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वसन्त पंचमी : सारस्वत सभ्यता, समाराधना और साधना का पर्व

वसन्त पंचमी : सारस्वत सभ्यता, समाराधना और साधना का पर्व

वसन्त पंचमी पर विशेष

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

आज वसंत पंचमी का दिन सारस्वत समाराधना का पावन दिन है.वसंत पंचमी को विशेष रूप से सरस्वती जयंती के रूप में मनाया जाता है. सरस्वती देवी का आविर्भाव दिवस होने के कारण यह because दिन श्री पंचमी अथवा वागीश्वरी जयंती के रूप में भी प्रसिद्ध है. प्राचीन काल में वैदिक अध्ययन का सत्र श्रावणी पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर इसी तिथि को समाप्त होता था तथा पुनः नए शिक्षासत्र का प्रारम्भ भी इसी तिथि से होता था. इसलिए वसन्त पंचमी को सारस्वत साधना का पर्व माना जाता है. इस दिन सरस्वती के समुपासक और समस्त शिक्षण संस्थाएं नृत्य संगीत का विशेष आयोजन करते हुए विद्या की अधिष्ठात्री देवी की पूजा अर्चना करती हैं.

पावन ऋतु

भारतीय परम्परा में देवी सरस्वती ज्ञान विज्ञान की अधिष्ठात्री देवी ही नहीं बल्कि ‘भारतराष्ट्र’ को पहचान देने वाली देवी भी है. ऋग्वेद के अनुसार वंसत पंचमी के पर्व के साथ भारतवर्ष के because वैदिक कालीन भरतजनों की सारस्वत सभ्यता का इतिहास भी जुड़ा है. वैदिक कालीन भरतजनों ने सरस्वती नदी के तटों पर यज्ञ करते हुए इस ‘ब्रह्म’ नामक देश को सर्वप्रथम ‘भारत’ नाम दिया था जैसा कि ऋग्वेद के इस मन्त्र से स्पष्ट है-
“विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्.”

पावन ऋतु

यही कारण है कि ‘भारत’ because देश नाम के कारण इसे ‘भारतराष्ट्र’ भी कहा जाता है. सरस्वती नदी के तटों पर रची बसी वैदिक कालीन भारतीय सभ्यता के अवशेषों को आज सारस्वत सभ्यता के रूप में जो नई पहचान मिली है उसका ऐतिहासिक प्रमाण भी ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में स्वयं मिल जाता है-
“सरस्वती साधयन्ती धियं न
इलादेवी भारती विश्वतूर्तिः.”
        -ऋग्वेद, 2.3.8

पावन ऋतु

वैदिक मंत्रों में वाग्देवी सरस्वती का because राष्ट्र-रक्षिका देवी के रूप में आह्वान हुआ है जो न केवल युद्ध के समय ‘भारतराष्ट्र’ की शत्रुओं से रक्षा करती थी बल्कि यह धन-धान्य को समृद्ध करने वाली एक राष्ट्र देवी के रूप में भी आराध्य है-
“अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्.”

पावन ऋतु

ऋग्वेद के ‘देवीसूक्त’ में अम्भृण ऋषि because की पुत्री वाग्देवी ब्रह्मस्वरूपा होकर समस्त जगत को ज्ञानमय बनाती है और रुद्रबाण से अज्ञान का विनाश करती है-
“अहं रुद्राय धनुरा तनोमि
ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ.
अहं जनाय समदं कृष्णोम्यहं
द्यावापृथिवी आविवेश..”
       -ऋग्वेद,10.125.6

पावन ऋतु

भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली छह ऋतुओं- वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर में वसंत को ऋतुराज अर्थात सभी ऋतुओं का राजा माना गया है. because पंचमी से वसंत ऋतु का आगमन हो जाता है. इस दिन से नदी सरोवरों,गिरि कंदराओं, खेत-खलिहानों में प्राकृतिक सौन्दर्य निखरना शुरू हो जाता है.पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा जी ने जब संसार को बनाया तो स्थावर जंगम रूप संसार में नदी पर्वत पेड़-पौधे और जीव जन्तु सब कुछ दिखाई दे रहे थे, लेकिन उन्हें किसी चीज की कमी महसूस हो रही थी तो ज्ञान और सौंदर्य का कहीं भी आभास नहीं हो रहा था. इस कमी को पूरा करने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल निकालकर छिड़का तो एक सुंदर स्त्री because के रूप में एक देवी प्रकट हुईं.उनके एक हाथ में वीणा और दूसरे हाथ में पुस्तक थी. तीसरे में माला और चौथा हाथ वर मुद्रा में था. यह देवी थीं ज्ञान और सौंदर्य की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती. देवी सरस्वती ने जब वीणा बजाई तो संस्सार की हर चीज में स्वर और ज्ञान की किरणें फूटने लगीं.यह विशिष्ट बसंत पंचमी का दिन वसन्त ऋतु के शुभागमन का दिन था. because देवी सरस्वती की कृपा से यह वसन्त ऋतु ऊर्जा,सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि की ऋतु भी है.आर्थिक खुशहाली प्रदान करने के कारण देवलोक और मृत्युलोक में सरस्वती की पूजा होने लगी.

जय जवान,जय किसान की प्रेरिका देवी

आज हम देश को एक समृद्ध और ऊर्जस्वी राष्ट्र बनाने की अपेक्षा से ‘जय जवान! जय किसान!’का नारा बुलंद करते हैं क्योंकि राष्ट्ररक्षा का असली दायित्व सीमाओं की रक्षा करने वाला जवान और आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने वाला किसान ही निभाता है.प्राचीन काल से ही ‘भारतराष्ट्र’ के चिंतकों ने इन दोनों राष्ट्र रक्षक जवान because और किसान की तुलना वसन्त ऋतु से की है.इस सम्बंध में ‘शतपथ ब्राह्मण’ में वसन्त ऋतु से जुड़ा एक रोचक समाज चिन्तन का भी प्रसंग मिलता है जिसमें सेनानी (योद्धा) तथा ग्रामणी (किसान ) की तुलना वसन्त ऋतु से की गई है.क्योंकि वसन्त ऋतु युद्ध लड़ने की सर्वोत्कृष्ट ऋतु भी थी और इसी ऋतु में because ग्रामों के कृषक वर्ग द्वारा पैदा की गई आर्थिक सम्पदा से राजकोश में भारी वृद्धि होती थी.सैन्य संरक्षण तथा भरण पोषण की प्रमुख ऋतु होने के कारण ब्राह्मण ग्रन्थों ने वसन्त ऋतु को प्रजापति की संज्ञा प्रदान की है.

पावन ऋतु

विद्या की देवी मां सरस्वती की because अनुकम्पा से ही हम सभी वाणी के विविध रूप शब्द, स्वर और संकेतों को समझने में समर्थ होते हैं उनके बिना यह संसार शून्य और अंधकारमय हो जाता है. संस्कृत में माधुर्यपूर्ण शब्दशैली में मां सरस्वती की वंदना की गई है इसे संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर करने वाली देवी कहा गया है-

‘‘या कुन्देन्दुतुषारहारधवला
या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा
या श्वेत पद्मासना.
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः
सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती
निःशेष जाड्यापहा॥’’

पावन ऋतु

अर्थात् जो विद्या की because देवी सरस्वती कुन्द के पुष्प,चंद्रमा,हिमखंड और मोती के हार की तरह शुक्लवर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है,जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं,संपूर्ण जड़ता because और अज्ञान को दूर कर देने वाली वही माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें.

समस्त देशवासियों को वसन्त पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

*सभी चित्र गूगल से साभार*

पावन ऋतु

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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2 Comments

    सुन्दर।

    सुन्दर।

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