• डॉ. मोहन चंद तिवारी

‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’ महाकाव्य में
विभाण्डेश्वर महादेव का तीर्थ माहात्म्य’

बहुत दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आधुनिक संस्कृत साहित्य के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान साहित्यकार और साहित्य अकादमी से सम्मानित रचनाकार डा. हरिनारायण दीक्षित because जी हमारे बीच नहीं रहे, पिछले वर्ष एक लंबी बीमारी के कारण उनका देहांत हो गया. किन्तु कवियश की कीर्तिस्वरूप वे आज भी जीवित हैं और हमारे देश के सांस्कृतिक मूल्यों से संवाद कर रहे हैं. निधन से कुछ महीने पहले जब मेरी उनसे फोन पर बात हुई तो मेरे द्वारा फेसबुक पर लिखी गई न्यायदेवता ग्वेलज्यू की धारावाहिक लेख माला से वे अतिप्रसन्न थे.

न्यायदेवता

गौरतलब है कि कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष तथा अनेक संस्कृत काव्यों, महाकाव्यों के लेखक रह चुके डा.दीक्षित ने उत्तराखंड की देवभूमि को अपने ग्वेल देवता के कृतित्व के माध्यम से एक महिमाशाली भूखंड की because राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ने का जो महान कार्य किया है, उसके लिए समस्त उत्तराखंडवासी उनके सदैव आभारी ही रहेंगे. मैं विभांडेश्वर पर लिखे इस लेख के माध्यम से परम श्रद्धेय स्व. डा. हरि नारायण दीक्षित जी को भी अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और अपने आराध्यदेव विभांडेश्वर महादेव और इष्टदेव ग्वेलज्यू से यह प्रार्थना करता हूं कि इस शिव आराधक महामनीषी को शिवलोक में परम शांति प्राप्त हो और इस न्यायदेवता पर रचित कृति ‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’ से वे सदा यशस्वी बने रहें.

न्यायदेवता

कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा जिले में द्वाराहाट से आठ कि.मी.की दूरी पर स्थित विभांडेश्वर महादेव उत्तराखंड का प्रसिद्ध तीर्थधाम है. स्कंदपुराण के मानसखंड में भी इस शैव तीर्थ because का वर्णन मिलता है. विश्राम के दौरान यहां शिव का दायां हाथ पड़ा था. कहा जाता है कि मंदिर में विद्यमान त्रिजुगी धूनी त्रेतायुग से लगातार प्रज्ज्वलित रही है. पौराणिक मान्यता के अनुसार सुरभि, नंदिनी और गुप्त सरस्वती की त्रिवेणी पर स्थित इस मंदिर को उत्तराखंड की काशीधाम की मान्यता प्राप्त है.

न्यायदेवता

ऐतिहासिक दृष्टि से विभाण्डेश्वर महादेव मंदिर शक सम्वत 376 (ईसवी सन 301) में स्थापित हुआ था. मंदिर का वर्तमान स्वरूप 11वीं सदी में कत्यूरी शासकों द्वारा निर्मित because किया गया.चंद राजाओं के शासन में मंदिर में नियमित पूजा अर्चना अनुष्ठान होते रहे.चंद राजा उद्योत चंद ने मंदिर को गूंठ प्रदान की. तदन्तर स्वामी लक्ष्मी नारायण महराज द्वारा यहाँ जीर्णोद्धार किया गया व अनेक मूर्तियां स्थापित so की गईं.एक ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार इस तीर्थ स्थल पर चंद राजाओं के सेनापति कल्याण चंद की पत्नी कलावती देवी को कुमाऊं की प्रथम और अंतिम सती होने का गौरव भी प्राप्त है.

न्यायदेवता

चैत्र मास के अंतिम गते की रात्रि को यहां बिखोती मेला लगता है. हिमालय से पहुंचे स्वामी लक्ष्मी नारायण जी ने यहां1945 में यजुर्वेद, 1946 में ऋग्वेद, 1947 में सामवेद तथा because 1952 में अथर्ववेद के यज्ञ संपन्न करवाए. विभांडेश्वर मंदिर में पूरे वर्ष श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है. लेकिन श्रावण मास में यहां की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है.इसलिए श्रावण मास के आने पर विभांडेश्वर में भक्तों की भारी भीड़ रहती है.

न्यायदेवता

डॉ. हरि नारायण because दीक्षित द्वारा रचित ‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’ नामक आधुनिक संस्कृत महाकाव्य ‘में जितने मनोयोग और भक्तिभाव से विभांडेश्वर महादेव जी का स्तुतिगान किया गया है वह अद्वितीय होने के साथ साथ इस कुमाऊं प्रदेश के शिवधाम को विशेष गौरवान्वित भी करता है.

न्यायदेवता

‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’ महाकाव्य में डा. दीक्षित जी ने राजा हालराय की पुत्र प्राप्ति के प्रसंग को लेकर श्रीविभांडेश्वर महादेव के माहात्म्य का अनेक सर्गों में विस्तार से because वर्णन किया है.इस महाकाव्य के सर्ग चार और पांच खास तौर से महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि इन सर्गों में लेखक ने अपनी मौलिक काव्य प्रतिभा का परिचय देते हुए श्रीविभाण्डेश्वर धाम के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व को विशेष रूप से उजागर किया है,जिसके सार संक्षेप के रूप में इस पोस्ट के माध्यम से मैं निम्नलिखित पांच श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूं-

न्यायदेवता

1. इस संसार में विभांडेश्वर तीर्थ के समान because कोई दूसरा तीर्थ नहीं, श्रीविभांडेश्वर महादेव के समान दूसरा कोई देव नहीं, उनके समान कोई यज्ञ भी फलदायी नहीं. श्रीविभांडेश्वर महादेव की उदारता अनुपम है-

लभ्यं न तीर्थं because किमपीह तत्समं,
लभ्यो न देवो
sपि च कोsपि तत्समः.
मखोsपि कश्चित्फलदो because न तत्समो
नूनं तदीयानुपमास्त्युदारता..
श्रीग्वल्लदेवचरितम्’,4.34

न्यायदेवता

2. तीनों लोकों में व्याप्त because
श्रीविभाण्डेश्वर महादेव तीर्थ की महिमा इतनी so अपार है कि जगदीश्वर के चारों धाम और द्वादश ज्योतिर्लिंग भी इस तीर्थक्षेत्र की बराबरी नहीं कर सकते हैं-

चत्वारि धामान्यपि तज्जगतपतेस्-
तस्य प्रभावे तुलनां न बिभ्रति.

न द्वादशज्योतिरलंकृतान्यपि
स्थलानि साम्यं दधते
sमुना फले..
श्रीग्वल्लदेवचरितम्’,4.35

न्यायदेवता

3. कठोर परिश्रम से किया गया अश्वमेध यज्ञ और वाजपेय यज्ञ का जो फल मिलता है,वह फल तो श्रीविभांडेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से मिल जाता है. किंतु उनकी अर्चना करने पर जो फल मिलता है,वह फल उससे भी कई गुना बढ़ कर होता है-

“यदश्वमेधो विहितः परिश्रमैर्-
यद् वाजपेयश्च so फलं प्रयच्छति.
तद् दर्शनादेव but तु तस्य लभ्यते
कृतेsर्चने यच्च because तदस्ति तत्परम्..”
-‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’,4.36

न्यायदेवता

4. जीवन भर काशी में लगातार वास करते  हुए और वहां जगन्माता पार्वती सहित भगवान् विश्वनाथ की पूजा करते हुए मनुष्य को जो पुण्य प्राप्त होता है,वह पुण्य तो यहां श्रीविभांडेश्वर का केवल दर्शन मात्र से मिल जाता है-

“काश्यां वसन् स्वीयमशेषजीवनं
भवं भवानीसहितं but च पूजयन्.
यत्पुण्यजातं so मनुजोsत्र विन्दते
तत्केवलं त्वस्य because ददाति दर्शनम्..”
-‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’,4.37

न्यायदेवता

5. जिस पाप से कहीं भी because
छुटकारा नहीं मिलता,वह पाप भी श्रीविभांडेश्वर में धुल जाता है,और जो पुण्य कहीं भी नहीं मिलता है,वह पुण्य भी श्रीविभाण्डेश्वर धाम में निश्चय ही प्राप्त हो जाता है-

“यत्पापशुद्धिर्न च जायते क्वचित्
तद्वै विभांडेश्वरधाम्नि because शुध्यति.
यत्पुण्यलाभश्च so न जायते क्वचित्
तद्वै विभांडेश्वरधाम्नि but लभ्यते..”
-‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’,4.38

न्यायदेवता

डा.दीक्षित जी ने इस महाकाव्य के because सांस्कृतिक महत्त्व को बढाने के लिए पुण्यभूमि भारतवर्ष, देवभूमि उत्तराखंड और ग्वेलज्यू की जन्मभूमि कूर्माञ्चल की विशेष रूप से वंदना करते हुए कहा है-

“जयति जयति भूमौ भारतंह्यस्मदीयम्,
जयति जयति because तस्मिन्नुत्तराखंडमेतत्.
जयति जयति so तस्मिंश्चारुकूर्माञ्चलोऽयं,
जयति जयति but जनानां ग्वल्लदेवश्चयस्मिन्॥
   -‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’,1.56

न्यायदेवता

दरअसल,स्कन्दपुराण के ‘मानसखंड’ में इस क्षेत्र की जो महिमा वर्णित है उसी को आधार बनाकर डा. दीक्षित ने अपने इस महाकाव्य में कत्युरी नरेश राजा हालराय की कठोर तपस्याओं because का वर्णन किया है,जिससे प्रसन्न हो कर श्रीविभाण्डेश्वर महादेव राजा हालराय को स्वयं स्वप्न में आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि “हे राजन तुम्हारी सातों ही रानियां माता बनने के योग्य नहीं हैं,इसलिए तुम्हें आठवां विवाह करना होगा. उससे तुम्हें निश्चय से पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी” –

“सप्तापि so भार्यास्तव किंतु भूपते!
तन्मातृताया न so हि सन्ति भाजनम्.
अतो विवाहं but रचयाष्टमं निजं
तस्यां ध्रुवं ते because तनयो जनिष्यते..”
   -‘श्रीग्वल्लदेवचरितम्’,5.84

न्यायदेवता

अगले लेख में पढ़िए- ‘राजा हालराय because की ‘विभांडेश्वर महादेव’ में कठोर तपस्या का कथा प्रसंग’

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

Share this:
About Author

Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *