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मोरी में खाड़ी (हाथकरघा) से आत्मनिर्भरता की मिसाल: पारंपरिक ऊनी शिल्प से बढ़ रही ग्रामीणों की आय

मोरी में खाड़ी (हाथकरघा) से आत्मनिर्भरता की मिसाल: पारंपरिक ऊनी शिल्प से बढ़ रही ग्रामीणों की आय

अभिनव पहल, उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, पुरोला-मोरीविकासखंड मोरी के दूरस्थ गांवों में आज भी परंपरा और आत्मनिर्भरता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच यहां खाड़ी (हाथकरघा) पर ऊनी वस्त्र बनाने की सदियों पुरानी परंपरा न केवल जीवित है, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका का मजबूत आधार भी बन चुकी है। परंपरा में रची-बसी आजीविका मोरी क्षेत्र के गांवों में महिलाएं और पुरुष मिलकर ऊन से पारंपरिक वस्त्र तैयार करते हैं। भेड़ों से ऊन निकालने से लेकर उसे साफ करने, हाथ से कातने और खाड़ी पर बुनने तक की पूरी प्रक्रिया बड़े धैर्य और कौशल से निभाई जाती है।फजी, सुन्तण, साफ़ा, जुड़की और लखोटि जैसे पारंपरिक ऊनी वस्त्र न केवल कड़ाके की ठंड से बचाते हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति, पहचान और विरासत के प्रतीक भी हैं।तालुका क्षेत्र की महिला केशरमणि कहती हैं, “यह काम सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि हमारी ...