकी पवित्रताके धरातल पर ही मूल्यांकित नहीं किया जा सकता है,अपितु इस कारण से भी आज सरस्वती नदी के महत्त्व को समझने की जरूरत है कि यह वैदिक आर्यों के निवास और उनके धार्मिक अनुष्ठानों की भी सर्व प्रथम पावन भूमि रही है.हम आज भारतीय आर्यो की सभ्यता को सारस्वत सभ्यता का नाम देते हैं, तो उसका मूलाधार भी यही सरस्वती नदी ही है. ऋग्वैदिक साक्ष्यों से इस तथ्य की भलीभांति पुष्टि हो जाती है कि हिमालय की सात नदियों का ‘सप्तसैंधव’ प्रदेश ही आर्यों का आदि निवास स्थान रहा था.

ऋग्वैदिक आर्य हिमालय के प्रत्येक भूभाग, गिरि कन्दराओं और यहां बहने वाली नदियों और जल सरोवरों से भली भांति परिचित थे. लगभग आठ-दस हजार वर्ष पूर्व वैदिक कालीन आर्य राजाओं और ऋषि मुनियों ने हिमालय की अति दुर्गम पर्वत घाटियों का अन्वेषण कर लिया था और कैलास मानसरोवर तक यात्रा करते हुए उन्होंने  हिमालय की पर्वत शृंखलाओं से निकलने वाली सरयू, रामगंगा, कोसी, गगास आदि नदियों के मूलस्रोतों की खोज कर ली थी. भगीरथ ने गंगा के उद्गम को ढूँढा, वसिष्ठ ने सरयू की और कौशिक ऋषि ने कोसी की खोज की.वैदिक काल में अयोध्या के सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा मांधाता का साम्राज्य कैलास मानसरोवर तक फैला हुआ था. मान्‍यता है कि राजा मांधाता ने मानसरोवर झील की खोज की थी और उन्‍होंने इसी झील के किनारे कई वर्षों तक कठोर तपस्‍या की. एक दूसरी पौराणिक मान्यता रही है कि राजा मान्धाता ने इन्द्र को परास्त करके अमरावती पर विजय प्राप्त की. इस विजय स्मृति को बनाए रखने के लिये मानसरोवर के किनारे पर स्थित पर्वत का नाम ‘गुरला मान्धाता’ रखा गया. ‘गुरला’ यहां पास में स्थित एक पहाड़ी दर्रे का तिब्बती नाम था जो बाद में पर्वत के नाम के साथ जुड़ गया.

कैलाश मानसरोवर का इतिहास भारत के लोगों के लिए इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके साथ हमारी जलसृष्टि की उत्पत्ति का इतिहास भी जुड़ा है. इस सम्बंध में स्कन्दपुराण के ‘मानसखंड’ में महर्षि दत्तात्रेय ने इस महातीर्थ कैलास मानसरोवर का वर्णन करते हुए कहा है कि यहां से गंगा,सरयू आदि महानदियां निकलती हैं, विभिन्न नदी, सरोवर, धारे-नौलों की प्राकृतिक जल परम्परा के मूलस्रोत भी इसी कैलास मानसरोवर से प्रवाहित होते हैं.

‘कैलास मानसरोवर’ उत्तराखंड हिमालय की भौगोलिक जल संस्कृति के गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित एक अनोखा तीर्थधाम है. यह भारतीय सभ्यता और जलसंस्कृति का भी अद्भूत आदिस्रोत है,जिसके साथ शिव और शक्ति के अनेक माहात्म्य जुड़े हैं.यद्यपि आज कैलास मानसरोवर की राजनैतिक सीमाएं चीन के अधिकार क्षेत्र में आ गई हैं.हर वर्ष कैलास मानसरोवर की यात्रा के लिए भारतवासियों को चीन सरकार से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है.परन्तु पिछले आठ दस हजार वर्षों से हिन्दू,जैन,बौद्ध आदि अनेक धर्मों का साझा पुरातन इतिहास इस तीर्थ स्थान से जुड़ा है.भारतीय परंपरा के अनुसार संसार में हिमालय को भी इसलिए देवतात्मा के रूप में पूज्य माना जाता है क्योंकि यहां कैलाश और मानसरोवर जैसा तीर्थस्थान है.कैलाश मानसरोवर को शिव-पार्वती का घर माना जाता है. मानसरोवर संस्कृत के ‘मानस” (मस्तिष्क) और ‘सरोवर’ (झील) शब्द से बना है. मान्यता है कि ब्रह्मा ने अपने मन-मस्तिष्क से मानसरोवर को बनाया है. पुराणों के अनुसार मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगीरथ की तपस्या से भगवान शिव के प्रसन्न होने पर हुई थी. शंकर भगवान द्वारा प्रकट किये गये जल के वेग से जो झील बनी, कालांतर में उसी का नाम ‘मानसरोवर’ हुआ. सदियों से देव,दानव, योगी, मुनि और सिद्ध महात्मा यहां तपस्या करते आए हैं. इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ‘ॐ’ की ध्वनि तरंगों का अद्भुत समागम होता है जिसके प्रभाव से मन और हृदय दोनों निर्मल हो जाते हैं.स्थान स्थान पर नदी प्रपातों के दूधिया झरने, हरियाली के अद्भुत नजारे तथा नवी ढांग में पर्वत शिखर पर हिम नदियों से बने ‘ॐ’ पर्वत जैसे प्राकृतिक चमत्कारों ने इस पावन स्थल को शिव और शक्ति का दिव्य लीलाधाम बना दिया है.

जहां तक उत्तराखण्ड हिमालय के सांस्कृतिक और पौराणिक भूगोल का सम्बन्ध है,कुमाऊं मंडल को ‘मानसखंड’ व गढ़वाल मंडल को ‘केदारखंड’ भी इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये दोनों क्षेत्र भगवान शिव एवं पार्वती के लीला धाम कैलास मानसरोवर के गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित हैं.

कैलाश मानसरोवर का इतिहास भारत के लोगों के लिए इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके साथ हमारी जलसृष्टि की उत्पत्ति का इतिहास भी जुड़ा है. इस सम्बंध में स्कन्दपुराण के ‘मानसखंड’ में महर्षि दत्तात्रेय ने इस महातीर्थ कैलास मानसरोवर का वर्णन करते हुए कहा है कि यहां से गंगा,सरयू आदि महानदियां निकलती हैं, विभिन्न नदी,सरोवर,धारे-नौलों की प्राकृतिक जल परम्परा के मूलस्रोत भी इसी कैलास मानसरोवर से प्रवाहित होते हैं. यही वह दिव्य स्थान समस्त हिमनद और नदियों का भी मूल उद्गम स्थल है-
“पुण्यं  पुण्यजलैरयुक्तं सेवितं शिवकिंकरै:.
यस्मात् पुण्या महानद्यो गंगाद्या नृपसत्तम..
सरव्याद्यास्तथा पुण्याः संभूताः सरितां वराः.
नदानां च नदीनां च यमाद्यं प्रवदन्ति हि..”
           -स्कन्दपुराण,मानसखंड,8.50-51

कैलाश पर्वत की चार दिशाओं से एशिया की चार नदियों का उद्गम हुआ है ब्रह्मपुत्र, सिंधु नदी, सतलज व करनाली. इन नदियों से ही गंगा,सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली हैं.कैलाश के चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख दृश्यमान हैं,जिनमें से नदियों का उद्गम होता है,पूर्व में अश्वमुख है,पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है,दक्षिण में मोर का मुख है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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