Tag: पहाड़

ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालपहाड़ों में बहुत—सी चीजें हमारे बुजुर्गों ने हमें विरासत के रूप में सौंपी हैं पर आज आधुनिकता की चमक—दमक और भागदौड़ भरी जीवनशैली में हम इन चीजों से कोसों दूर जा चुके हैं. हम अपनी पुराने खान—पान की चीजों को सहेजना और समेटना लगभग भूल ही गए हैं. अपने खान—पान में हमने पुराने अनाजों, पकवानों को कहीं न कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया है. आज लोग उस खान—पान को ज्यादा पसंद कर रहे हैं जिसमें पौष्टिकता बहुत कम मात्रा में होती है और शरीर को नुकसान अलग से होता है, जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ रही है. हमारा शरीर रोगों से लड़ने के लिए कमजोर होता जा रहा है. जिस खाने में नाममात्र की भी पौष्टिकता नहीं होती है बल्कि शरीर को मजबूत बनाना तो दूर, कमजोर ज्यादा बना रहा है, ऐसे खान—पान को हमने अपने आज खाने में शामिल किया हुआ है.रवांई घाटी एक ऐसी घाटी है जहां पर लोगों ने आज भी अपनी परम्पराओ...
“ऊम” महक गॉंव की

“ऊम” महक गॉंव की

संस्मरण
सुमन जोशीउत्तराखंड में खेती व अनाज से जुड़े न जाने कितने ही त्यौहार, कितने की रीति—रिवाज़ और न जाने कितनी ही मान्यताएं हैं. पर हर एक मान्यता में यहां की संस्कृति व अपनेपन की झलक देखने को मिलती है. कृषि प्रधान प्रदेश होने के कारण यहाँ हर एक फसल के बोने से लेकर के काटने व रखने तक अलग-अलग अनुष्ठान किये जाते हैं. किसी नई फसल की पैदावार में उसे ईष्ट देव को नैनांग के रूप में चढ़ाया जाता है और फिर समस्त गाँववासियों द्वारा प्रयोग किया जाता है.पहाड़ों में खेतों में कुछ खेत जहाँ पर बहुत छाया रहती है या फिर सिमार (पानी भरे हुए खेत) में फसल ठीक प्रकार से पक नहीं पाती यानी हरी ही रह जाती है, ऐसे खेतों के किनारों से ही ऊम के लिए गेहूं के मुठे बाँध लिए जाते और ईजा, काकी या ज्येठजा में से कोई भी मुठे बनाकर बच्चों को थमा देते व इन्हें जलाने अथवा सेकनें का काम उन्हें दे देते. निःसंदेह बच्चों में उत्सा...
इंतज़ार… पहाड़ी इस्टाइल

इंतज़ार… पहाड़ी इस्टाइल

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—8रेखा उप्रेतीहुआ यूँ कि मेरी दीदी की शादी दिल्ली के दूल्हे से हो गयी. सखियों ने “…आया री बड़ी दूरों से बन्ना बुलाया” गाकर बारात का स्वागत किया और नैनों की गागर छलकाती दीदी दिल्ली को विदा कर दी गयी. आसपास के गाँवों या शहरों में ब्याही गयी लडकियाँ तो तीसरे-चौथे रोज़ या हद से हद महीने दो महीने में फेरा लगाने आ जाती थी पर हमारी दीदी एक साल तक नहीं आ सकी. हर महीने एक अंतर्देशीय से उसके सकुशल होने की ख़बर आ जाती. एक बार अंतर्देशीय में कुशल-बाद के साथ-साथ यह सूचना भी मिली कि फलां तारीख को हमारी दीदी और भिन्ज्यु आ रहे हैं. घर-भर में ही नहीं आस-पड़ोस में भी उत्साह की लहर दौड़ गयी. जोर-शोर से तैयारियाँ शुरू हुईं. माँ, आमा, काखी, बुआ ने मिलकर घर की लिपाई-पुताई कर डाली. देहरी, चाख, मंदिर ऐपण से जगमगा उठे, आँगन में भी ऐपण की बड़ी-सी चौकी बनाई गयी. शगुन-आँखर देने के लिए ग...
नए कलेवर के साथ हिमांतर देखें वीडियो

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वीडियो
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