September 19, 2020
किस्से/कहानियां

ट्यूलिप के फूल

कहानी

  • एम. जोशी हिमानी

आज दिसम्बर की 26 तारीख हो गई है. ठंड अपने चरम पर पहुंच चुकी है. मौसम के मिजाज से लग रहा है एकाध दिन में यहां अच्छी बरफ गिरेगी.

गंगा खुश है कि बरफ अच्छी गिरेगी तो उसकी क्यारियों में ट्यूलिप भी बहुत अच्छे फूल देंगे तथा बगीचे में लगे सेबों की मिठास भी बढ़ जायेगी गंगा ऊनी टोपी तथा मफलर से अपने कानों को अच्छी तरह ढक लेती है. साड़ी उससे अब पहनी नहीं जाती. ऊनी गाउन के नीचे ऊनी लैगिंस, ऊपर से गरम ओवर कोट डाले, होंठों में मौसम के अनुकूल लिपस्टिक, चेहरे से टपकते अभिजात्य को देखकर पहली नजर में गंगा को हर कोई अंग्रेज मैम समझता था.

मुक्तेश्वर के टाप में बना उसके दादा के जमाने का वह घर, जिसमें गर्मियों में परिवार के एकाध सदस्य अपने नौकरों के साथ जानवरों को लेकर आकर रहते थे यहां पर चार महीने तथा अगले 6-8 महीने के लिए जानवरों तथा जलावन के लिए सूखी लकड़ियों का ढेर कमरों के भीतर लगाकर नीचे शीतला खेत में अपने परमानेंट आवास पर चले जाते थे, उस घर को गंगा ने तीस साल तक अध्यापिका, प्रधानाध्यापिका फिर प्रधानाचार्य की सम्मानजनक नौकरी करने के बाद अपने रिटायरमेंट हाउस के रूप में विकसित कर लिया था. नाम दिया था उसे अपनी मां के नाम पर ‘‘कुन्ती विला’’.

‘‘दद्दा मैं यहां हल्द्वानी में पड़े-पड़े क्या करूंगी, यहां की गरमी मुझसे सहन भी नहीं होगी,  मैं तो चाहूंगी आप सब भी गरमियों में मेरे साथ मुक्तेश्वर में रहें…’’

दो साल पहले जब गंगा ने मुक्तेश्वर की इस वीरान चोटी में बसने का निर्णय सबको सुनाया था तो सभी ने उसको मना कर दिया था भैय्या का मन था गंगा उनके साथ ही अब हल्द्वानी के उनके बड़े से घर में रहकर आगे की जिन्दगी बिताये.

गंगा को मनाना इतना आसान भी नहीं था – ‘‘दद्दा मैं यहां हल्द्वानी में पड़े-पड़े क्या करूंगी, यहां की गरमी मुझसे सहन भी नहीं होगी,  मैं तो चाहूंगी आप सब भी गरमियों में मेरे साथ मुक्तेश्वर में रहें…’’

उस टूटे-फूटे पराने खंडहरनुमा घर को पुनः जीवित करने में गंगा को बहुत सारा पैसा तथा  समय खर्च करना पड़ा था. आधा दर्जन मजदूर मिस्त्री कई-कई घण्टे काम करने के बाद कई महीने में तैयार कर पाये थे ‘‘कुन्ती विला’’ को. बनने के बाद कुंती विला अपने नाम के अनुरूप पवित्र तथा गौरवपूर्ण लगने लगा था.

ट्यूलिप के फूल का बगीचा। फोटो गूगल से साभार

गृह प्रवेश के दिन भैय्या बहुत खुश थे गंगा के सपनों को पूरा होते देख वे बोले थे ‘‘गंगा तुमने जीवन में हमेशा लीक से हटकर तथा अच्छे काम ही किये हैं इस कुंती विला का निर्माण भी उसी का एक अगला कदम है, पर डरता हूँ इस वीराने में तुम यहां अकेली कैसे रहोगी, कोई दुख बीमारी आ जाय कौन देखेगा तुम्हें यहां ?

 ‘‘दद्दा तुम चिन्ता मत करो मोबाइल मेरा हर समय मेरे साथ रहेगा, आप हैं और बहुत लोग हैं जिन्हें मैं परेशान कर सकती हूँ.

गंगा सोचती है दुनियां में अब कहीं कोई सुनसान जगह नहीं रह गई है, वह नीचे नजर डालती है जिम कार्बेट का वह बंगला जो अब कुंमाऊ मण्डल विकास निगम का गेस्ट हाउस बन गया है इस घोर जाड़े में भी सैलानियों की आवाजाही से गुंजार है. गर्मियों में तो यहां पर महीनों पहले बुकिंग करानी पड़ती है. मुक्तेश्वर का सूर्योदय तथा सूर्यास्त देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं.

गंगा ने एक पूरे कमरे को सूखी लकड़ियों के स्टोर के रूप में तब्दील कर दिया है, कुंती विला तक अभी बिजली नहीं पहुंच पाई है. इतनी ऊंचाई में अकेले घर तक बिजली पहुंचाने के लिए सरकार इच्छुक नहीं है, गंगा भी बहुत इच्छुक नहीं है, सौर ऊर्जा का पूरा प्लाण्ट उसने छत पर फिट करा लिया है कई दिन तक मौसम खराब होने पर ही रोशनी की दिक्कत होती है, पर गंगा उस दिक्कत को भी इंज्वाय करती है.

पिछली बार तो मुक्तेश्वर में घुटनों तक बर्फ गिरी थी. कुंती विला में तो चार फुट के आस पास बर्फबारी हुई थी. गंगा ऐसे मौसम का सामना करने के लिए अपनी पूरी तैयारी रखती थी…

दिन भर मूसलाधार बारिश होने के बाद ठंड बाहर बढ गई है गंगा अपने बब्बर को जल्द ही अंदर कर लेती है, बब्बर की गुर्राहट तथा एक बार के भौंकने भर से जंगली जानवर तथा शहरी इंसान कोई भी कुंती विला की तरफ झांकने की हिम्मत नहीं करता.

रात की घोर निस्तब्धता बता रही है कि आज रात में जमकर बर्फबारी होगी. पिछली बार तो मुक्तेश्वर में घुटनों तक बर्फ गिरी थी. कुंती विला में तो चार फुट के आस पास बर्फबारी हुई थी. गंगा ऐसे मौसम का सामना करने के लिए अपनी पूरी तैयारी रखती थी फिर भी पिछले साल की बर्फबारी के समय मोबाइल का नेटवर्क बिगड़ जाने के कारण भैय्या कई दिनों तक हल्द्वानी में उसकी चिन्ता में हलकान रहे थे.

मुक्तेश्वर से हिमालय दर्शन

गंगा ने अपने चार कमरों वाले इस विला के पूर्व की तरफ वाले कमरे को पूजा गृह, ध्यान कक्ष तथा लाइब्रेरी के रूप में विकसित किया है. वह जब भी दिल्ली जाती है विश्व के चुनिंदा राइटर्स की पुस्तकें खरीदना उसकी पहली प्राथमिकता होती है वह चाहती है उसके न रहने पर यह घर नई पीढ़ी को जीवन जीना सिखाये.

कमरे की उत्तर पूर्व दिशा में पांच बजे वह ध्यान में बैठ जाती है, ध्यान की गहराई में कई दफे उसे लगता है या तो सामने अंनतकाल से खड़ा हिमालय पर्वत चलकर ‘‘कुन्ती विला’’ के पास आकर खड़ा हो गया है अथवा हिमालय ने पूरे कुन्ती विला को अपने पास बुला लिया है ओह कितने अद्भुत क्षण होते हैं वे हर रोज वह उन्हीं क्षणों को महसूस करना चाहती है परन्तु हर दिन एक नया अहसास नयी तरंग उसे मिलती है.

वह सोचती है प्रकृति के रूप में ईश्वर उसके चारों तरफ अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहा है कल सुबह बर्फ की सफेद चादर ओढ़े वह एक नये रूप में सामने होगा. कुछ दिनों बाद टयूलिप के रूप में उसके बगीचे में खिलखिलायेगा.

वह सोचती है प्रकृति के रूप में ईश्वर उसके चारों तरफ अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहा है कल सुबह बर्फ की सफेद चादर ओढ़े वह एक नये रूप में सामने होगा. कुछ दिनों बाद टयूलिप के रूप में उसके बगीचे में खिलखिलायेगा. मीठे सेब, काफल, आडू, नाशपाती और न जाने कितने रूपों में उसे अपना स्वाद चखायेगा. वह गहरे सोच में पड़ जाती है, ईश्वर के इतने रूपों का दर्शन कितने लोग कर पाते हैं ? उन्हें तो लगता है जब ईश्वर बोरों में भरकर नोट उनके दरवाजे पर डाल जायेगा अथवा धुनषबाण गदा या चक्र लेकर उनके सामने खड़ा होगा तभी वे मानेंगे कि ईश्वर है.

गंगा शाम को पांच बजे रात का खाना खा लेती है. सूर्यास्त के बाद वह कुछ नहीं खाती है नौकरी के साथ भले ही वह इन नियमों का कट्टरता से पालन न कर पाई हो परन्तु अब तो नियम पालन करने के अलावा और कोई काम भी तो नहीं है उसके पास. बब्बर भी इतना संवेदनशील प्राणी है कि वह भी रात का खाना सूर्यास्त से पहले ही खा लेता है. कुत्ता है तो क्या उसके अंदर भी तो वही आत्मा विद्यमान है जो गंगा के अंदर है.

शाम की आरती के बाद गंगा रोज की भांति अपने अध्ययन टेबिल पर चली जाती है. कमरे में बने फायर एरिया में उसने खूब सारी मोटी लकड़ियां जला दी हंै, कमरा गर्माहट से भर जाता है. आज वह नोबेल पुरस्कार विजेता रोमानिया की लेखिका हेर्टा म्यूलर के जर्मन भाषा में लिखे उपन्यास ‘‘डेर मेन्श डस्ट आडन ग्रोस्सर फसान आउफ डेर वेल्ट’’ के हिन्दी अनुवाद ‘‘कांच के आंसू’’ पढ़ना शुरू करती हैै.

उपन्यास की भूमिका पढ़ते हुए वह चकित हो जाती है जब उसे पता चलता है कि ‘‘डेरमेन्श डस्ट आडन ग्रोस्सर फसान आउफ डेर वेल्ट’’ एक रोमानियाई मुहावरे का जर्मन अनुवाद है जिसका अर्थ है ‘‘इंसान इस दुनियां में एक बड़े तीतर की तरह लाचार है’’

हेर्टा म्यूलर आगे लिखती हैं- ‘‘जब वे बचपन में गाय चराने जाती थीं तो समय का अन्दाजा उन्हें वहां से गुजरती हुई चार रेलगाड़ियों से होता था. जब चैथी गाड़ी चली जाती थी, तभी उन्हें घर वापस जाना होता था, इस वक्त को गुजारने के लिए वे पत्तियों और फूलों को चबाती थी जिससे कि वे उनकी जुबान से वाकिफ हो जायं’’.

गंगा सोचती है इंसान दुनियां के चाहे जिस कोने में रहे उसकी भावनायें संघष पीड़ा, इच्छायें सब समान होती हैं. एक समर्थ साहित्यकार उन्हें शब्दों में पिरोकर पूरे विश्व तक पहुंचा सकता है.

मुक्तेश्वर के कुन्ती विला में बैठे हुए भी गंगा प्रथम विश्वयुद्ध के बाद रोमानिया के एक जर्मन भाषी गांव के लोगों के दुख-दर्द, संघर्षों से परिचित होती है.

गंगा सोचती है इंसान दुनियां के चाहे जिस कोने में रहे उसकी भावनायें संघष पीड़ा, इच्छायें सब समान होती हैं. एक समर्थ साहित्यकार उन्हें शब्दों में पिरोकर पूरे विश्व तक पहुंचा सकता है.

उस रात बहुत बर्फ गिरी थी, बर्फबारी के बाद रात में अंधेरे के लिए अपना अस्तित्व बनाये रखना बहुत कठिन हो गया था. झक सफेद चादर में लिपटीं घाटियों और पहाड़ियों में लगता था हजारों वाट के टयूबलाइट एक साथ जला दिये हों प्रकृति ने. वह फोन कर भाभी को प्रकृति के इस अदभुत रूप के बारे में बताती है – ‘‘भाभी तुम क्या कर रही हो वहां हल्द्वानी में, यहां आकर देखो क्या सौगात दी है ईश्वर ने…

भाभी रजाई के अंदर मुंह ढांके ढांके जवाब देती है ‘‘गंगा तुम्हीं मजे लो इस सौगात के,  मैं तो कई दिनांे से कमर और घुटनों के दर्द से चल फिर नहीं पा रही हूँ सदा की भांति भाभी उलाहना देती हैं –

 ‘‘हमारी भी कोई जिन्दगी है तीन तीन बच्चे पैदा करने चार चार बार के एबार्सन में बदन का सारा खून निकल गया, तुम इन तकलीफों को क्या जानो गंगा. तुम्हारे शरीर में तो अभी भी कुंवारा खून दौड़ रहा है इसीलिए तुमको इस उम्र में भी सब चीज सुन्दर ही सुन्दर लगती हैं’’

चाहे उनके शरीर पर बुढापे के लक्षण पूरी तरह न आये हों लेकिन अपनी उम्र की गिनती कर करके वे अपने मन पर बुढापे का बोझ चढ़ा लेते हैं. उम्र बढ़ने के साथ भी खुश रहना, प्रेम करना, सुन्दरता को महसूस करना उनको गुनाह लगने लगता है.

गंगा जानती है भाभी को हमेशा से ही अपनी तकलीफों से कम उसके कुंवारेपन से चिढ़ रही है. वह सोचती है उसकी भाभी यदि रोमानिया में रह रही होती अथवा रोमानिया की कोई औरत उसकी भाभी होती तो भी वह गंगा से अवश्य चिढ़ महसूस करती क्योंकि यह दुनियां है ही ऐसे लोगों से भरी हुई. चाहे उनके शरीर पर बुढापे के लक्षण पूरी तरह न आये हों लेकिन अपनी उम्र की गिनती कर करके वे अपने मन पर बुढापे का बोझ चढ़ा लेते हैं. उम्र बढ़ने के साथ भी खुश रहना, प्रेम करना, सुन्दरता को महसूस करना उनको गुनाह लगने लगता है.

गंगा अतीत में खो जाती है उसे वह अतीत न अब दुख देता है और न ही कोई रोमांच पैदा करता है वह सोचती है जो भाभी सदा उसे कुंवारी समझती रही है क्या वह सच था ?

न न कुंवारी व कहां रही थी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते समय अपने सहपाठी चन्द्रशेखर के हाथों कितनी आसानी से उसने अपना कौमार्य गंवा दिया था.

‘‘गंगा में शिव हूँ तुम मेरी जटाओं से निकली गंगा हो. क्या शिव और गंगा कभी एक दूसरे से अलग हो पायें हैं ? हम जन्मों जन्मों से साथ हैं और इस जन्म में भी साथ रहेंगे….

शेखर कहती थी उसे वह. चन्द्रशेखर बहुत लम्बा नाम लगता था उसे. वे दोनों विश्वविद्यालय कैम्पस का एक हरियाला कोना पकड़कर घंटों एक दूसरे में खोये रहते थे.

शेखर कहता – ‘‘गंगा में शिव हूँ तुम मेरी जटाओं से निकली गंगा हो. क्या शिव और गंगा कभी एक दूसरे से अलग हो पायें हैं ? हम जन्मों जन्मों से साथ हैं और इस जन्म में भी साथ रहेंगे….

शेखर बिहार के किसी गांव का रहने वाला था, उसने पहाड़ कभी नहीं देखे थे वह पहाड़ों की सुन्दरता को देखना चाहता था पर उसके पास पहाड़ों की सैर करने लायक पैसा नहीं था.

गंगा कहती ‘‘शेखर हमारा पीजी पूरा हो जायेगा और हम जेआरएफ निकाल लेंगे तो इतनी स्कालरशिप हमें मिलेगी कि हमारी पैसों की तंगी खत्म हो जायेगी, तब हम पहाड़ों की सैर कर पायेंगे, तभी मैं तुम्हें अपने माता पिता से मिलाने नैनीताल ले जाऊंगी.

वह खिलखिलाकर कहती – ‘‘जब तुम पहली बार नैनीताल की सुन्दरता देखोगे तो मेरी सुन्दरता को भी भूल जाओगे…’’

उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा था जब उनको पता चला कि पी0जी0 के फाइनल ईयर में विश्वविद्यालय की ओर से काश्मीर की ट्रिप जाने वाली है. गंगा ने शेखर को भी तैयार कर लिया था.

शेखर नर्वस था – ‘‘गंगा मैं नहीं जा पाऊंगा, ट्रिप के लिए कुछ तो पैसा जमा करना पड़ेगा, यूनिवर्सिटी कोई खैरात थोड़ी बांट रही है…

गंगा ने शेखर को इस तरह तैयार किया था कि उसके आत्मसम्मान को ठेस भी न पहुंचे और वह काश्मीर घूम भी ले.

एक हफ्ते का वह टुअर किसी जन्नत की सैर सा था. वहां  पर बहुत सारे नये अफेयर शुरू हो गये थे, पुराने अफेयर एक दसरे की बाहों के हिंडोले में झूलने लगे थे. शेखर ने पहली बार पहाड़ देखे थे वह भी परिकथा में सुने हुए पहाड़ों की तरह. वह मदहोश हो गया था. ट्यूलिफ उस समय पूरे शबाब में खिले हुए थे.

शेखर बोला था ‘‘गंगा क्या तुम्हारा देश भी इतना ही सुन्दर है ? क्या वहां भी ट्यूलिप खिलते हैं ? वह शरारत में गंगा को दूसरे देश की कहता था.

गंगा शरारत से बोली थी – ‘‘नहीं खिलते हैं तो हम दोनों वहां भी खिला लेंगे’’.

डल झील के किनारे तथा जाबरन की पहाड़ियों की तलहटी में मीलों तक फैले ट्यूलिप गार्डन में एक झुरमुटी शाम को पता नहीं कब वे एक दूसरे में समा गये थे.

जे0 आर0 एफ0 का रिजल्ट निकल आया था. बदकिस्मती से दोनों ही उसमें नहीं निकल पाये थे.

शेखर ने जर्मनी की किसी यूनिवर्सिटी में पी0एच0डी0 स्कालशिप के लिए आवेदन किया हुआ था वह चाहता था कि गंगा भी अप्लाई करे. पर गंगा जानती थी दिल्ली तक तो वह अपनी जिद से किसी तरह आ गई थी. अब इससे बाहर जाने की उसे घर से इजाजत कत्तई नहीं मिलेगी.

जर्मन विश्वविद्यालय में पी0एच0डी0 की स्कालरशिप के लिए चयन हो जाने पर भी शेखर और गंगा उस खुशी को महसूस नहीं कर पा रहे थे. दोनों को मालूम था इस पाने के पीछे अब बहुत कुछ खोना है.

दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर गंगा की आंखों से अविरल आंसुओं की धार बह रही थी. शेखर उसका माथा चूम रहा था. – ‘‘गंगा मैं बहुत जल्द एक कामयाब इंसान बनकर तुम्हारे सामने आऊंगा और तुम्हारे माता पिता से गर्व के साथ तुम्हारा हाथ मांग पाऊंगा और फिर हम तुम्हारे देश में ट्यूलिप की खेती भी करेंगे…’’

शेखर काबिल इंसान शायद अब तक नहीं बन पाया था. वह फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम सभी माध्यमों में चन्द्रशेखर ठाकुर नाम के व्यक्ति को सर्च कर रही है. वह नाम निकल आता है परन्तु शक्ल किसी और की नजर आती है.

उन दोनों की वह आखिरी मुलाकात थीं. गंगा नैनीताल में आकर अध्यापन कार्य करने के साथ पूरा जीवन कुंवारेपन का बाना ओढ़े शेखर की राह देखती रही थी.

शेखर काबिल इंसान शायद अब तक नहीं बन पाया था. वह फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम सभी माध्यमों में चन्द्रशेखर ठाकुर नाम के व्यक्ति को सर्च कर रही है. वह नाम निकल आता है परन्तु शक्ल किसी और की नजर आती है. वह सोचती है उम्र का असर क्या किसी के नैन नक्श को बदल सकता है ? एक आशा अभी भी उसकी बांकी है टयूलिप की खेती. भाभी को अथवा किसी और को शायद कभी पता नहीं चल पायेगा, इस वीराने में वह ट्यूलिप किसके लिए और क्यों उगा रही है.

 (लेखिका पूर्व संपादक/पूर्व सहायक निदेशकसूचना एवं जन संपर्क विभाग, उ.प्र., लखनऊ. देश की विभिन्न नामचीन पत्र/पत्रिकाओं में समय-समय पर अनेक कहानियाँ/कवितायें प्रकाशित. कहानी संग्रह-पिनड्राप साइलेंसट्यूलिप के फूल’, उपन्यास-हंसा आएगी जरूर’, कविता संग्रह-कसकप्रकाशित)

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