September 19, 2020
किस्से/कहानियां

मालपा की ओर

कहानी

  • एम. जोशी हिमानी

मालपा मेरा गरीब मालपा रातों-रात पूरे देश में, शायद विदेशों में भी प्रसिद्व हो गया है. मैं बूढ़ा, बीमार बेबस हूँ. बाईपास सर्जरी कराकर लौटा हूँ. बिस्तर पर पड़े-पड़े सिवाय आहत होने और क्रंदन करने के मैं मालपा के लिए कर भी क्या सकता हूँ?

अन्दर कमरे से पत्नी गंगा और दोनों बेटों को आपसी बातचीत के स्वर कानों में पड़ रहे हैं. मैं भलीभांति जानता हूँ कि इलकी मालपा जाने की तैयारी अपनी सगे-सम्बन्धियों को कोई राहत पहुंचाने के लिए नहीं है वरन् यह तैयारी है वहां जाकर अपने को मृतक आश्रित दिखाकर सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि पर दावा करना.

गंगा उदास और दुखी होने का अभिनय बखूबी कर लेती है. इस बार भी ऐसा ही हो रहा है. सुबह अल्ल-सबेरे मेरे बिस्तर के पास आकर नेक सलाह दे गई है- ‘‘सुनों जी, जीवन को घर भेज देते हैं. अभी हम लोग सूतक भी तो नहीं मना सकते है, जब तक जेठ और जेठानी जी की लाश नहीं मिल जाती…..’’

मैं चीख पड़ता हूं और अपनी बेबसी और लाचारी पर फूट-फूट कर रो पड़ता हूं, ‘‘सुनो, तुम लोग मालपा नहीं जाओगे. जीवन ने कभी मालपा देखा है, तुम्हे याद रह गये है अब मालपा के रास्ते? तुम्हें तो वहां जाने का प्रोग्राम बनाने पर लखनऊ में ही उल्टी आनी शुरू हो जाती थी ना?

फिर पिछले साल जब भाभी जी के पैर टूटने की खबर आई थी, मैंने कितना तुमसे कहा था खुद चली जाओ या जीवन को भेज दो. दो-चार महीने वहीं रहकर भाभी की सेवा कर आयेगा. उनको भी लगेगा कि वे बे-औलाद नहीं हैं. दुःख के वक्त कोई उनका अपना है. तब तुमने क्या कहा था बोलो?….’’

 

गंगा मुझे चुप कराती है-ऐसा नहीं सोचते! तुम्हें डाक्टर ने पूरा आराम करने और कम बोलने को कहा है. आज उनके ऊपर सबसे बड़ा दुःख आया है. जीवन को जाने दो. वह उनको ढूंढेगा.

मुझे उसकी बात पर विद्रूप हंसी आती है.- ‘‘ढूंढेगा. क्या ढूंढेगा? तुम क्या सोचती हो, क्या वहां पर अब तक कोई जिन्दा बचा होगा. अखबार में नहीं पढ़ रही हो, समाचार में नहीं सुन रही हो? पूरा गांव काली गंगा में समा गया. सरकार काफी है उन्हें ढूंढने के लिए. तुम जाओ यहां से. मुझे अकेले छोड़ दो.’’

मेरी आंखो के आगे अभागा मालपा गांव चलचित्र की तरह घूमने लगा. कितना सुन्दर था मेरा मालपा. गांव से ऊपर पहाड़ पर चढ़ो तो पूरा हिमालय, नन्दी चूली पर्वत, ऊँ पर्वत, छिपलाकोट, छियालेख का सौन्दर्य देखते ही  बनता था. नीचे कालीगंगा का भयानक शोर. जैसा उसका डरावना रूप, बैसा ही भयानक शोर.

पत्थरों से टकरा-टकरा कर कालीगंगा मानो प्रलय का तांडव दिखाना चाहती थी. प्रकृति का कैसा अद्भुत चमत्कार था वहां पर. दो नदियों का एक ही उद्गम स्थल, परन्तु दूसरी तरफ बहने वाली गोरी गंगा कितनी धवन और शांत. तभी तो उस पार के लोग हमारे मालपा आते तो हमारे पुरखों को कोसते, उनकी मजाक बनाते कि कैसे इस भयानक नदी के किनारे बस गये? कोई भी खुशी-खुशी अपनी लड़की को हमारे गांव ब्याहना नहीं चाहता था. सब कहते हमारी लड़की तो कालगंगा का शोर सुन-सुन कर बहरी हो जायेगी. फिर भी मेरे गांव का कोई लड़का अनब्याहा नही रहा. वहां की रोपाई का खुशबूदार धान, वहां के माल्टा, अखरोट, च्यूरे से लदे विशाल पेड, पपीता और कच्यूर केले से लदे बागों के आगे कालीगंगा का शोर दब जाता.

इस भू-स्खलन की इतनी चर्चा शायद तब न होती, अगर यहां पर पूरे देश के मानसरोव यात्री रूके न होते और हादसे का शिकार न होते.

मेरे गांव में तो गरीब घोड़े-खच्चर वाले या छोटे किराने की दुकान वाले ही रहते थे जिनके जीने या मरने से देश को कोई नुकसान होने वाला नही था.

मेरे मन में आशा की किरण अभी भी बाकी है कि शायद मेरे दाज्यू अभी जिन्दा हों, क्योकि इस सीजन में वे मानसरोवर यात्रियों का सामान खच्चर में ढोने का काम किया करते थे. और हो सकता है कि वे पहले यात्री दल के साथ आगे निकल गये हों. पर भौजी (भाभी) के बचने की उम्मीद कम थी क्योंकि वे गांव से बाहर कभी जाती ही नहीं थी फिर हादसा तो राम में हुआ था. रात में कहीं जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.

छिपलाकोट-पर्वत. सभी फोटो गूगल से साभार

भौजी की याद कर मेरी आंखे छलक पड़ती हैं. इस घोर कलयुग में भी सीता जैसी भाभी मुझे मिली थी. वह मेरी मां तुल्य थीं. जब मै देखता हूँ कि देवर-भाभी के बीच कैसे-कैसे अश्लील मजाक लोग करते हैं? तो मेरा मन अत्यन्त दुखी हो जाता है. हमारी संस्कृति में देवर-भाभी का रिश्ता तो मां-बेटे जैसा पवित्र था लेकिन लोगों ने कैसे उसे अपवित्र कर दिया है? इस उम्र में भाभी जब मुझे लाला कहकर पुकारती तो मैं भाभी के वात्सल्य प्रेम में पूरा भीग जाता.

खच्चरों में सामान ढो-ढो कर और च्‍यूरे का घी, केले माल्टा अखरोट बेच-बेच कर मेरे दाज्यू ने मुझे नारायणनगर से हाईस्कूल पास कराया था. मेरे दाज्यू ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था फिर भी मुझे अंकगणित के सवाल हल करने के लिए दाज्यू की मदद लेनी पड़ती थी. ऐसी विलक्षण बुद्धि पाई थी दाज्यू ने. जिस दिन मैंने हाईस्कूल प्रथम श्रेणी में पास किया था, मेरे दाज्यू ने पूरे गांव में ढोल दम्बां (नगाड़े) बजवाये थे और गुड़ की भेलिया तोड़ी थी. मैं पहला लड़का था गांव का जिसने इतनी उच्च शिक्षा पाई थी.

मेरे दाज्यू ने मेरी शादी इतनी धूम-धाम से की थी कि वर्षों तक उस शादी की चर्चा इलाके भर में होती रही थी. दो जोड़ी ढोल-दम्बा और दो जोड़ी छलिया नर्तकों के साथ मेरी बारात शोर घाटी गयी थी. पैदल रास्ता होने के कारण चार दिन बाद बारात वापस लौटी थी. तीन रात तक पूरे शबाब के साथ भौजी ने घर पर रत्याली मनाई थी.

हाईस्कूल के बाद चाहकर भी मैं आगे की पढ़ाई नहीं कर सका था. उस जामाने में इस इलाके में हाईस्कूल के बाद पढ़ाई को कोई इन्तजाम नहीं था. पिथौरागढ़ शहर आकर कालेज की पढ़ाई करने की हैसियत हमारी नहीं थी. उन्हीं दिनों पता लगा कि असम राइफल्स की पिथौरागढ़ में भर्ती आई हुई है. मैं दाज्यू और भौजी का आर्शीवाद लेकर पिथौरागढ़ आ गया था. दूसरे दिन ही भर्ती होकर मैं इम्फाल के लिए चल दिया था.

हर महीने समय से मेरी तनख्वाह का पूरा पैसा दाज्यू के पास पहुंच जाता. मैंने भी और सिपाहियों की तरह ऐसी व्यवस्था करवा दी थी कि मैं कहीं भी रहूं, हेड आफिस से मेरी पूरी तनख्वाह दाज्यू को मनीआर्डर से मिल जाया करे.

मेरे दाज्यू ने मेरी शादी इतनी धूम-धाम से की थी कि वर्षों तक उस शादी की चर्चा इलाके भर में होती रही थी. दो जोड़ी ढोल-दम्बा और दो जोड़ी छलिया नर्तकों के साथ मेरी बारात शोर घाटी गयी थी. पैदल रास्ता होने के कारण चार दिन बाद बारात वापस लौटी थी. तीन रात तक पूरे शबाब के साथ भौजी ने घर पर रत्याली मनाई थी. तीनों रात आटे सूजी का हलवा तथा पूरी, रोटी, कद्दू की सब्जी राई डला रायता और अमखोट की चटनी गांव भर की औरतो, बच्चों और दर्जनों रिश्तेदारों ने खाया था और रात-रात भर हथजोड़ी खेल लगाये थे. हथजोड़ी खेलों और धमकसिल्ला के आगे कालीगंगा का शोर भी धीमें पड़ गया था. बारात वापसी पर आठ-दस गावों को भात दिया गया था. रिश्तेदारों और बिरादरी वालों को विदाई के समय धोती और गोला के साथ पिठ्या लगाया गया था.

मेरी कमाई का पूरा पैसा दाज्यू ने मेरे ब्याह पर खर्च कर दिया था.

मैं हमेशा सोचा करता था, रिटायरमेंट के बाद गांव जाकर बसूंगा. गांव में न भी बसा तो धारचूला या डीडीहाट में काना बनाऊंगा. दाज्यू-भौजी को अपने साथ रखूंगा. वे अकेले वही क्या करेंगे? उनका मेरे अलावा और है ही कौन? पर पत्नी के आगे मेरी एक न चली थी. पत्नी पहाड़ पर बिल्कुल नही रहना चाहती थी. मालपा में उसे कालीगंगा के शोर से एलर्जी थी, अन्यत्र उसे ठंड के कारण गठिया होने के पूरे-पूरे आसार थे. मजबूरन मुझे लखनऊ में अपने कुछ पहाड़ी भाईयों के साथ सोसाइटी से जमीन लेकर मकान बनाकर रहना पड़ा.

शुरू-शुरू में मैं अकेले ही मालपा साल-दो साल में हो आता था फिर वर्षों का अन्तराल बढ़ता गया. न दाज्यू-भौजी यहां आने को तैयार थे और न मैं वहां जा सकता था. ऊपर से अत्याधिक शराब और सिगरेट पीने के कारण मैं दिल की बीमारी लगा बैठा. फौज में पड़ी आदत छूटती न थी.

दस साल से मैं लखनऊ में बसा था परन्तु मेरे दो बेटों में एक भी इंटर पास नहीं कर पाया. दिन भर पान की दुकार पर खड़ा रहना और आवारागर्दी करना उनकी दिनचर्या में शामिल था.

मैं बाहर तख्त पर पड़ा-पड़ा जीवनव और उसकी मां की चालों को भांपने की कोशिश कर रहा हूं. गंगा चाहती है कि छोटे गोविन्द को दाज्यू को गोद लिया बेटा दिखाकर एक लाख रूपया और ध्वस्त मकान का पच्चीस हजार रूपया सरकार से हथिया लिया जाये. वह सरकार को कोसती भी जा रही है कि सरकार ने मौंत में भी भेदभाव किया है. वह कहती है अगर जेठ जी सरकारी नौकर होते तो उनको भी एक लाख मिलता,

तब तक गोविन्द बाहर से खबर लेकर आता है कि केंन्द्र सरकार ने भी पचास हजार प्रति मृतक आश्रित को देने की घोषणा की है. मैं तीनों के चेहरे से आई चमक को साफ महसूस कर रहा हूँ.

गंगा की आवाज सुनाई पड़ रही है- ‘‘जीवन, तू आज रात को ही पिथौरागढ़ चला जा. वहां अपने मामा से कहना जैसे भी हो ले-देकर तहसील से गोविन्द को अपने ताऊ जी की गोद ली सन्तान दिखाना है….’’

जीवन कह रहा है- मां, पिताजी पूरी जिन्दगी हमारे लिये कुछ नहीं कर पाये लेकिन जिडबाज्यू-जेड़जा ने मरने के बाद हमको लखपति बना दिया है दोनों का सवा दो लाख रूपया आराम से बन जायेगा. बस भगवान से यह मनाओं कि दोनों उस रात गांव में ही रही हों तो समझो काम बन गया.’’

मैं बाहर से चीखकर कहता हूँ-‘‘जीवन, तू हमार खानदान का सच्चा सपूत है. इस खुशी में मालपा के ऊपर जो छुरमल देवता का मंदिर बना था, यदि वह बचा होगा तो उसमें एक लाख रूपया अवश्य चढ़ा आना क्योंकि उस देवता ने सैकड़ों वर्षों तक गांव से बराबर भोग खाया फिर भी गांव की रक्षा नहीं कर पाया. तेरे जैसे लोगों को उसने माला-मान जरूर कर दिया. बड़ा नमकहराम निकला वह भी…..’’

मेरे अभागे दाज्यू-भौजी को शायद चिता की आग भी नही मिल पायेगी.वह सब मलबे में ही दफन हो गये होंगे. मेरा सपना था कि मैं मरते वक्त अपने मालपा ही जाऊंगा. कालीगंगा के किनारे ही मेरा अंतिम संस्कार किया जायेगा. मैंने जन्म लेते ही कालीगंगा का शोर सुना था और मैं विलीन भी काली गंगा में ही होना चाहता था. मेरा बूढ़ा, बीमार असक्त शरीर यहां पड़ा है, परन्तु मेरी आत्मा मालपा में भटक रही है शायद उसे दाज्यू-भौजी से मिलकर ही शांति मिल पायेगी.

लेखिका पूर्व संपादक/पूर्व सहायक निदेशक— सूचना एवं जन संपर्क विभागउ.प्र.लखनऊ. देश की विभिन्न नामचीन पत्र/पत्रिकाओं में समय-समय पर अनेक कहानियाँ/कवितायें प्रकाशित. कहानी संग्रह-पिनड्राप साइलेंस’  ‘ट्यूलिप के फूल’, उपन्यास-हंसा आएगी जरूर’, कविता संग्रह-कसक’ प्रकाशित)

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