अभिनव पहल

पहाड़ी वास्तुशिल्प का चितेरा- वास्तुविद कृष्ण चंद्र कुड़ियाल

  •  इन्द्र सिंह नेगी

उत्तराखंड आध्यात्म एवं स्थापत्य की विशिष्ट शैली के लिए वैश्विक पटल पर जाना जाता है, यहाँ गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ, केदार नाथ, हनोल सहित अनेक देवालाय है जिसके दर्शनार्थ प्रति वर्ष आध्यात्मिक जगत के लोगों का तांता लगा रहा है जिससे ना केवल लोग अपनी आध्यात्मिक क्षुदा ना केवल शांत करते हैं बल्कि इसके साथ-साथ यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य से भी आनंदित होतें है. इस पहाड़ी प्रदेश के लोगों की जीविका का आध्यात्मिक-पर्यटन मजबूत आधार हैं जिससे अनेकों लोग जुड़े हुये हैं. यहाँ के देवालय नागर, कत्युरी, हिमान्द्री, नाग/गुर्जर प्रतिहार, हयूण, द्रविड, फास्णा, बलभी, पंचायण, राजस्थानी, दक्षिण भारतीय, केदार नाथ आदि मंदिर स्थापत्य मंदिर शैलियाँ है.

टोंस-यमुना घाटी के जनवासों और देवालयों को यहाँ अलग तरह से देखा जा रहा है, इन घाटियों में देवदार की अधिकता के कारण जनवास और देवालयों में पत्थर के साथ इसका खूब प्रयोग किया गया, जनवास और मंदिर बहुमंजिले बनाए जाते रहे जिसे पुरातत्व शास्त्रियों ने “यामुनी शैली” की संज्ञा दी. यहाँ के देवालयों में दो प्रकार काष्ठ शैलियाँ अस्तित्व में आई, एक वह जिसमें सम्पूर्ण संरचना में काष्ठ का प्रयोग हुआ, दूसरी वह जिसमें साथ में पत्थर का भी प्रयोग किया गया, एक समय तो बहुमंजिले भवन व मंदिर बनाए जाते रहे लेकिन प्रकारांतर में इसका आकार ऊंचाई में घट गया और इसकी जगह मंदिरों के छत्र ने ली.

सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद डा यशवंत सिंह कटोच ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक “मध्य हिमालय का पुरातत्व” में लिखा है कि “यमुना-टोंस घाटी के काष्ठ मंदिरों का मंदिर वास्तु की एक विशिष्ट शैली के निर्माण में महत्वपूर्ण योदान है, इन्ही का प्रभाव है कि भारतीय वास्तुकला में “मध्य हिमान्द्री” शैली की चर्चा हो रही है.”

उत्तराखंड के मंदिर निर्माण की शैलियों के प्रचार-प्रसार, परिष्करण व नए स्वरूप प्रदान करने में समय-समय पर अनेक मनीषियों, शिल्पियों और वास्तुविदों ने अपना योगदान दिया, आजकल ऐसे ही एक युवा वास्तुविद चर्चा में हैं आईआईटियन कृष्ण चंद्र कुड़ियाल जो ना केवल जुनूनी ढंग यहाँ की मंदिर शैलियों को विस्तार दे रहें है बल्कि शिक्षण-प्रशिक्षण के माध्यम भी से इन शैलियों के नए-नए शिल्पी व जानकार तैयार कर रहे है .

कृष्ण चंद्र कुड़ियाल का जन्म का उत्तरकाशी का 30 जून 1972 को हुआ, पिता श्री महिमानन्द कुड़ियाल उत्तरकाशी-टिहरी-देहरादून के एक प्रतिष्ठित ठेकेदार थे जिनको कार्यों की गुणवत्ता के लिए जाना जाता था, इनके पूर्वज कुड़ियाल टिहरी गढ़वाल के प्रताप नगर स्थित “सुकरी” गाँव से हैं जो अपने यहाँ भवन निर्माण से जुड़े रहे, गढ़वाली शब्द “कुड़ी” यानि घर/भवन से ही कुड़ियाल शब्द की रचना हुई, आज यहाँ से निकले कुड़ियाल लोग देश और दुनियाँ में अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करते हुये अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं . कुड़ियाल जी जब 15 वर्ष के हुये तो इनके पिता दिवंगत हो गए, इसके बाद इनकी माता श्रीमति शीरा देवी के कंधों बच्चों जिसमें चार बहन और चार भाई के लालन-पालन का भार आ गया, इनकी माता ने अपने दो बेटों कृष्ण चंद्र कुड़ियाल और आशीष को देश के प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक दून स्कूल से पढ़ाया .

इसके बाद कृष्ण चंद्र ने रुड़की प्रोध्योगिकी संस्थान से आर्किटेक्चर में आई॰आई॰टी॰ की डिग्री ग्रहण की, तत्पश्चात इनके पास विदेश जाने तक के अनेक अवसर थे लेकिन इन्होने दिल्ली, नोयडा में तीन वर्ष तक देश की नामी कंपनियों में काम कर अनुभव प्राप्त करने को प्राथमिकता दी और अपनी माता जी की प्रेरणा से उत्तरकाशी को केंद्र बनाकर उत्तराखंड को अपना कर्मक्षेत्र चुना. अपनी स्कूली और कालेजी शिक्षा के दौरान आपने कला, संगीत, फोटोग्राफी एवं खेलकूद में अनेक पुरस्कार जीते, बांसुरी आपका सबसे प्रिय वाद्य यंत्र है जिसको वो हमेशा साथ रखते है और बहुत से मंचों पर ये अपनी इस कला का प्रदर्शन कर चुके हैं .

अपने व्यवसायिक कार्यों के प्रारम्भ में उत्तराखंड में अनेक भवनों, होटलों, अस्पताल, आश्रम आदि के निजी व सरकारी काम शुरू किए और इसके बाद जीवन के कुछ ऐसे घटना क्रम हुये कि ये उत्तराखंड के प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार व नव निर्माण के कार्यों को अपना नि:शुल्क सहयोग देना शुरू कर दिया. श्री कुड़ियाल के अनुसार “मैंने पूरे भारत में सभी तरह की स्थापत्य कला को बहुत नजदीक से जानने-समझने की कोशिश की किन्तु इनमें पहाड़ी/जौनसार-बावर/ यमुना घाटी में प्रस्तर-काष्ठ मिश्रित स्थापत्य शैली बेजोड़ व सुंदर है . ये शैली विलुप्त होने से बची रहे इसलिए इस स्थापत्य के शिल्पियों और कला को बढ़ावा देने के लिए योगदान देने की कोशिश कर रहा हूँ .”

श्री कुड़ियाल आगे कहते हैं कि उत्तराखंड के मंदिरों की शैली के दस्तावेजीकरण और अध्धयन पर अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है क्योंकि वास्तु पाठ्यक्रम में यहाँ की मंदिर निर्माण शैलियों की मूल जानकारी का अभाव है, मुझे इस कार्य को देश व दुनियाँ को बताने की आवश्यकता महसूस हुई ताकि ये अनूठी कला और विधा समय के साथ समाप्त होने से बच सके.

मैंने टिहरी में सेम नागराजा सिद्ध पीठ का द्वार व मंदिर, सुरकंडा देवी मंदिर, ओनेश्वर महादेव मंदिर प्रताप नगर, उत्तरकाशी में कंडार देवता मंदिर, लखेश्वर व परशुराम मंदिर, नरसिंघ नागराजा मंदिर भेंत, रघुनाथ मंदिर गंगटाड़ी बढ़कोट, शिव मंदिर नन्द गाँव बढ़कोट, ज्वालादेवी मंदिर, क्रांची महाराज मंदिर आराकोट, सोमेश्वर देवता मंदिर राणाचट्टी, ब्रह्मनाथ मंदिर जोगथ, नैनीताल में हनुमान मंदिर कैंची धाम, व्यास गद्दी और मंदिर परिसर नेमिशरणम तीर्थ सीतापुर, देहरादून में श्री महासू मंदिर बिसोई नागथात, महासू मंदिर थैना व जोगियो और धारी देवी मंदिर श्रीनगर प्रमुख मंदिरों को यहाँ की स्थापत्य कला के अनुसार ढालने का प्रयास किया .

केदारनाथ में आई प्रलयकारी आपदा के बाद उसको पुनः स्थापित करना और संवारना उत्तराखंड सरकार के समक्ष एक कठिन चुनौती थी जिसका दायित्व भारतीय पर्वतारोहण संस्थान के तत्कालीन प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल को उत्तराखंड सरकार ने सौंपा उन्होने आर्किटेक्चर का कार्य कूडियाल जी को सौंपा और आज एक बैहतर प्लान हम सब के सामने है.

उनके अनुसार उत्तराखंड में हमेशा से चोटी-बड़ी आपदा आती रही है और भविष्य भी इससे अछूता नहीं रहेगा इसलिए पहाड़ों में सस्ते, टिकाऊ और भूकंपरोधी भवन निर्माण शैली का विस्तार हो जो यहाँ की पारिस्थितिकी के अनुरूप हो, भूकंपरोधी तकनीक को जमीनी रूप से आगे बढ़ाने के लिए मिस्त्रियों तक का प्रशिक्षण शामिल हो . इसी के साथ पुराने बचे भवनों को रेट्रो फिटिंग तकनीक द्वारा मजबूती प्रदान की जाय, पहाड़ों में पर्यटन योजनाएँ ऐसे लोग बनाए जिनको यहाँ के भूगोल, पर्यावरण और जमीनी हकीकत की जानकारी हों और इस कार्य में अधिक से अधिक स्थानीय निर्माण सामग्री का समावेश किया जाय .

पहाड़ी काष्ठ कला के शिल्पियों को चिन्हित कर उनके समूह बना कर भवन, होटल, रिसोर्ट, आफिस के निर्माण में पहाड़ी शैली को अनिवार्यता प्रदान की जाय तथा इस कार्य में प्रशिक्षित शिल्पियों का उपयोग कर उन्हें रोजगार प्रदान करने के साथ इस शैली को स्थापित किया जा सकता हैं . कूड़ियाल जी आजकल बहुत सी नई परियोजनाओं पर काम कर रहे है, इसी के साथ देहारादून स्थित ग्राफिक इरा हिल यूनिवर्सिटी में पहाड़ी आर्किटेक्चर को विषय के रूप में पढ़ाते हुए नए शिल्पकारों को प्रोत्साहन व सबलता प्रदान कर रहें हैं . यात्रा अभी जारी हैं, जिस जीवटता एवं जुनून से ये अपने मिशन में जूटे हुए है उससे हमारे नीति-नियंता कभी ना कभी अवश्य प्रभावित होंगे, नए शिल्पी-वास्तुविद तैयार होंगे जिससे यहाँ के स्थापत्य को स्थायित्व और एक सम्मानजनक मुकाम भी मिलेगा.

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